।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ।।२३।।
(षष्ठोऽध्यायः)
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह अन्तिम मन्त्र इस सम्पूर्ण उपनिषद् का मुकुटमणि, उसके समस्त उपदेशों का सार तथा ब्रह्मविद्या की प्राप्ति का परम रहस्य है। यदि पूर्ववर्ती मन्त्रों में उपनिषद् ने ब्रह्म के स्वरूप, माया, जीव, ईश्वर, बन्धन, मोक्ष तथा आत्मज्ञान का दार्शनिक विवेचन किया है, तो इस अन्तिम मन्त्र में वह उन समस्त शिक्षाओं के फलित होने की अनिवार्य शर्त का उद्घोष करती है। भगवत्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य अपने शाङ्करभाष्य में स्पष्ट करते हैं कि उपनिषदों के गूढ़ अर्थ केवल बुद्धि की तीक्ष्णता, शास्त्रों के अध्ययन अथवा वाक्पटुता से प्रकाशित नहीं होते; वे उसी महात्मा के अन्तःकरण में प्रकट होते हैं जिसके हृदय में परमात्मा और गुरु - दोनों के प्रति समान, निष्कलुष और पराभक्ति विद्यमान हो।
मन्त्र का प्रथम पद है - “यस्य देवे परा भक्तिः।” यहाँ देव का अर्थ किसी सीमित देवता से नहीं, अपितु उस परमदेव, परमब्रह्म, सर्वान्तर्यामी, स्वयंप्रकाश चैतन्य से है, जो समस्त विश्व का आधार और प्रत्येक जीव का आत्मस्वरूप है। भगवत्पाद के अनुसार परा भक्ति का अर्थ केवल भावनात्मक श्रद्धा नहीं, बल्कि परम सत्य के प्रति सम्पूर्ण समर्पण, अखण्ड श्रद्धा, निष्काम प्रेम और सत्यनिष्ठ जीवन है। अद्वैत वेदान्त में भक्ति और ज्ञान परस्पर विरोधी नहीं हैं; अपितु पराभक्ति ही अन्ततः आत्मस्वरूप में दृढ़ स्थित ज्ञान का रूप धारण कर लेती है। जिस हृदय में ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण है, वही ज्ञान के प्रकाश का पात्र बनता है।
इसके उपरान्त मन्त्र कहता है - “यथा देवे तथा गुरौ।” यह उपनिषद् का अत्यन्त गम्भीर और महत्त्वपूर्ण निर्देश है। भगवत्पादाचार्य स्पष्ट करते हैं कि यहाँ गुरु को ईश्वर से भिन्न कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं माना गया है। गुरु वह माध्यम हैं जिनके द्वारा श्रुति का सत्य शिष्य के अन्तःकरण में प्रकाशित होता है। गुरु स्वयं ब्रह्म का उपदेश नहीं गढ़ते, बल्कि वे शास्त्रसम्मत ज्ञान का आवरण हटाकर शिष्य को उसके अपने आत्मस्वरूप का बोध कराते हैं। अतः गुरु के प्रति वही श्रद्धा अपेक्षित है, जो ईश्वर के प्रति होती है, क्योंकि गुरु ही उस दिव्य ज्ञान के प्रत्यक्ष उद्घाटक हैं।
भगवत्पाद इस श्रद्धा को अन्धविश्वास नहीं मानते। यह श्रद्धा विवेकपूर्ण विश्वास है, जो शास्त्र, गुरु और आत्मानुभूति की त्रिवेणी पर आधारित है। गुरु के प्रति श्रद्धा का अर्थ व्यक्तिपूजा नहीं, बल्कि उस ज्ञान-परम्परा के प्रति समर्पण है, जो अनादिकाल से ऋषियों द्वारा सुरक्षित रखी गई है। जब शिष्य विनय, श्रद्धा और निर्मल अन्तःकरण के साथ गुरु के समीप पहुँचता है, तभी श्रुति-वाक्यों का वास्तविक अर्थ उसके भीतर जीवित अनुभव बन जाता है।
मन्त्र का अन्तिम भाग है- “तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।” यहाँ प्रकाशन्ते शब्द सम्पूर्ण मन्त्र का हृदय है। उपनिषद् यह नहीं कहती कि गुरु शिष्य को नया ज्ञान प्रदान करते हैं; वह कहती है कि शास्त्रों के अर्थ प्रकाशित होते हैं। अर्थात् सत्य पहले से विद्यमान है; केवल अविद्या का आवरण हटना शेष है। भगवान आदि शंकराचार्य बार-बार प्रतिपादित करते हैं कि आत्मा कभी अज्ञात नहीं होती, वह स्वयंप्रकाश है; अज्ञान केवल उसके वास्तविक स्वरूप को ढँक देता है। जब गुरु के उपदेश, शास्त्र के प्रमाण और शिष्य की पराभक्ति एक साथ मिलते हैं, तब वही सत्य अपने आप प्रकाशित हो जाता है।
