इम्तियाज अली की फिल्मों में जो पुरानी कहानी (कुछ जेनरेशन पहले वाली) रहती है वह ज्यादा रोचक होती है. वर्तमान की कहानी उतनी हिट नहीं करती. क्या किसी और को भी ऐसा लगता है?
राजस्थान में इस साल अभी तक मई के आखिर से शुरू हुई बारिश लगातार जारी है. पूरे सूबे में नहीं है लेकिन कुछ जगहों पर खूब हुई/हो रही. ऐसे में कई जगहों पर किसानों ने बुवाई भी कर दी. यह बारिश मानसूनी नहीं है. लेकिन जलवायु परिवर्तन का एक गंभीर असर है.
“For better opportunities I decided to move to Gujarat,” Ashok Sharma said.
Another pacer Ganesh Suthar, who had an outstanding Under-23 season last year, has decided to play for Haryana. #Rajasthan#Cricket
52 साल बाद राजस्थान में जन्मे किसी खिलाड़ी ने भारत के लिए टेस्ट डेब्यू किया. मानव सुथार.
इससे पहले 1974 में पार्थसारथी शर्मा ने डेब्यू किया. वैसे पंकज सिंह ने 2014 में डेब्यू किया पर वे यूपी बोर्न हैं लेकिन उनका लगभग पूरा करियर राजस्थान के लिए ही रहा.
1. इसीलिए समझदार फॉरेस्ट ऑफिसर पत्रकारों को गंभीरता से नहीं लेते।खासकर हिंदी के।
एनवायरनमेंट प्रेमी होने और जर्नलिज्म अलग चीज हैं। जिन कबूतर का फोटो खींच के कविता लिखी है वो पेड़ों पर नहीं रहता। इसीलिए नाम Rock dove है। इनके पूर्वज चट्टानों, दरारों या ऊंची जगहों पर रहते आये हैं।
Brother was finishing games before “finisher” even became a thing.
Stayed not out in 67 of 196 ODI innings.
Pressure was his canvas..
And he painted masterpieces when it mattered most. 🎨
You want the young officer to sacrifice his life for the love of the Nation, but you don’t want him to express his love for his fiancée.
In the Army we say ‘Youngster nahi karega, toh kaun karega’.
If you can not find a fault in his professional capabilities, don’t do this nuktachini for such a pure gesture of love and belonging.
Military equipment has been on display during many ‘Know your Army’ exhibitions around the country. The students and non military personnel have clicked pics with it showing pride and love for the Army. So, please don’t bring in the national security angle into this.
Let the young soldier do his national duty with pride and honour 👍
Jai Hind 🇮🇳
काशी की विश्वनाथ गली में आज भी एक पीले दरवाज़े के पीछे स्याही की महक ठहरी है।
वहाँ पंडित हरिशंकर त्रिपाठी बैठते थे, शहर के आख़िरी चिट्ठी लिखने वाले।
- न कंप्यूटर,
- न प्रिंटर,
- बस एक चौकी, %
- पीतल की दवात,
- बाँस की कलम
और चश्मे के पीछे झाँकती, थकी आँखें।
लोग कहते, "पंडित जी, अब कौन चिट्ठी लिखता है? फोन कर दो न!"
वो हँसकर कहते, “बेटा, फोन बात पहुँचाता है, चिट्ठी बात को रोककर रखती है।”
◆ पहली चिट्ठी
2006 के सावन में, जब *अस्सी घाट* पर पहली बार मोबाइल रिचार्ज की दुकान खुली थी, एक ग्यारह साल की लड़की भीगी चोटी लिए आई थी। नाम था- अप्पू। असली नाम- अपर्णा मिश्रा।
“बाबा, बाबूजी को चिट्ठी लिखनी है। वो सूरत में कपड़ा मिल में हैं।”
हरिशंकर ने पूछा, “क्या लिखवाओगी?”
अप्पू ने थोड़ा सोचा, “लिखो कि आँगन का बेल पक गया है, और मैं रोज़ शाम को बाबूजी की खड़ाऊँ चौखट पर रख देती हूँ, ताकि लगे वो गंगा नहा के अभी आएँगे।”
पंडित जी ने वही लिखा, धीरे- धीरे। नीचे अप्पू से गोल-गोल अक्षरों में नाम लिखवाया।
वो चिट्ठी सूरत पहुँची।
तीन हफ्ते बाद जवाब आया और अप्पू फिर आई।
फिर हर महीने...।
*****
समय सरकता रहा...।
******
आज शाम, वैशाख की लू में जब घाट पर धूप तप रही थी, अपर्णा, जो अब BHU में संस्कृत की असिस्टेंट प्रोफेसर थी, उसी पीले दरवाज़े पर लौटी।
दरवाज़ा बंद था!
