समाजवादी पार्टी के माननीय सांसद गण, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे एवं चुनावी धांधली को लेकर हो रहे इंडिया गठबंधन के विरोध प्रदर्शन में सम्मिलित हुए।
मुचुआ हटेगा, तभी लोकतंत्र बचेगा !
भारत के संविधान, लोकतंत्र और उसकी आवाज़ की रक्षा हर भारतीय की ज़िम्मेदारी है - और ये Process शुरू हो चुका है।
हिंदुस्तान की जनता को न्याय दिलाने का Process
लोकतंत्र में भरोसा वापस लाने का Process
देशद्रोहियों को सज़ा दिलाने का Process
और अब ये रुकने वाला नहीं है।
आज माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष जी के निर्देशानुसार
दिल्ली में मचुआ और वोट चोरों के खिलाफ INDIA गठबंधन के विरोध प्रदर्शन में पार्टी के तरफ़ शामिल हुआ जो कनॉट प्लेस से शुरू होकर राजघाट पर पहुँचा ।
लोकतंत्र बचाने की इस लड़ाई को सड़क से सदन तक जारी रखेंगे ।@yadavakhilesh@samajwadiparty@RahulGandhi
आज अयोध्या की पावन धरती पर कलियुग के ताप को हरकर इहलोक को संवारने वाली और परलोक को सुधारने वाली ‘भागवतकथा’ का अमृतपान करने के सौभाग्यशाली क्षण।
बचपन में किसी ने बताया था कि ‘जो भव के बंधन से मुक्त कराए वही भागवत।’ और ‘जो व्यथा हरे, वही कथा’। आज का समय क्योंकि बंधनों और व्यथाओं से भरा है - अहंकार के बंधन, सत्ता के बंधन, जाति के बंधन, भेदभाव के बंधन, वैमनस्य के बंधन, ऊँच-नीच के बंधन, छुआछूत के बंधन, शुद्धि-अशुद्धि के बंधन और भी अनेक प्रकार के सामाजिक और मानसिक बंधन, इसीलिए भागवतकथा का महत्व और प्रासंगिकता आज और भी बढ़ गई है।
कथा सिर्फ कहानी नहीं होती जो मनोरंजन करती है, कथा तो ‘मनोवर्द्धन’ करती है। कहानी मन को बहलाती है, कथा मन और मनोबल को बड़ा बनाती है। कहानी के अंत होने पर आनंद का क्षणिक अनुभव होता है, जबकि कथा खत्म होने पर उत्तरदायित्व की अमिट गहरी अनुभूति होती है। कथा के मूल संदेश को जीवन में उतारने से ही कथा सुनने का पुण्य प्राप्त होता है।
भागवतकथा इसीलिए कथा है, कहानी नहीं। वो सिर्फ कृष्ण जी के बारे में नहीं बताती, वो हमें कृष्ण जी जैसा बनने के लिए हमें प्रेरित करती है।
भागवतकथा वाचन-श्रवण से बढ़कर, व्यक्तिगत प्रेम और सामाजिक समानता का संविधान है।
भागवतकथा सिखाती है - प्रेम ही सबसे बड़ा परमार्थ है।
भागवतकथा दया और करुणा का पाठ पढ़ाती है।
भागवतकथा भेदभाव मिटाकर समानता सिखाती है।
भागवत कथा की अनंत सीखों में से एक विशेष सीख ये भी मिलती है कि ‘प्रेम, दया, अपनापन’ ही सबसे बड़ा मानव-धर्म है।
मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से, भागवतकथा का सबसे बड़ा सबक यही है कि ‘भेदभाव मिटाओ, समानता लाओ’।
कृष्ण जी ने सिखाया कि सत्ता आती-जाती
आज के समय में, प्रेम और समानता के महाकाव्य को हम ‘संविधान’ कहते हैं। इसीलिए हमें संविधान की रक्षा करनी है।