यहाँ महात्मा शब्द भी अत्यन्त अर्थगर्भित है। महात्मा वह नहीं जो केवल विद्वान् हो, अपितु वह है जिसका अन्तःकरण विशाल, निर्मल, अहंकाररहित और सत्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो। ऐसे साधक के लिए उपनिषद् के महावाक्य केवल वाक्य नहीं रहते; वे प्रत्यक्ष अनुभूति का द्वार बन जाते हैं। “तत्त्वमसि”, “अहं ब्रह्मास्मि”, “प्रज्ञानं ब्रह्म” और “अयमात्मा ब्रह्म” जैसे महावाक्य उसी महात्मा के अन्तःकरण में प्रकाशित होकर उसे अद्वैत सत्य का साक्षात्कार कराते हैं।
दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र अद्वैत वेदान्त में भक्ति और ज्ञान के अद्भुत समन्वय का उद्घोष करता है। सामान्यतः भक्ति और ज्ञान को पृथक् मार्ग समझा जाता है, किन्तु भगवत्पादाचार्य के मत में निर्मल भक्ति ज्ञान की भूमि तैयार करती है, और पूर्ण ज्ञान भक्ति की पराकाष्ठा है। श्रद्धा से चित्त शुद्ध होता है, गुरु से सम्यक् उपदेश प्राप्त होता है, मनन से संशय दूर होता है, निदिध्यासन से सत्य प्रत्यक्ष होता है और अन्ततः आत्मा का ब्रह्मस्वरूप प्रकाशित हो जाता है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद्
अर्नब गोस्वामी गरजे 🔥
– यह देश तुम्हारे बाप का नहीं, देश हम सबका है
– यह देश CJP में शरजील इमाम के गुर्गों के बाप का नहीं
– यह देश उमर खालिद के गुर्गे अभिजीत दीपके के बाप का नहीं
– यह देश 27 जेंडर की मांग करने वालों के बाप का नहीं
– यह देश BitChat के जरिए हिंसा ...
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
शारदीय नवरात्रि के द्वितीय दिवस पर माँ दुर्गा के द्वितीय स्वरूप माँ ब्रह्मचारिणी जी की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि एवं सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो।
।। माँ चन्द्रघण्टा ।।
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ।।
"शारदीय नवरात्रि" का तृतीय दिवस उस भगवती का है, जिनके भाल पर घण्टाकार अर्धचन्द्र सुशोभित है। इस नाम में ही साधना का सम्पूर्ण रहस्य निहित है। श्रुति कहती है - "चन्द्रमा मनसो जातः" (पुरुषसूक्त); चन्द्र मन का प्रतीक है, और घण्टा का नाद प्रणव का। जब मन प्रणव-नाद में लीन होता है, तब द्वैत का समस्त प्रपञ्च स्वतः शान्त हो जाता है।भगवान् गौडपाद की जिस कारिका पर भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि श्रीशंकराचार्य ने भाष्य रचा, वह यही उद्घोष करती है -
मनोदृश्यमिदं द्वैतं यत्किञ्चित्सचराचरम् ।
मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ।।
(“माण्डूक्यकारिका”)
भगवत्पाद सौन्दर्यलहरी में एक अद्भुत रहस्य खोलते हैं कि अन्य देवगण अपने हाथों से अभय और वर की मुद्रा प्रदर्शित करते हैं, किन्तु हे जगदम्बा ! आपको ऐसी किसी मुद्रा की आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि -
"भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं ।
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ।।"
(“सौन्दर्यलहरी”)
अद्वैत के आलोक में इसका मर्म अत्यन्त गम्भीर है। मुद्रा वहाँ होती है जहाँ देने वाला और लेने वाला दो हों, और श्रुति का निर्णय है, "द्वितीयाद्वै भयं भवति" (बृहदारण्यक) भय द्वितीय से ही उपजता है। माँ के चरणों में शरणागत का पृथक् अहं विगलित हो जाता है; जहाँ दूसरा ही नहीं, वहाँ भय कैसा ? अतः अभय माँ का दिया हुआ दान मात्र नहीं, आत्मा का अपना स्वरूप है : "अभयं वै ब्रह्म" (बृहदारण्यक)
