@vivekkumar84 भाजपा की प्रचंड लहर में भी पूर्वांचल इसके खिलाफ ही वोट करता आ रहा है ।
इससे तो साबित हो गया है पूर्वांचल किसी की चाटुकारता नहीं करता जैसे पश्चिमाञ्चल करता आ रहा है ।
एक बार जरूर समय निकाल कर पढ़े;-
पुलिस थक चुकी है… मगर व्यवस्था कब जागरूक होगी ? कुछ नही मालूम।
पुलिस की वर्दी देखकर समाज को सुरक्षा का भरोसा मिलता है, लेकिन उस वर्दी के भीतर मौजूद इंसान अक्सर दिखाई नहीं देता। वह इंसान जो लगातार ड्यूटी करता है, घंटों खड़ा रहता है,कोई साप्ताहिक रेस्ट नहीं। त्योहारों पर घर नहीं जा पाता, परिवार की खुशियों से दूर रहता है। और हर दिन तनाव, दबाव तथा अपेक्षाओं के बीच अपनी जिम्मेदारी निभाता है।
एक पुलिसकर्मी के रूप में मेरा मानना है। कि सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि पुलिस कितनी मेहनत कर रही है।
महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या व्यवस्था ने पुलिसकर्मियों की कार्यक्षमता, विश्राम और मानसिक स्वास्थ्य का पर्याप्त ध्यान रखा है ?
लगातार बढ़ता काम का दबाव, पुलिस का डिजिटलीकरण लेकिन साधन सीमित लम्बे ड्यूटी घंटे, अवकाश प्राप्त करने में कठिनाई, कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी, वीआईपी ड्यूटी, जांच का बोझ, न्यायालयों और विभागीय प्रक्रियाओं से जुड़ा तनाव, इन सबके बीच पुलिसकर्मी आखिर इंसान ही है।
उससे अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा की अपेक्षा स्वाभाविक है, लेकिन उसे मानवीय कार्य-परिस्थितियां उपलब्ध कराना भी विभागीय व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
पुलिसकर्मी पर काम का अत्यधिक दबाव है। कहीं बाहर घरेलू मामला के कारण यह दबाव और अधिक बढ़ जाता है। कि वह आत्महत्या जैसे अंतिम कदम तक पहुंच जाता है।
तब विभाग और समाज स्वाभाविक रूप से संवेदना व्यक्त करते हैं। श्रद्धांजलि दी जाती है और परिवार को सांत्वना दी जाती है।
लेकिन इसके साथ ही यह भी आवश्यक है। कि घटना के कारणों की निष्पक्ष और संवेदनशील जांच हो।
क्या उस कर्मचारी के कार्य-घंटे निर्धारित मानकों के अनुरूप थे? क्या उसे पर्याप्त विश्राम और अवकाश मिल रहा था?
क्या उस पर असामान्य विभागीय या मानसिक दबाव था? क्या उसने सहायता मांगने का प्रयास किया था? यदि किया था, तो उसकी बात किस स्तर पर सुनी गई?
इन प्रश्नों का उद्देश्य किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं के वास्तविक कारणों को समझना और भविष्य में उनकी पुनरावृत्ति को रोकने के लिए पुलिस विभाग को सकारात्मक कदम उठाने चाहिए।
पुलिस से अनुशासन, जवाबदेही और कठिन परिस्थितियों में कार्य करने की क्षमता अपेक्षित है। इसके साथ ही पुलिसकर्मी को सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां, पर्याप्त विश्राम, समय पर अवकाश और मानसिक सहयोग उपलब्ध कराना भी विभाग का दायित्व है।
जिस विभाग से समाज अपेक्षा करता है।कि वह हर नागरिक की समस्या सुनेगा, उसी विभाग में यदि कोई कर्मचारी अपनी परेशानी व्यक्त करने में संकोच या भय महसूस करे, तो यह पूरे तंत्र के लिए आत्ममंथन का विषय है।
*पुलिसकर्मी कोई मशीन नहीं है।*
उसके भी बच्चे हैं, परिवार है, भावनाएं हैं, थकान है और निजी समस्याएं हैं। वर्दी के पीछे खड़े व्यक्ति के जीवन, स्वास्थ्य और सम्मान का महत्व भी उतना ही है जितना उसकी ड्यूटी का।
हर ऐसी घटना के बाद केवल संवेदना व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है। कारणों की ईमानदार पड़ताल, आवश्यक स्तर पर जिम्मेदारी का निर्धारण और व्यवस्था में ठोस सुधार अनिवार्य है।
पुलिसकर्मियों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए *केवल श्रद्धांजलि, शोक- संदेश या सोशल मीडिया पर “RIP” और “ॐ शांति” लिख देना पर्याप्त नहीं हो सकता।*
किसी पुलिसकर्मी द्वारा अपनी ड्यूटी और जीवन का इस प्रकार अंत कर देना पूरे तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।
प्रत्येक घटना की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यह समझा जा सके कि उसके पीछे कार्यस्थल का दबाव, लगातार ड्यूटी, अपमान, उत्पीड़न, पारिवारिक तनाव, आर्थिक कठिनाई या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कौन-कौन सी परिस्थितियां थीं।
जांच केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि उसकी निष्पत्तियां जवाबदेही और सुधार का आधार बनें।
आवश्यकता ऐसी पुलिस व्यवस्था की है, जहां जवान से लेकर अधिकारी तक अपनी मानसिक परेशानी सम्मानपूर्वक साझा कर सके, जहां सहायता मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी समझी जाए, और जहां ड्यूटी का दबाव कर्तव्य का हिस्सा हो, लेकिन ऐसा न हो जो किसी व्यक्ति को भीतर से तोड़ दे।
इसके लिए नियमित मानसिक स्वास्थ्य परामर्श, गोपनीय सहायता व्यवस्था, वैज्ञानिक ड्यूटी,छुट्टी रोस्टर, पर्याप्त विश्राम, समय पर अवकाश और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।
*प्रत्येक थाने और इकाई में प्रशिक्षित काउंसलर या स्वतंत्र मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध होनी चाहिए।* आत्महत्या के जोखिम के संकेतों को पहचानने के लिए अधिकारियों और सहकर्मियों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
जिस देश में कर्मचारियों की वेतन विसंगति दूर न हुई आज तक ?
जिस देश में अपने आर्थिक संवैधानिक अधिकार और प्रमोशन के लिए कोर्ट जाना पड़ता हो ?
जिस देश में सरकार अपने विकास कार्यों की छवि को चमकाने के लिए प्रतिदिन करोड़ो रुपयों की खबरो पर निर्भर हों ?
जिस देश में राजनेता आत्ममुग्ध और सूचना विभाग की बैसाखी पर निर्भर हो ?
जिस देश में मीडिया की स्वतंत्रता सरकारी टुकड़ो पर निर्भर होंगे उस देश में GDP 7 क्यों 70 बड़ा दो ?
सत्य ये है सरकार ने इतना कार्य किया कि देश की जनता को समझ नहीं आ रहा और कृपापात्र मीडिया समझा नहीं पा रही 🤣🤣🤣
@Arvind_shukla89@AnilYadavmedia1 Jb aap logo ke bap sarkar me hai to hatao ye Aarakshan varakshan
Tumhe bhi pta ye poltics hai vo ye nhi kr payenge fir bhi vote bjp ko hi doge..