मुझे लगता है भागवतकथा ‘शोषित, पीड़ित, वंचित के उद्धार’ का सबसे बड़ा स्रोत है। इसमें 'राज' का मतलब शासन नहीं, सबको साथ लेकर चलना है।
मेरे लिए भागवतकथा ‘सामाजिक न्याय के राज’ के उदाहरणों का एक संकलन है, जिसमें विदुर जी भी हैं, सुदामा जी भी हैं और कुब्जा भी। इन चरित्रों के माध्यम से मैंने तो यही सीखा कि किसी भी उपेक्षित, विपन्न व उपेक्षित को उसके तिरस्कृत होने या वंचित होने के भाव से मुक्त करना ही सामाजिक न्याय है।
साथ ही जिस ‘बंधु-राष्ट्र’ बनाने का संकल्प हम लेकर चले हैं, भागवतकथा उसका प्रकाश स्तंभ बनकर हमें राह दिखाती है।
भागवत कथा सदियों से चलती चली आ रही है और सदियों तक चलेगी क्योंकि नफ़रत और भेदभाव हर युग में होंगे, तो कृष्ण जी की चेतना भी प्रेम, दया और अपनापन से उनका अंत करने के लिए विविध रूप में सक्रिय होती रहेगी व मानवता को चिरायु होने का वरदान देती रहेगी।
‘भागवतकथा’ का यही है सार
’प्रेम’ ही है सबसे बड़ा संस्कार
’दया’ से ही पूर्ण होता ये संसार
’अपनापन’ जीवन का आधार
‘भागवतकथा’ का यही है सार
’सामाजिक-न्याय’ हो आधार!
’मिटें भेद सब, हो सबका उद्धार
निर्मूल हो ‘पीड़ा, दुख, अपमान’
’शोषित-वंचितों’ का हो उत्थान
बनके ‘बंधु-राष्ट्र’ करें कल्याण
‘भागवतकथा’ का यही है सार
अमर नहीं होता किसी का राज
अंत में मारा ही जाता ‘अहंकार’
और होता है पापियों का संहार
‘भागवतकथा’ का यही है सार
'महिला पुलिस तो मेल पुलिस से भी ज़्यादा खतरनाक है क्योंकि उन्हें बोला गया है कि महिलाओं के साथ आप कुछ भी कर सकते हो '
'एक महिला पुलिस ने मुझे मारा तो मैंने भी पलटकर मारा '
' एक महिला पुलिस ने अपने बैज से मेरे हाथों को जख्मी कर दिया '
राहुल और प्रियंका समेत सांसदों के साथ पुलिस की बदसलूकी और ज्ञानेश के खिलाफ विपक्ष की लड़ाई पर
@MahuaMoitra के साथ मेरी बातचीत
मेरे यूट्यूब चैनल पर
"अगर बड़े बड़े दावे करने वाले मुख्यमंत्री इतना ही आश्वस्त हैं तो खुद अयोध्या से चुनाव लड़कर दिखाएं।"
• माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी, अयोध्या
आज अयोध्या की पावन धरती पर कलियुग के ताप को हरकर इहलोक को संवारने वाली और परलोक को सुधारने वाली ‘भागवतकथा’ का अमृतपान करने के सौभाग्यशाली क्षण।
बचपन में किसी ने बताया था कि ‘जो भव के बंधन से मुक्त कराए वही भागवत।’ और ‘जो व्यथा हरे, वही कथा’। आज का समय क्योंकि बंधनों और व्यथाओं से भरा है - अहंकार के बंधन, सत्ता के बंधन, जाति के बंधन, भेदभाव के बंधन, वैमनस्य के बंधन, ऊँच-नीच के बंधन, छुआछूत के बंधन, शुद्धि-अशुद्धि के बंधन और भी अनेक प्रकार के सामाजिक और मानसिक बंधन, इसीलिए भागवतकथा का महत्व और प्रासंगिकता आज और भी बढ़ गई है।