माँ के चण्डकोपास्त्र किस पर उठते हैं? भाष्यकार के अनुसार समस्त संसार का मूल अध्यास है - "अतस्मिंस्तद्बुद्धिः"; जो आत्मा नहीं, उसमें आत्मबुद्धि, अर्थात् देह, इन्द्रिय और मन को "मैं" मान लेना। यही अविद्या साधक का वास्तविक शत्रु है, और काम, क्रोध, मोह उसकी सेना। माँ का कोप इसी अज्ञान पर है, साधक पर नहीं; उनकी विकरालता करुणा का ही प्रचण्ड रूप है। जब उनके अस्त्र अविद्या का छेदन करते हैं, तब श्रुतिवचन चरितार्थ होता है -
"भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥ ।।"
(“मुण्डकोपनिषद”)
एक सूक्ष्म संकेत और चन्द्रमा का अपना प्रकाश नहीं, वह सूर्य से आलोक पाता है। उसी प्रकार मन भी स्वयंप्रकाश नहीं; उसमें जो दीप्ति है, वह आत्मचैतन्य की ही आभा है - "तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति"
("कठोपनिषद्")
जिस क्षण साधक माँ के भाल पर शोभित चन्द्र में उस मूल प्रकाश को पहचान लेता है, उसी क्षण उपास्य और उपासक का भेद तिरोहित हो जाता है। तब माँ बाहर विराजमान कोई प्रतिमा मात्र नहीं रहतीं; वे साधक की अपनी चिति बनकर प्रकाशित होती हैं, और अन्तस् से एक ही स्वर उठता है -
"चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्"।
#चन्द्रघण्टा #शारदीय_नवरात्रि
#सनातन_संस्कृति
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‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित भारतीय सिनेमा के महान अभिनेता श्री अमिताभ बच्चन जी, आपको जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम जी आपको उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु प्रदान करें, यही कामना है।
त्याग और जनसेवा की प्रतिमूर्ति, विचारधारा की राजनीति में उच्च आदर्श स्थापित करने वाली श्रद्धेय राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।
लोक कल्याण के लिए उनका समर्पण और उनकी दृढ़ संकल्प शक्ति करोड़ों कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणापुंज है।
कृषि क्षेत्र में नवाचार और आधुनिक तकनीक को बढ़ावा देने के लिए ₹500 करोड़ के निवेश से राजस्थान एग्रीकल्चर एक्सीलरेटर मिशन शुरू करने का संकल्प।
#विकसित_ग्राम_समृद्ध_राजस्थान
सनातन संस्कृति में मनुष्य का जीवन पूर्वजों के पुरुषार्थ, ऋषियों की प्रज्ञा, माताओं की ममता और अनेक पीढ़ियों के त्याग से अनुप्राणित एक अनवरत यात्रा है। हमारे व्यक्तित्व में जो संस्कार हैं, हमारी वाणी में जो भाषा है, हमारे आचरण में जो मर्यादा है और हमारी चेतना में जो धर्मबोध है, उसके निर्माण में असंख्य पूर्वजों का मौन योगदान समाहित है। "सर्वपितृ अमावस्या" इसी अदृश्य उपकार के प्रति श्रद्धावनत होने का पावन अवसर है। इस दिन मनुष्य अपनी जीवनधारा के उद्गम का स्मरण करता है और कृतज्ञ हृदय से स्वीकार करता है कि उसकी उपलब्धियों की पृष्ठभूमि में अनेक जीवनों की साधना विद्यमान है।
पितृपक्ष की पूर्णता के रूप में प्रतिष्ठित सर्वपितृ अमावस्या, जिसे "महालय अमावस्या" भी कहते हैं, समस्त ज्ञात व अज्ञात पितरों के श्रद्धापूर्वक स्मरण का दिन है। विशेषतः जिन पूर्वजों की देहावसान-तिथि ज्ञात नहीं है अथवा जिनका श्राद्ध नियत तिथि पर नहीं हो सका, उनके निमित्त भी इस अमावस्या पर श्राद्ध और तर्पण करने की परम्परा है। इस पर्व की भावना में पितृकुल व मातृकुल, दोनों के प्रति आदर समाहित है।
"सर्वपितृ" शब्द हमारे स्मरण को व्यापक बनाता है। कुछ पूर्वजों के नाम कुलवृत्तान्त में सुरक्षित रहते हैं; कुछ की छवियाँ परिवार की स्मृतियों में जीवित रहती हैं; और कुछ काल के विस्तार में अनाम हो जाते हैं। उनकी पहचान विस्मृत हो सकती है, किन्तु हमारे अस्तित्व के निर्माण में उनका योगदान बना रहता है। श्रद्धा उस सम्बन्ध को भी प्रणाम करती है, जिसे स्मृति अब नाम देकर पुकार नहीं सकती।
