योगीजी ने बोला था ना....
अपराध किया तो अगले चौराहे पे यमराज़ मिलेंगे
नहीं माना... बबलू... और मुज़फ्फरनगर में
महिला के कान से कुंडल खींचकर भागने लगा..
और मिल गए यमराज़... निपट गए दोनों पैर 🔥
WellDone @muzafarnagarpol ✊
@SonOfBharat7 उक्त प्रकरण मे थाना नई मण्डी पुलिस द्वारा सुसंगत धाराओं मे अभियोग पंजीकृत किया गया है। एक अभियुक्त को गिरफ्तार कर अग्रिम विधिक कार्यवाही की जा रही है।
राजनीति में कई बार "नया विकल्प" होना, "सबसे अच्छा विकल्प" होने से भी अधिक असरदार साबित हो जाता है।
अरविंद केजरीवाल इसी कारण सफल हुए थे।
अब दिप्के और प्रशांत किशोर हो रहे हैं।
तब के अरविंद केजरीवाल और अब के अभिजीत दिप्के और प्रशांत किशोर में एक समानता है—
✓ नया चेहरा
✓ पुरानी सरकारों का बैगेज नहीं
✓ उपलब्ध विकल्पों में सबसे बेहतर दिखे
वहीं राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की चुनौती अलग है।
वे चाहे जितनी नई बातें करें, लेकिन मतदाता उन्हें पुराने राजनीतिक ढांचे और उसकी विरासत से अलग करके नहीं देख पाता।
जंगलराज, अकुशलता और भ्रष्टाचार का ठप्पा एक बार लग गया तो स्थायी हो गया।
लोकतंत्र में अक्सर चुनाव सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति का नहीं, बल्कि सबसे विश्वसनीय विकल्प का होता है।
नए को परखने की उत्कंठा तो रहती ही है!!
इस कालनेमी की कलई खुलने लगी है
देश के जाने माने पत्रकार @AmanChopra_ के साथ इस ढोंगी की बत्तमीजी साफ बताती है कि ये हिंदू संत के लायक है ही नहीं
बहुत बढ़िया अमन भाई आपने नंगा कर दिया इस कालनेमी को।
स्वयंघोषित शंकराचार्य बना बैठा हे ये। इसे सनातन और सनातनी से कोई लेना नहीं हे,
कुछ पत्रकारों मोदी सरकार आने के बाद भिखमंगे हो गए हैं इनके खिसियाने की यही एक मात्र वजह है ...
गांधी परिवार और केजरी जैसो के टुकड़ों पर पलने वाले दो कौड़ी के भांड पत्रकार अब संघ को क्या करना चाहिए और क्या नहीं का ज्ञान देने लगे हैं ...
अब जमाना गया दोगलों, अब मुफ्त में थ्री BHK तो क्या झोपड़ी की भी उम्मीद मत रखना
क्या गुस्सा गलत दिशा में है ‼️
📍 ब्राह्मणों द्वारा मारे गए दलितों की संख्या: शून्य
जिहादियों द्वारा अब तक मारे गए दलितों की संख्या: करोड़ों*
फिर भी, आंबेडकरवादी यह मानना चाहते हैं कि ब्राह्मण और अन्य हिंदू ही उनके दुश्मन हैं।
🔮"सच को समझो, समाज को जोड़ो तोड़ो नहीं"
🪀
@from_Agyatlogs ब्राह्मण माने शिक्षित और दूसरे को शिक्षा देने, कार्य का निर्वहन करने वाला
और यही समाज संस्कृति की धूरी /रीढ की हड्डी था इसीलिए जब हमारी संस्कृति का अंत चाहने वाले सफल न हुए तो ब्राह्मण का अंत हो ऐसे षड्यंत्र गढ़े किया
मुस्लिम आक्रांताओं के समय ब्राह्मण कितना प्रताड़ित किया जाता
वैसे हर आंदोलन से कोई ना कोई नगीना तो निकलता ही है...पर इस बार तो कुछ और ही अद्भुत ही हुआ है...
दिल्ली में छात्रों के आंदोलन से निकली ये 4 प्रतिभाएं हैं, उनका काम कुछ और है, वो प्रसिद्ध किसी और बात के लिए है..
पहला जुनैद भाई जिनका मोबाइल फोन की दुकान वाला काम था पर उसने ऐसा फूड सर्विस चलाया कि अब उसके पास जवाब नही हैं कि इतने पैसे खाना खिलाने के लिए आए कहां से..
दूसरा पहलवान आंदोलन के समय से ही मीडिया से बात करते करते अब छात्र आंदोलन में मजदूरों की बात करने वाले इरफ़ान भाई, जिनकी जबरदस्ती से यूट्यूब चैनल बना कर हमारे मत्थे मढ़ने की तैयारी है..
तीसरी गालियां देकर बुद्धिजीवियों की तालियाँ हासिल करने वाली एक लड़की, जिसने जमाने को बताया कि 15 साल की उम्र में 75 साल के प्रधानमंत्री को किसी और महिला से जोड़ कर गाली देना इज कूल थींग..
और चौथा जो हर न्यूज चैनल पर तेरी गलियों में मोहब्बत करने वाला एक रील मीडिया ऐंकर के साथ हू हू हू करके बना रहा है...
अब क्या ही कर सकते हैं...
20 जुलाई की हिंसा के लिए बार बार पुलिस को जिम्मेदार ठहराने वालों को ज़रा ठहर कर जंतर मंतर के प्रदर्शनकारी नेताओं और डीसीपी सचिन शर्मा के बीच चल रही इस बातचीत को भी सुनना चाहिए। तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं।
सचिन शर्मा साफ साफ कह रहे हैं कि भीड़ बढ़ रही है और इस भीड़ में कुछ असामाजिक तत्व भी हैं, आपके वॉलंटियर्स कहां हैं ? आप उन्हें कहें कि स्टूडेंट्स को समझायें, कंट्रोल करें।
अगर इसके बाद भी कॉकरोच जनता पार्टी के नेता खुद सुरक्षित "गुफाओ" में बैठे रहे और भीड़ को अनियंत्रित होने दिया तो साफ है कि ये लोग खुद चाहते थे हिंसा भड़के और कुछ लोग मारे जाएं। ताकि इनका आंदोलन "सफल" हो!
BBC के वरिष्ठ पत्रकार रेहान फ़ज़ल ने खुलासा किया है कि @BBCIndia राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ी सामग्री को रिलीज़ करने से रोक दिया जाता था ।
उन्होंने जिन उदाहरणों का उल्लेख किया है, उनमें शामिल हैं:
• गोलवलकर जी पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री, जिसे पहले से अप्रूबल के बावजूद रोका गया।
• नाथूराम गोडसे की फाँसी से पहले के अंतिम दिन पर आधारित एक स्टोरी को रोका गया।
• RSS पर लिखे गए कई लेख, जिन्हें कथित तौर पर अस्वीकार कर दिया गया।
ये सारी बात किसी और ने नहीं BBC के अंदर के एक पत्रकार ने कहीं हैं… की पत्रकारिता न्यूज़ स्टूडियो से नहीं कहीं और से चलती थी, किस विचारधारा की खबरे चलनी है किसकी रोकनी है ये वामपंथी इकोसिस्टम तय करता था।