कथा सिर्फ कहानी नहीं होती जो मनोरंजन करती है, कथा तो ‘मनोवर्द्धन’ करती है। कहानी मन को बहलाती है, कथा मन और मनोबल को बड़ा बनाती है। कहानी के अंत होने पर आनंद का क्षणिक अनुभव होता है, जबकि कथा खत्म होने पर उत्तरदायित्व की अमिट गहरी अनुभूति होती है। कथा के मूल संदेश को जीवन में उतारने से ही कथा सुनने का पुण्य प्राप्त होता है।
भागवतकथा इसीलिए कथा है, कहानी नहीं। वो सिर्फ कृष्ण जी के बारे में नहीं बताती, वो हमें कृष्ण जी जैसा बनने के लिए हमें प्रेरित करती है।
भागवतकथा वाचन-श्रवण से बढ़कर, व्यक्तिगत प्रेम और सामाजिक समानता का संविधान है।
भागवतकथा सिखाती है - प्रेम ही सबसे बड़ा परमार्थ है।
भागवतकथा दया और करुणा का पाठ पढ़ाती है।
भागवतकथा भेदभाव मिटाकर समानता सिखाती है।
भागवत कथा की अनंत सीखों में से एक विशेष सीख ये भी मिलती है कि ‘प्रेम, दया, अपनापन’ ही सबसे बड़ा मानव-धर्म है।
मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से, भागवतकथा का सबसे बड़ा सबक यही है कि ‘भेदभाव मिटाओ, समानता लाओ’।
कृष्ण जी ने सिखाया कि सत्ता आती-जाती
आज के समय में, प्रेम और समानता के महाकाव्य को हम ‘संविधान’ कहते हैं। इसीलिए हमें संविधान की रक्षा करनी है।
मुझे लगता है भागवतकथा ‘शोषित, पीड़ित, वंचित के उद्धार’ का सबसे बड़ा स्रोत है। इसमें 'राज' का मतलब शासन नहीं, सबको साथ लेकर चलना है।
मेरे लिए भागवतकथा ‘सामाजिक न्याय के राज’ के उदाहरणों का एक संकलन है, जिसमें विदुर जी भी हैं, सुदामा जी भी हैं और कुब्जा भी। इन चरित्रों के माध्यम से मैंने तो यही सीखा कि किसी भी उपेक्षित, विपन्न व उपेक्षित को उसके तिरस्कृत होने या वंचित होने के भाव से मुक्त करना ही सामाजिक न्याय है।
साथ ही जिस ‘बंधु-राष्ट्र’ बनाने का संकल्प हम लेकर चले हैं, भागवतकथा उसका प्रकाश स्तंभ बनकर हमें राह दिखाती है।
भागवत कथा सदियों से चलती चली आ रही है और सदियों तक चलेगी क्योंकि नफ़रत और भेदभाव हर युग में होंगे, तो कृष्ण जी की चेतना भी प्रेम, दया और अपनापन से उनका अंत करने के लिए विविध रूप में सक्रिय होती रहेगी व मानवता को चिरायु होने का वरदान देती रहेगी।
‘भागवतकथा’ का यही है सार
’प्रेम’ ही है सबसे बड़ा संस्कार
’दया’ से ही पूर्ण होता ये संसार
’अपनापन’ जीवन का आधार
‘भागवतकथा’ का यही है सार
’सामाजिक-न्याय’ हो आधार!
’मिटें भेद सब, हो सबका उद्धार
निर्मूल हो ‘पीड़ा, दुख, अपमान’
’शोषित-वंचितों’ का हो उत्थान
बनके ‘बंधु-राष्ट्र’ करें कल्याण
‘भागवतकथा’ का यही है सार
अमर नहीं होता किसी का राज
अंत में मारा ही जाता ‘अहंकार’
और होता है पापियों का संहार
‘भागवतकथा’ का यही है सार
"भागवत कथा के कार्यक्रम में हम लोगों को शामिल होने का मौका मिला। मैं सभी श्रद्धालुओं को बहुत बहुत शुभकामनाएं और बधाई देता हूं।"
- माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी, अयोध्या