ऋग्वेद के पितृसूक्त में इसी व्यापक स्मरण की अत्यन्त उदात्त अभिव्यक्ति है-
"ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म।
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व ।।"
जो पितर यहाँ हैं और जो यहाँ नहीं हैं, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें नहीं जानते, हे जातवेदस् अग्नि ! आप उन सबको जानते हैं; स्वधा से युक्त इस सुकृत यज्ञ को स्वीकार कीजिए। इस मन्त्र की भावना हमें अपनी सीमित जानकारी से आगे बढ़कर समस्त पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखने की प्रेरणा देती है।
पितृस्मरण की यह वैदिक भूमि अत्यन्त मंगलमयी है। यहाँ पूर्वजों के प्रति आदर के साथ उनके अनुग्रह और संरक्षण की प्रार्थना भी है।
"उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ।।
“ऋग्वेद”
इस मंत्र में विविध श्रेणियों के सोमभागी पितरों का आवाहन करते हुए प्रार्थना की गई है कि अहिंसक और ऋतज्ञ पितर हमारी पुकार पर हमारी रक्षा करें। पितरों के लिए प्रयुक्त ‘ऋतज्ञ’ विशेषण उनके स्मरण को सत्य, यज्ञ और धर्ममय व्यवस्था के प्रति आदर से जोड़ता है।
पूर्वजों के प्रति हमारी कृतज्ञता उनके सद्गुणों के अनुकरण में भी अभिव्यक्त होनी चाहिए। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में परिवार को सँभाला, परिश्रम से आजीविका अर्जित की, अतिथियों का सत्कार किया, धर्म की रक्षा की और अगली पीढ़ी के लिए अपने सुखों का त्याग किया। उनके इन गुणों को अपने आचरण में प्रतिष्ठित करना पितृस्मृति को जीवन्त बनाता है। जिस घर में बड़ों का सम्मान, सम्बन्धों में संवेदना और व्यवहार में सत्य बना रहता है, वहाँ पूर्वजों की शुभ परम्परा निरन्तर फलित होती रहती है।
इसी उत्तरदायित्व का उपदेश "तैत्तिरीयोपनिषद्" अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में देता है -
"देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।
“तैत्तिरीयोपनिषद्”
देवताओं और पितरों से सम्बन्धित कर्तव्यों में प्रमाद न हो; माता, पिता, आचार्य और अतिथि के प्रति देवभाव रखा जाए। यह उपदेश श्रद्धा को दैनिक जीवन का अनुशासन बनाता है।
इसलिए "सर्वपितृ अमावस्या" हमें जीवित माता-पिता और परिवार के वरिष्ठजनों के प्रति अपने व्यवहार का भी अवलोकन कराती है। क्या हम उनके लिए समय निकालते हैं? क्या उनके अनुभवों को धैर्यपूर्वक सुनते हैं? क्या उनकी असहाय अवस्था में उन्हें स्नेह और सम्मान देते हैं? दिवंगत पूर्वजों का तर्पण और जीवित वृद्धजनों की सेवा, दोनों एक ही कृतज्ञ चेतना की अभिव्यक्तियाँ हैं। श्रद्धा की गहराई तभी प्रकट होती है, जब वह हमारे समय, व्यवहार और सेवा में उतरती है।
पौराणिक साहित्य में पितृकर्म के साथ सामर्थ्य और श्रद्धा का सुन्दर समन्वय मिलता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है -
"कुर्यादपरपक्षीयं मासि प्रौष्ठपदे द्विजः ।
श्राद्धं पित्रोर्यथावित्तं तद्बन्धूनां च वित्तवान् ।।
“श्रीमद्भागवत महापुराण”
यहाँ पितृपक्ष में अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार पितरों तथा उनके बान्धवों के निमित्त श्राद्ध करने का विधान है।
#सर्वपितृ_अमावस्या #AvdheshanandG_Quotes #AvdheshanandG_Mission
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ।
अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्दनमिवानलम् ।।१९।।
