Champions!
Congratulations to the Indian team on winning the ICC Men’s T20 World Cup!
This remarkable triumph reflects exceptional skills, determination and teamwork. They have shown outstanding grit through the tournament.
This victory has filled every Indian heart with pride and joy.
Well done, Team India!
On #ArmyDay today, salute the courage and resolve of our soldiers.
The nation stands in eternal gratitude to them and their families for their selfless service.
“…THERE WILL BE NO MORE OIL OR MONEY GOING TO CUBA - ZERO! I strongly suggest they make a deal, BEFORE IT IS TOO LATE. Thank you for your attention to this matter.”- President Donald J. Trump
जय सोमनाथ !
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आज से शुभारंभ हो रहा है। एक हजार वर्ष पूर्व, जनवरी 1026 में सोमनाथ मंदिर ने अपने इतिहास का पहला आक्रमण झेला था। साल 1026 का आक्रमण और उसके बाद हुए अनेक हमले भी हमारी शाश्वत आस्था को डिगा नहीं सके। बल्कि इनसे भारत की सांस्कृतिक एकता की भावना और सशक्त हुई और सोमनाथ का बार-बार पुनरोद्धार होता रहा।
मैं सोमनाथ की अपनी पिछली यात्राओं की कुछ तस्वीरें साझा कर रहा हूं। यदि आप भी सोमनाथ गए हैं, तो अपनी तस्वीरें #SomnathSwabhimanParv के साथ जरूर शेयर करें।
1947 की आज़ादी के बाद भारत साँस तो ले रहा था,
पर उसकी आत्मा अब भी टूटी हुई थी।
गुजरात के सागर किनारे खड़ा सोमनाथ मंदिर,उसी टूटी हुई आत्मा की तरह था। खंडहर, अपमानित, लेकिन जीवित।
सरदार पटेल एक दिन सोमनाथ पहुँचे। लहरों की आवाज़ के बीच उन्होंने खंडहर को देखा, और बस इतना कहा,
यह मंदिर फिर खड़ा होगा।
उनके लिए यह पत्थरों का ढांचा नहीं था। यह गुलामी के घावों पर रखा जाने वाला मरहम था।
दिल्ली में बैठा सत्ता का एक और चेहरा, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ,इसे अलग नज़र से देख रहा था।
नेहरू को डर था,दुनिया क्या कहेगी,धर्मनिरपेक्ष भारत की छवि पर सवाल उठेंगे।
नेहरू ने कहा,सरकार को मंदिरों से दूर रहना चाहिए।
सरदार ने जवाब नहीं दिया।उन्होंने काम किया।
संस्कृति मंत्री के एम मुंशी सरदार के साथ खड़े हो गए।
फैसला हुआ,यह मंदिर जनता के धन से बनेगा,सरकार के आदेश से नहीं।
देश के गाँव गाँव से चंदा आया। किसी ने पैसा दिया,
किसी ने सोना,किसी ने बस आस्था।
1950 में सरदार पटेल चले गए। पर उनका संकल्प नहीं मरा।
1951 में जब सोमनाथ फिर खड़ा हुआ,तो उद्घाटन के लिए
डॉ राजेन्द्र प्रसाद पहुँचे।
नेहरू से संदेश आया, राष्ट्रपति को मंदिर उद्घाटन में नहीं जाना चाहिए।
डॉ राजेंद्र प्रसाद मुस्कुराए और बोले, अगर किसी मंदिर के उद्घाटन में जाना गलत है, तो किसी मस्जिद या चर्च में जाना भी उतना ही गलत होगा।
शंख बजे। घंटियाँ गूँजीं। सोमनाथ फिर जीवित हो उठा।
यह कहानी एक मंदिर की नहीं है।यह कहानी है उस भारत की,जो झुका था और फिर खड़ा हुआ।