ये AISA की प्रेसीडेंट नेहा बोरा है . JNU की PhD शोधार्थी .
21 दिनों से नेहा भी अनशन पर बैठी है . इतने दिनों की भूख हड़ताल और सोनम वांगचुक के ख़िलाफ़ पुलिसिया एक्शन के बाद भी नेहा का हौसला नहीं टूटा है .
सोनम वांगचुक जी का ट्रैक रिकॉर्ड दिखता है की वे एक गंभीर और सच्चे व्यक्ति हैं। उन्होंने अपने जीवन से दिखाया कि शिक्षा रट्टा मारने का नाम नहीं, सही जीवन जीने का नाम भी है।
भारत की सेवा वे जीवित रहकर अधिक कर सकते हैं। समाज को, लद्दाख को, भारत को, पर्यावरण और शिक्षा को उनकी ज़रूरत है। उनसे अपील है कि वे अपना अनशन तोड़ दें।
NEET पेपर लीक का संकट केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि हमारे शिक्षा तंत्र और समाज के किसी अधिक गहरे संकट का संकेत है।
हमें केवल व्यावसायिक शिक्षा नहीं चाहिए, हमें आत्म की सामूहिक शिक्षा, ‘मास- एजुकेशन-ऑफ़-द-सेल्फ’ चाहिए। अगर हम इससे बचते रहे, तो ऐसे हादसे बार-बार होते रहेंगे और हमारे बच्चों की जानें कभी किसी बहाने, कभी किसी और बहाने जाती रहेंगी।
कितना दर्द होगा उस इंसान के भीतर, जो अपने लिए नहीं, बल्कि इस देश के बच्चों के भविष्य के लिए भूखा बैठा हो।
शिक्षा केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि हर इंसान का सबसे बड़ा अधिकार है।
सबसे अधिक ज़रूरत उसकी उस बच्चे को है, जो गरीबी, वंचना और सामाजिक भेदभाव के बीच जन्म लेता है। क्योंकि शिक्षा ही वह रास्ता है, जिसके सहारे वह अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। शिक्षा केवल रोज़गार नहीं देती, बल्कि सोचने की क्षमता, आत्मसम्मान और एक बेहतर इंसान बनने की समझ भी देती है।
जब किसी देश में सरकारी स्कूल लगातार बंद होने लगें, विश्वविद्यालयों पर बुलडोज़र चलने की ख़बरें आएँ, परीक्षाएँ बार-बार पेपर लीक से प्रभावित हों और लाखों युवाओं का भविष्य अनिश्चितता में झूलता रहे, तब यह केवल छात्रों की समस्या नहीं रह जाती। यह पूरे समाज और राष्ट्र की चिंता का विषय बन जाती है। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा और भविष्य के लिए अपनी सेहत दाँव पर लगा देता है, तो यह केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदनाओं की परीक्षा भी है।
आज ज़रूरत किसी एक व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं है। ज़रूरत उस विचार के साथ खड़े होने की है कि इस देश के हर बच्चे को ऐसी शिक्षा मिले जो सुलभ हो, गुणवत्तापूर्ण हो, ईमानदार व्यवस्था पर आधारित हो और उसके सपनों को सुरक्षित रख सके।
किसी भी राष्ट्र का भविष्य संसद की ऊँची इमारतों में नहीं, बल्कि उसके स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लिखा जाता है। यदि हम शिक्षा को नहीं बचाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियों से एक बेहतर भारत का सपना भी उनसे छीन लेंगे।
सोनम वांगचुक, जिसने कभी अपने लिए नहीं माँगा, कुछ कि पद चाहिए, सत्ता चाहिए।
अपनी ज़िंदगी देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए लड़ते रहे है और 15-16 दिनों से अनशन पर बैठे हैं!
अपने लिए नहीं, देश के लिए। देश के बच्चों के भविष्य के लिए! उसके बाद भी देश के नेताओं की सोई हुई संवेदनाएँ नहीं जाग पा रही।
सत्ता की ख़ामोशी बरकरार है।
भूख हड़ताल और अनशन भी अगर व्यवस्था को सुनाई नहीं दे रहा, तो एक आम नागरिक की आवाज़ की कीमत क्या ही होगी?
अब दर्द सिर्फ़ यह नहीं कि एक व्यक्ति अनशन पर है, बड़ा दर्द यह है कि देश धीरे-धीरे उस मुकाम पर पहुँच रहा है जहाँ जनता की पीड़ा का महत्व खत्म है और उस पर सत्ता हावी है।
सोचिए, आज अगर एक ऐसे व्यक्ति की आवाज़ अनसुनी की जा सकती है, जिसने अपना जीवन देश के लिए लगा दिया, तो कल बेरोज़गार युवा, न्याय की गुहार लगाता परिवार, किसान, छात्र या कोई भी आम नागरिक किस उम्मीद से अपनी तकलीफ़ के लिए लड़ पाएगा और कौन उसकी सुनेगा?
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ़ चुनाव है क्या? अगर सत्ता अपने शांत नागरिक की आवाज़ नहीं सुन रही, तो ये लोकतंत्र पर सवाल नहीं है?
और अगर वह आवाज़ भी अनसुनी होने लगे! तो यह चिंता सिर्फ़ पूरे देश को होनी चाहिए।
Be stand with Sonam Wangchuk
JPSC और BPSC, दोनों आयोगों को अभ्यर्थियों की वास्तविक स्थिति को समझना चाहिए।
बड़ी संख्या में बिहार के अभ्यर्थी JPSC मुख्य परीक्षा दे रहे हैं। ऐसे में यदि दोनों परीक्षाओं की तिथियां लगभग एक ही समय पर पड़ती हैं, तो हजारों उम्मीदवार अनावश्यक दुविधा में फंस जाते हैं।
दोनों आयोगों के परीक्षा नियंत्रकों को आपसी समन्वय कर किसी एक परीक्षा की तिथि में उचित बदलाव पर विचार करना चाहिए। इससे न केवल बिहार और झारखंड के अभ्यर्थियों को राहत मिलेगी, बल्कि दूसरे राज्यों के उम्मीदवार भी बिना टकराव के दोनों परीक्षाओं में शामिल हो सकेंगे।
प्रतिस्पर्धा परीक्षा में होनी चाहिए, परीक्षा की तारीखों में नहीं।
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