(षष्ठोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र उपनिषद्-वाङ्मय के उन दिव्य घोषों में से है, जिनमें परमब्रह्म की परमार्थ सत्ता का अत्यन्त सूक्ष्म, निष्कर्षात्मक और अद्वैतमय स्वरूप उद्घाटित हुआ है। यहाँ उपनिषद् परमात्मा के उन स्वरूप-लक्षणों का निरूपण करती है, जो किसी भी प्रकार के नाम, रूप, क्रिया, परिवर्तन, दोष अथवा सीमाबोध से सर्वथा परे हैं। भगवत्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य अपने अद्वितीय भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि यह मन्त्र ब्रह्म के तटस्थ लक्षणों का नहीं, अपितु उसके स्वरूपलक्षणों का निरूपण करता है। यह वही परम तत्त्व है, जिसकी प्राप्ति के पश्चात् साधक समस्त बन्धनों से मुक्त होकर अपने नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप का अनुभव करता है।
मन्त्र का प्रथम पद है- “निष्कलम्”। भगवत्पाद के अनुसार “कला” का अर्थ है- अवयव, अंश अथवा विभाजन। जो किसी भी प्रकार के अवयवों से रहित है, जो खण्डित नहीं, अपितु अखण्ड है, वही निष्कल ब्रह्म है। समस्त दृश्य जगत् अनेक भागों में विभक्त दिखाई देता है, किन्तु ब्रह्म में किसी प्रकार का आन्तरिक अथवा बाह्य विभाजन सम्भव नहीं। वह अद्वितीय है- “एकमेवाद्वितीयम्”। जीव, जगत् और ईश्वर का भेद भी अन्ततः अविद्या की दृष्टि में है; ज्ञान की दृष्टि में केवल वही अखण्ड चैतन्य शेष रहता है।
दूसरा विशेषण है- “निष्क्रियम्”। ब्रह्म किसी कर्म का कर्ता नहीं है, न उसमें कोई प्रयत्न, परिवर्तन या प्रवृत्ति है। भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि समस्त क्रियाएँ प्रकृति, उपाधियों और मायिक नाम-रूपों में घटित होती हैं। परमात्मा स्वयं सदा अकर्ता, अभोक्ता और साक्षीस्वरूप है। जैसे सूर्य स्वयं स्थिर रहकर भी समस्त क्रियाओं का प्रकाशक है, वैसे ही ब्रह्म समस्त कर्मों का आधार होते हुए भी उनसे सर्वथा असंग रहता है। इसीलिए गीता भी कहती है -“नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।”
इसके पश्चात् मन्त्र कहता है - “शान्तम्”। यहाँ शान्ति का अर्थ केवल मानसिक स्थिरता नहीं, अपितु समस्त विकारों, विकल्पों और परिवर्तन से परे नित्य आत्मस्वरूप है। जहाँ इच्छा नहीं, द्वेष नहीं, राग नहीं, भय नहीं, वहाँ परम शान्ति है। भगवत्पाद के अनुसार ब्रह्म नित्य निर्विकार होने के कारण ही शाश्वत शान्ति का स्वरूप है। संसार की अशान्ति परिवर्तन से उत्पन्न होती है; ब्रह्म में परिवर्तन का अभाव होने से वहाँ केवल अनन्त शान्ति ही शेष रहती है।
“निरवद्यम्” का अर्थ है, जिसमें किसी प्रकार का दोष, अपूर्णता अथवा अवगुण नहीं। संसार की प्रत्येक वस्तु किसी न किसी सीमा, परिवर्तन अथवा दोष से युक्त है, किन्तु ब्रह्म सर्वथा निर्दोष है। उसमें न जन्म है, न क्षय, न दुःख, न विकार। भगवत्पादाचार्य कहते हैं कि दोष का सम्बन्ध सदैव उपाधियों से होता है; आत्मा अपने स्वरूप से कभी दोषग्रस्त नहीं होती। अज्ञान के कारण ही जीव स्वयं को सीमित मान लेता है।
अगला पद है- “निरञ्जनम्”। “अञ्जन” का अर्थ है- लेप अथवा रंग। जो किसी भी प्रकार के संसर्ग, मल, कर्मफल अथवा मायिक आवरण से स्पर्शित नहीं होता, वही निरञ्जन है। भगवत्पाद इस पद का अत्यन्त सूक्ष्म अर्थ करते हुए कहते हैं कि ब्रह्म पर न पुण्य का लेप है, न पाप का; न गुणों का संसर्ग है, न कर्म का बन्धन। जैसे निर्मल आकाश धूल अथवा धुएँ से वास्तव में मलिन नहीं होता, वैसे ही आत्मा कभी मलिन नहीं होती। मलिनता केवल अज्ञानजनित अध्यास है।
इसके उपरान्त उपनिषद् कहती है- “अमृतस्य परं सेतुम्”। यहाँ “सेतु” का अर्थ केवल पुल नहीं, अपितु वह साधन, वह आधार और वह मर्यादा है जिसके द्वारा साधक मृत्यु के पार अमृतत्व को प्राप्त करता है। भगवत्पाद के अनुसार ब्रह्मज्ञान ही वह परम सेतु है, जिसके द्वारा जीव संसार-सागर का अतिक्रमण करता है। यह कोई बाह्य मार्ग नहीं, अपितु आत्मस्वरूप की प्रत्यक्ष अनुभूति है। जब अविद्या का अन्त होता है, तभी अमृतत्व की सिद्धि होती है। अतः ब्रह्म स्वयं अमृतस्वरूप भी है और अमृत की प्राप्ति का परम आश्रय भी।
