हम लोग भी गरीब है
पंडित जी, यादव लोग भी गरीब है
उनको भी ज़मीन मिलना चाहिए ना?
भरत तिवारी सर्व समाज की लड़ाई लड़ते थें,
ऐसे युवा ही समाज को बेहतर दिशा दे सकते हैं
आज पुलिस प्रशासन और सरकारो की विफलता है कि आम जनता भारत भूषण तिवारी के विरुद्ध एक भी बात सुनने को तैयार नही है।
यही स्थिति रही तो एक दिन जनता पुलिस को पुलिस अधिकारियो को अधिकारी और नेताओं को नेता मानने से भी इंकार कर देगी । तब क्या होगा उसकी कल्पना इन बेईमानों को कर लेनी चाहिए।
अगर भरत भूषण तिवारी की जगह कोई और होता, तो शायद अब तक सत्ता और विपक्ष दोनों के नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस हो चुकी होती। टीवी डिबेट में चीख-पुकार मची होती। निष्पक्ष जांच की मांग पूर�� देश में गूंज रही होती।
लेकिन यहां सवाल किसी जाति का नहीं, सवाल न्याय का है।
जिस देश में माओवादी ��र नक्सली तक हथियार डालकर सरेंडर करते हैं तो उन्हें कानून के तहत सुनवाई का मौका दिया जाता है, पुनर्वास की बात होती है…
तो फिर अगर भरत भूषण तिवारी ने वास्तव में हथियार छोड़ दिए थे, तो उन्हें अदालत तक पहुंचने का मौका क्यों नहीं मिला?
यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि आज मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि कानून के राज पर भरोसे का है।
और हां, एक बात और…
अगर भरत तिवारी की जगह कोई भरत पासवान, भरत म���ंझी, भरत यादव, भरत पटेल या भरत खान होता, तो शायद न्याय की मांग करने वालों की कतार कहीं लंबी होती।
बिहार के भरत तिवारी हत्याकांड मामले में सभी समाज के लोग आवाज़ उठा रहे है। एक दलित महिला भरत को भगवान बोल रही थी। अब यह पासवान चाचा रो रहे हैं
इससे इतना समझ आ रहा कि समाजसेवी भरत तिवारी ने ग्रामीणों के लिए बहुत कार्य किए है। यह किसी एक समाज का नहीं बल्कि सर्व समाज का मामला है।
"केवल चुनाव जीत लेना किसी को मनमानी करने का अधिकार नहीं देता। लोकतंत्र का मूल उद्देश्य जनता की सेवा, सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करना है।
जब तक राजनीति में अपराधी मानसिकता के लोग प्रभावी बने रहेंगे, तब तक आम नागरिक हत्या, बलात्कार, लूट, भ्रष्टाचार और अन्याय जैसी समस्याओं से जूझ��ा रहेगा। जो व्यक्ति स्वयं अपराध और अनैतिकता की पृष्ठभूमि से आया हो, उससे सुशासन की अपेक���षा करना कठिन है। स्वाभाविक है कि वह ऐसी पुलिस, ऐसी जांच एजेंसियां, ऐसे कानून और ऐसी न्याय व्यवस्था चाहता होगा जो उसके हितों की रक्षा करे, जनता के अधिकारों की नहीं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद, विधानसभाओं और सरकारों में बैठे आपराधिक छवि वाले तत्वों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से बाहर का रास्ता दिखाया जाए। जब तक राजनीति का अपराधीकरण समाप्त नहीं होगा, तब तक किसी न किसी 'भरत तिवारी' ���ो अन्याय और अपराध का शिकार होकर बलिदान देना पड़ता रहेगा।
राष्ट्रहित में राजनीति का शुद्धिकरण और जवाबदेह शासन व्यवस्था समय की सबसे बड़ी मांग है।"
मरकर भी अमर नाम है उस जीव का जग में प्रभु प्रेम में वलिदान जो जीवन किया करे l जिसके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा उस नाम को मिटाना किसी सम्राट के वश में नहीं है l लाखों सम्राट इस धरा पर आये और चले गए पर जो भरत आये वो दिखा गए कि उनके नाम की क्या महिमा है l