लगभग 2500 साल पुराने संजय वेलट्ठिपुत्त का विचार आधुनिक साइंटिफिक स्कैप्टिसिजम से कुछ हद तक काफी मिलता-जुलता लगता है।
“दावा उतना ही करो जितना प्रमाण तुम्हें अनुमति देता है।”
संजय, बुद्ध तथा महावीर के समकालीन माने जाते हैं। उन्हें अज्ञाना परंपरा से जोड़ा जाता है एक ऐसी धारा जो अंतिम/निश्चित ज्ञान के दावों के प्रति अत्यंत संशयवादी थी।
संजय वेलट्ठिपुत्त का सबसे महत्वपूर्ण विचार था कि जहाँ निश्चित ज्ञान नहीं है, वहाँ मैं हाँ या ना का दावा क्यों करूँ?
उदाहरण के लिए उनसे पूछा जाए:
- क्या परलोक है?
- क्या मृत्यु के बाद अस्तित्व रहता है?
- क्या अच्छे-बुरे कर्मों का फल मिलता है?
- क्या कोई आत्मा/जीव मृत्यु के बाद रहता है?
तो उनका उत्तर किसी एक पक्ष में नहीं जाता था। वे लगभग यह कहते थे कि मैं यह नहीं कहता कि ऐसा है। मैं यह भी नहीं कहता कि ऐसा नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि दोनों है। और यह भी नहीं कहता कि दोनों नहीं हैं।
टूटा हुआ कप बनने के असंख्य तरीके हैं। सही-सलामत कप बनने का लगभग एक ही तरीका है। इसलिए प्रकृति लगभग हमेशा टूटी हुई अवस्था की ओर जाती है।
दूसरा लॉ ऑफ थर्मोडायनामिक्स कहता है कि हर प्राकृतिक प्रक्रिया में एंट्रोपी (अव्यवस्था) बढ़ने की प्रवृत्ति होती है। यानी प्रकृति हमेशा ऐसी दिशा चुनती है जिसमें ऊर्जा ज़्यादा समान रूप से फैल जाए।
इसी नियम की वजह से हमें समय की दिशा महसूस होती है।
हम लगभग 10 की पावर 28 परमाणुओं से बने हैं। इतने सारे कणों में एंट्रोपी का प्रभाव हावी हो जाता है। यही एरो ऑफ टाइम बनाता है। हमारी दुनिया में एंट्रोपी इतनी हावी हो जाती है कि समय का एक स्पष्ट आगे की ओर जाना दिखाई देता है जिसको हम समय बोलते है।
क्वांटम लेवल पर ये सब ब्रेक हो जाता/सकता है।
एक अकेले इलेक्ट्रॉन को देखो। अगर उसके मोशन का वीडियो चलाकर उल्टा कर दो, तो कई बार फिजिक्स के समीकरण दोनों वीडियो को स्वीकार कर लेते हैं। उन्हें तुरंत पता नहीं चलता कि कौन-सा आगे है और कौन-सा पीछे। यानी मूलभूत समीकरणों में अक्सर समय की दिशा विशेष रूप से चुनी हुई नहीं होती।
तो क्या क्वांटम दुनिया में कप वापस जुड़ सकता है?
सिद्धांत के अनुसार फिजिक्स इसे पूरी तरह असंभव घोषित नहीं करती। लेकिन उसके लिए कप के हर एक परमाणु को बिल्कुल सही जगह, सही गति और सही समय पर होना पड़ेगा। इतनी सटीक व्यवस्था की संभावना इतनी नगण्य है कि व्यवहार में ऐसा कभी देखने की उम्मीद नहीं की जाती।
लेकिन पाॅसिबिलिटी जीरो भी नहीं है।
यही कारण है कि समय वास्तव में क्या है? आज भी भौतिकी के सबसे बड़े अनसुलझे प्रश्नों में से एक है।
अपने वास्तविक स्वरूप में जीना असाधारण बुद्धिमत्ता का कार्य है। सौभाग्य से यह बुद्धिमत्ता तुम्हारे भीतर जन्मजात मौजूद है। इसे न कोई तुम्हें दे सकता है, न कोई तुमसे छीन सकता है। जो इस बुद्धिमत्ता को बिना किसी बनावट के, अपनी सहज प्रकृति के अनुसार प्रकट होने देता है, वही सच्चे अर्थों में प्राकृतिक मनुष्य है।
ये लोग UPA सरकार और मनमोहन सिंह पर जो आरोप लगाकर सत्ता में आए थे उसे आज 12 साल बाद भी साबित नहीं कर सके।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व PM मनमोहन सिंह को कोयला घोटाला केस में "आरोप मुक्त" किया।
आज से 11 साल पहले ही सोनिया गांधी जी ने कहा था मनमोहन जी निर्दोष हैं उन्हें बदनाम किया जा रहा है।
This is not a very complicated scenario. The BJP has only two options:
1. Stand by Amit Shah. Stand by the police action against students. And pay the political price.
2. Sack Amit Shah and save face to some extent.
There is no other way.
There are 3 kinds of journalism:
Independent — BBC: publicly funded, but editorially independent.
Partisan — CNN and Fox: different ideological lenses.
Sell-out — journalism that serves power instead of questioning it.
India seems to have pioneered the third category. Much of its mainstream media no longer holds power accountable. It sells the narrative of whoever holds the leash.
That’s not journalism. That’s PR.
Either Amit Shah ordered this - which makes him complicit
Or he did not know about it - which proves he is incompetent
No other option but to sack Amit Shah