मन्त्र का अन्तिम उपमान अत्यन्त मार्मिक है- “दग्धेन्दनमिवानलम्”। जैसे ईंधन पूर्णतः जल जाने पर अग्नि की ज्वाला स्वतः शान्त हो जाती है, उसी प्रकार जब ज्ञानाग्नि समस्त अविद्या, वासनाओं और कर्मबीजों को भस्म कर देती है, तब संसार-बन्धन का सम्पूर्ण व्यापार समाप्त हो जाता है। भगवत्पाद इस उपमा का प्रयोग जीवन्मुक्ति की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए करते हैं। जहाँ अविद्या ही नहीं रही, वहाँ संसार की प्रतीति भी नहीं रहती। शेष रहता है केवल स्वप्रकाश, निर्विकल्प, अखण्ड ब्रह्म। अद्वैत वेदान्त का समस्त साधना-पथ इसी मन्त्र में समाहित है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद्
विश्व डाक दिवस पर @IndiaPostOffice परिवार के सभी समर्पित डाक कर्मियों को हार्दिक शुभकामनाएं।
देश के कोने-कोने तक सेवा और अपनत्व पहुंचाने वाले हमारे डाक कर्मियों का हार्दिक अभिनंदन।
भारतीय जनता पार्टी के ऊर्जावान पूर्व प्रदेश महामंत्री, खंडार विधानसभा क्षेत्र के यशस्वी विधायक, बड़े भाई श्री जितेन्द्र गोठवाल जी को जन्मदिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
देवाधिदेव महादेव से आपके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु जीवन की कामना करता हूँ।
@JitenGothwal
25 वर्षों की सेवा यात्रा ने राजनीति को जनसेवा और जनविश्वास को राष्ट्रनिर्माण की शक्ति बनाया। गुजरात के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानसेवक तक, आदरणीय श्री @narendramodi जी का जीवन राष्ट्रसेवा के संकल्प को समर्पित रहा है।
इस गौरवशाली अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ।
#25YearsOfSeva
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।
तं ह देवं आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ।।१८।।
(षष्ठोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह समापन मन्त्र सम्पूर्ण उपनिषद् का हृदय, उसका आध्यात्मिक निष्कर्ष और ब्रह्मविद्या का परम उद्घोष है। पूर्ववर्ती मन्त्रों में उपनिषद् ने जिस परमब्रह्म को विश्व का कारण, अन्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, निर्गुण, स्वयंप्रकाश तथा मोक्ष का एकमात्र आधार बताया था, उसी परमदेव के प्रति यह मन्त्र एक मुमुक्षु साधक की पूर्ण श्रद्धा, विनय, आत्मसमर्पण और ज्ञान-पिपासा का दिव्य निवेदन बन जाता है। भगवत्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि यहाँ शरणागति किसी सीमित देवता की नहीं, अपितु उस परमब्रह्म की है, जो समस्त ज्ञान का मूल स्रोत, समस्त वेदों का उद्गम और आत्मज्ञान का स्वयंप्रकाश स्वरूप है।
मन्त्र का प्रथम पद - “यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्” घोषणा करता है कि सृष्टि के आदि में जिस परमात्मा ने ब्रह्मा का आविर्भाव किया और उन्हें सृष्टि-कार्य के लिए समर्थ बनाया, वही समस्त सृष्टि का परम कारण है। भगवत्पाद स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्मा स्वयं स्वतंत्र, परम या स्वयंसिद्ध सत्ता नहीं हैं; वे भी ईश्वर की आज्ञा और अनुग्रह से कार्य करने वाले प्रथम प्रजापति हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि परमब्रह्म ही ब्रह्मा सहित समस्त देवताओं का भी परमाधार है।
“यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै”- यह पद वेदों की दिव्य उत्पत्ति का रहस्य उद्घाटित करता है। वेद किसी मनुष्य की रचना नहीं हैं; वे परमात्मा से प्रकट दिव्य ज्ञान हैं। भगवत्पादाचार्य के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ही ब्रह्मा के अन्तःकरण में वेदों का प्रकाश करते हैं, जिससे सृष्टि का धर्म, ऋत और ज्ञान-परम्परा स्थापित होती है। इस प्रकार समस्त शास्त्र, समस्त विद्याएँ और समस्त आध्यात्मिक मार्ग उसी परमचैतन्य से प्रकाशित होते हैं।
मन्त्र का तृतीय चरण - “तं ह देवं आत्मबुद्धिप्रकाशम्” इस सम्पूर्ण मन्त्र का दार्शनिक केन्द्र है। परमात्मा को यहाँ “आत्मबुद्धिप्रकाश” कहा गया है। भगवत्पाद के अनुसार इसका अर्थ है कि वही परमदेव बुद्धि को प्रकाशित करता है, वही आत्मतत्त्व का प्रकाशक है और वही प्रत्येक ज्ञान का अन्तःप्रकाश है। मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ स्वयं जड़ हैं; वे अपने आप किसी वस्तु को नहीं जान सकतीं। जिस चेतना के कारण बुद्धि विचार करती है, विवेक उत्पन्न होता है और आत्मज्ञान सम्भव होता है, वही ब्रह्म है। अतः परमात्मा केवल बाह्य जगत् का प्रकाशक नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार का भी परम आलोक है।
यहाँ “देव” शब्द का अर्थ भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भगवत्पादाचार्य बताते हैं कि “देव” वह है जो स्वयं प्रकाशमान है और जो अन्य सबको प्रकाशित करता है। परमात्मा किसी अन्य प्रकाश से ज्ञात नहीं होता; वह स्वयंप्रकाश चैतन्य है, जिसके कारण समस्त प्रमाण, समस्त ज्ञान और समस्त अनुभव सम्भव होते हैं। यही अद्वैत वेदान्त में स्वयंज्योतिः अथवा स्वप्रकाश ब्रह्म का सिद्धान्त है।
अन्तिम चरण -“मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये” इस मन्त्र का भावात्मक और आध्यात्मिक शिखर है। यहाँ साधक स्वयं को मुमुक्षु मोक्ष की तीव्र अभिलाषा रखने वाला घोषित करता है। उसकी शरणागति किसी लौकिक सिद्धि, स्वर्ग, ऐश्वर्य या भोग के लिए नहीं, बल्कि केवल आत्मज्ञान और मोक्ष के लिए है। भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक शरणागति का अर्थ है कि अविद्या, अहंकार और देहाभिमान का परित्याग कर अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को सत्य की ओर समर्पित कर देना। यह समर्पण ज्ञान का विरोधी नहीं, बल्कि ज्ञान की सर्वोच्च तैयारी है। विनय, श्रद्धा और गुरु-उपदिष्ट ब्रह्मविद्या के प्रति पूर्ण ग्रहणशीलता के बिना आत्मसाक्षात्कार सम्भव नहीं।
अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से इस मन्त्र का एक और गूढ़ अर्थ है। प्रारम्भ में साधक परमात्मा की शरण ग्रहण करता है, क्योंकि उसे ईश्वर और अपने बीच भेद का अनुभव होता है। किन्तु ज्ञान के उदय पर वही साधक अनुभव करता है कि जिसकी शरण वह गया था, वही उसके अपने आत्मस्वरूप के अतिरिक्त और कोई नहीं। इस प्रकार शरणागति का चरम परिणाम अद्वैत की अनुभूति है, जहाँ उपासक, उपास्य और उपासना तीनों का भेद विलीन हो जाता है।
साहित्यिक दृष्टि से भी यह मन्त्र अत्यन्त करुण, विनम्र और भावपूर्ण है। यहाँ न कोई दार्शनिक अहंकार है, न बौद्धिक प्रदर्शन; यहाँ केवल एक जिज्ञासु आत्मा की मौन पुकार है, जो समस्त बाह्य आश्रयों का त्याग कर उस परम प्रकाश की शरण में आती है, जहाँ से समस्त ज्ञान का उदय होता है। यही उपनिषदों की वास्तविक साधना है।
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केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री श्री @jitanrmanjhi जी बाबूजी को जन्मदिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
देवाधिदेव भगवान महादेव जी से आपके उत्तम स्वास्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना करता हूँ ।
