@MrigendraSpeaks पुराने दौर में इतिहास लिखा जाता था दरबारी इतिहासकारों द्वारा, तो महिमामंडन आसान था, आज के दौर में इतिहास के रेफरेंस के लिए बहुत सारे साक्ष्य देखने, सुनने के माध्यम उपलब्ध है, तो जो सच था वही लिखा, देखा जाएगा ।
बेकार अपेक्षाएं करना नहीं चाहिए ।
@sohitmishra99 बस अब कुछ मत बोलो, आया समझ में की पप्पू परिवार के हो रोम प्रेमी ।
कल धरती पाताल एक कर लिया अगले को बदनाम करने लेकिन सिर्फ एक भजन में जाकर तुम सारे लोगों का माइंड जैम कर दिया अगले ने।
@MrigendraSpeaks भाई थोड़ा रुको, अभी तक सिर्फ आरोप और झूठ की गूंज करते रहे हो, अब तुम लोगो के आरोपों की चीर फाड़ का समय आया है, सब्र करो, धैर्य रखो बहुत बुर्के फटने वाले है ।
#EC
आसान शब्दों में समझते हैं —गोवा के 97 नामों वाला मामला एक बहुत ही यूनिक और स्पेशल केस है, जेनरिक inclusion case नहीं।
इन मामलों में गोवा के स्थानीय Goa ERO पहले adverse/rejection decision दे चुके थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद “logical discrepancies” वाले करीब 650 मामलों को दोबारा देखने की प्रक्रिया चली। नए दस्तावेज़/आपत्तियाँ और सुनवाई के बाद इनमें से 97 मामलों में ERO/AERO इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मतदाता eligible हैं।
तकनीकी अड़चन यह थी कि ECINet में स्थानीय ERO के पास अपने ही पहले से दर्ज negative decision को rollback/reverse करने का विकल्प नहीं था। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि ERO के पास सामान्य तौर पर नाम जोड़ने का अधिकार नहीं है।
अगर ERO नाम जोड़ ही नहीं सकता, तो फिर उत्तर प्रदेश में करीब 84 लाख, बिहार में करीब 21 लाख और तमिलनाडु में करीब 42 लाख नाम verification/claims के बाद electoral roll में वापस कैसे आए?
यानी सामान्य inclusion और पहले से दर्ज adverse decision को software में reverse करना—दो अलग चीजें हैं।
@RitikaChopra__ जी इसी बेहद असामान्य 97-case exception को उठाकर चालाकी से ऐसे पेश कर रही हैं, मानो यही सामान्य प्रक्रिया हो।
असली distinction यहीं है।