#WATCH | Ahmedabad, Gujarat | On the Satya Niketan building collapse, AAP leader Gopal Rai says, “Given the series of accidents continuously occurring in Delhi and with the Bharatiya Janata Party government making excuses every time, lives are constantly being put at stake. I want to tell the BJP government that if such incidents keep happening, the public will be forced to launch a protest against the government; Delhi is no longer in a position to tolerate so many deaths. They issue the same statement after every incident; people are losing their lives, yet the BJP government's Chief Minister merely issues statements…”
-छनकर/कुशाग्र अद्वैत (पूरी कविता)
मेज़ पर रखी चाय
अभी छानकर आई है
कुछ पत्ती नीचे छूट गई है
मेरे पीछे दीवार पर जो
सुंदर अल्पना बनाती है
वह धूप इस बैठक में
कुछ छनकर आती है
इस महादेश में
सोहनी की तरह
मुझ तक सब ख़बरें भी
बहुत पहरेदारी, क़िलेबंदी से
होकर-छिपकर-छानकर आती हैं
कुछ तो अधरस्ते ही डूब जाती हैं
एक तुम ही हो जो
छनकर नहीं आती
एक अपूर्व संसार के
दर्शन हो कराती
मेरी जान
छनन-छनन आओ मेरे पास
पायल पहनकर
हम बस
दो दिनों के लिए मिले हैं
दो दिन तक तो
पहनी जा सकती है पायल!
दो दिन तो
सुन लूँ
घुँघरूओं का बजना
फिर पीछे
तुम्हारी बिंदी
भूल जाऊँ शायद!
निश्चित ही
भूल जाऊँगा पापड़
भूल जाऊँगा तहरी
दो दिन यदि बजी पायल
उसकी हिलोर रहेगी भीतर
मुझे दौड़ाती, मुझे तैराती
दो दिन
कितने कम होते हैं
दो लिखने में
एक से भी
कम जगह घिरती है
दो दिनों में
बहुत कम भी सोओगी
तो दस घण्टे होंगे
कम अज़ कम
दस कितना वजनी लगता है
जैसे ग्यारह, जैसे बारह
दो में ही बस
कोई वज़्न नहीं है
दो दिन में
कुल कितने पहर होते हैं
कितने घण्टे, कितने मिनट
किसी को मालूम है?
मुझे कुछ मालूम नहीं
दो दिन में दो लोग
एक शहर नहीं नाप सकते
पूरम पूर
दो दिन में
तुम्हारे लिए आख़िर
कितनी कविताएँ पढ़ लूँगा
दो दिन में हम
कैसे समेटेंगे
सारा वसंत, सारा आषाढ़
दो दिन तो तुम्हारे
दो स्तन ही ले लेंगे
बची देहराशि के लिए
एक जीवन भी कम है
फिर तुम्हारा मन है
छन-छन आओ
न आओ
दो ही दिन हैं
जो है
जैसा है
कहो, बताओ
जब तुम ज़िद करती हो ना,तो बहुत प्यारी लगती हो बिल्कुल उस छोटे से बच्चे की तरह,जो किसी चीज़ को पाने के लिए बेहद उत्सुक तो होता है,लेकिन रोता नहीं बस मासूमियत से उसे पाने की उम्मीद लगाए रहता है तुम्हारी वही मासूम ज़िद मेरे चेहरे पर अपने आप मुस्कान ले आती है...!
तुम से बातों में कुछ इस दर्जा मगन होता हूँ
मुझ को बातों में मगन छोड़ के जा सकते हो
जाने वाले से सवालात नहीं होते मियाँ
तुम यहाँ अपना बदन छोड़ के जा सकते हो
जाना चाहो तो किसी वक़्त भी ख़ुद से बाहर
अपने अंदर की घुटन छोड़ के जा सकते हो
थक गए हो तो थकन छोड़ के जा सकते हो,
तुम मुझे वाक़ि'अतन छोड़ के जा सकते हो।
हम दरख़्तों को कहाँ आता है हिजरत करना,
तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो।।
थक गए हो तो थकन छोड़ के जा सकते हो,
तुम मुझे वाक़ि'अतन छोड़ के जा सकते हो।
हम दरख़्तों को कहाँ आता है हिजरत करना,
तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो।।
बुलंदी का नशा सिम्तों के जादू तोड़ देती है,
हवा उड़ते हुए पंछी के बाज़ू तोड़ देती है !
सियासी भेड़ियों थोड़ी बहुत ग़ैरत ज़रूरी है,
तवायफ़ तक किसी मौक़े पे घुँघरू तोड़ देती है !
~तुफ़ैल चतुर्वेदी
𝑳𝒐𝒐𝒌 𝒘𝒉𝒐’𝒔 𝒃𝒂𝒄𝒌, 𝒃𝒂𝒄𝒌 𝒂𝒈𝒂𝒊𝒏 🎶
𝑽𝑲’𝒔 𝒃𝒂𝒄𝒌, 𝒕𝒆𝒍𝒍 𝒂 𝒇𝒓𝒊𝒆𝒏𝒅 🤩🔥
Our contingent of 1️⃣5️⃣ ready to play some ODI cricket in the English summer. ☀️💙
#PlayBold#ನಮ್ಮRCB