महान गौसेवक, पर्यावरणविद् एवं श्रीराधा रानी के अनन्य भक्त, श्रीमान मंदिर धाम गहवरवन बरसाना के पद्मश्री संत श्री रमेश बाबा जी के ब्रह्मलीन होने का समाचार अत्यंत दुःखद है।
प्रभु दिवंगत पुण्यात्मा को श्रीचरणों में स्थान दें एवं सभी भक्तों को यह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।
सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता की चेतना को जन-जन तक पहुँचाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी तथा सादगी, शुचिता और दृढ़ संकल्प के प्रेरक आदर्श पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर उन्हें श्रद्धापूर्वक शत-शत नमन।
श्रद्धेय महात्मा गांधी जी ने सत्य को जीवन की साधना और अहिंसा को नैतिक साहस की शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनके सत्याग्रह में अन्याय के प्रतिरोध का दृढ़ संकल्प था और मानवता के प्रति गहरी संवेदना भी। उनके जीवन से हमें प्रेरणा मिलती है कि विचार, वाणी और आचरण की एकरूपता ही चरित्र को विश्वसनीय बनाती है। स्वच्छता, स्वावलम्बन, श्रम की गरिमा और समाज के वंचित जनों के प्रति संवेदनशीलता के उनके आदर्श आज भी हमारे व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय जीवन को दिशा देते हैं।
भारत के गौरव लाल बहादुर शास्त्री जी ने अपने सरल जीवन और कर्तव्यनिष्ठ नेतृत्व से सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, विनम्रता और उत्तरदायित्व का उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत किया। उनका अमर उद्घोष ‘जय जवान, जय किसान’ राष्ट्र की सुरक्षा और समृद्धि के आधारभूत पुरुषार्थ का अभिनन्दन है। सीमाओं पर सजग प्रहरी बनकर खड़े हमारे जवान और खेतों में अथक परिश्रम करने वाले हमारे किसान दोनों के त्याग, श्रम और समर्पण से देश का वर्तमान सुरक्षित होता है और भविष्य सुदृढ़ बनता है।
इन दोनों महापुरुषों की जीवनयात्रा हमें अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहने और राष्ट्रहित में निरन्तर योगदान देने का आह्वान करती है। सत्य के प्रति निष्ठा, व्यवहार में करुणा, कर्म में ईमानदारी और सेवा में निःस्वार्थता- इन मूल्यों को अपनाकर हम उनके आदर्शों को अपने समय में सार्थक कर सकते हैं। राष्ट्र की उन्नति प्रत्येक नागरिक के सजग आचरण, अनुशासित पुरुषार्थ और परस्पर विश्वास से सम्भव होती है।
इस पावन अवसर पर हम संकल्प लें कि अपने जीवन में सत्य, सद्भाव और सेवा को स्थान देंगे; श्रम का सम्मान करेंगे तथा राष्ट्र की एकता, गरिमा और समृद्धि के लिए अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करेंगे। इन महान विभूतियों की स्मृति के प्रति हमारी श्रद्धा सत्कर्मों में अभिव्यक्त हो- यही उनके प्रति सार्थक श्रद्धांजलि होगी।
श्रद्धेय महात्मा गांधी जी एवं भारत के गौरव स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी की पावन स्मृति को सादर नमन !
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केंद्रीय राज्यमंत्री आदरणीय श्री @shripadynaik जी को जन्मदिन की आत्मीय बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।
ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सदैव स्वस्थ, प्रसन्न और ऊर्जावान रहें तथा इसी तरह जनसेवा में निरंतर सक्रिय रहें।
भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री एवं राज्यसभा सांसद डॉ. @SandeepPathak04 जी भाईसाहब को जन्मदिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
ईश्वर से आपके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु जीवन की कामना करता हूँ।