बगल की पान वाली अम्मा ने बताया,
पंडित जी पिछले माघ में चले गए।
चौकी खाली थी,
बस कोने में एक स्टील का बक्सा रखा था।
उस पर खड़िया से लिखा था:
“अप्पू बिटिया के लिए।”
अपर्णा ने खोला। अंदर कार्बन कागज़ों की गड्डियाँ थीं।
हरिशंकर हर चिट्ठी की नकल अपने पास रख लेते थे।
पहली नकल — “बेल पक गया है...”
दूसरी — “बाबूजी, दीवाली पर मत आना, अम्मा कहती हैं टिकट महँगा है, पर मैं अपनी चाँदी की पायल बेच दूँगी, आप आ जाओ।”
दसवीं — “बाबूजी, मैं दसवीं में फर्स्ट आई।”
बीसवीं — “बाबूजी, अम्मा को दमा बढ़ गया है।”
पचासवीं — “बाबूजी, आज मेरी नौकरी लगी, BHU में। आपकी खड़ाऊँ अब भी चौखट पर है।”
हर नकल के नीचे पंडित जी की छोटी टिप्पणी:
“लिखते समय चुप हो गई थी। दवात में गंगाजल मिलाया।” या “आज बहुत हँसी, बोली बाबा, इस बार मिठाई लाऊँगी।”
सबसे नीचे एक बंद लिफाफा था, जिस पर लिखा था — “मेरे बाद पढ़ना।”
अंदर पंडित जी की काँपती लिखावट:
"बिटिया,
मैं चिट्ठी लिखने वाला हूँ, पर एक चिट्ठी मैंने छुपाई। 2011 में तुम्हारे बाबूजी का आख़िरी पत्र आया था, सूरत के सरकारी अस्पताल से। उन्होंने लिखा था, अगर मुझे कुछ हो जाए तो अप्पू को मत बताना, वो पढ़ाई छोड़कर आ जाएगी। मैं हर महीने मनीऑर्डर भिजवाता रहूँगा, तुम बस मेरी तरफ से जवाब लिखते रहना, जैसे मैं ठीक हूँ।"
मैंने पंद्रह बरस तक तुम्हारा बाबूजी बनकर उत्तर लिखे। मुझे क्षमा करना। पर देखो न, तुम पढ़ीं, अब तुम पढ़ाती हो, तुम्हारी अम्मा ने तुम्हें टूटने नहीं दिया।
कभी-कभी एक झूठ, सच से ज़्यादा जीवन देता है।
अब यह बक्सा तुम्हारा है। चाहो तो गंगा में प्रवाहित कर देना, चाहो तो कक्षा में पढ़ाना।
अपर्णा की आँखों से आँसू टपके और दवात की सूखी स्याही फिर गीली हो गई!
◆आख़िरी चिट्ठी
उस रात अपर्णा ने पीला दरवाज़ा फिर खोला। चौकी पोछी, दवात में नई स्याही घोली। गली के बच्चे झाँकने लगे।
उसने पहली चिट्ठी खुद पंडित जी के नाम लिखी:
“बाबा, आज समझा कि चिट्ठी पहुँचती नहीं, रुकती है। आपने मेरे बाबूजी को पंद्रह साल तक मेरे पास ज़िंदा रखा। अब मैं आपकी चौकी ज़िंदा रखूँगी। हर शनिवार शाम दो घंटा, जो भी आएगा, मैं उसके लिए चिट्ठी लिखूँगी, बिना पैसे। बस एक शर्त, वो उसे पढ़कर सुनाएगा, ताकि शब्द हवा में ठहरें।”
उसने चिट्ठी मोड़कर दवात के पास रख दी।
अगले शनिवार एक ज़ोमैटो वाला आया, हेलमेट हाथ में, “दीदी, गाँव में दादी को मैसेज भेजना है, लिख दोगी?”
अपर्णा हँसी, “बैठो। पहले बताओ, दादी क्या बनाती थीं?”
लड़का बोला, “बाजरे की रोटी और गुड़।”
उसने बाँस की कलम डुबोई और लिखना शुरू किया — “दादी, काशी में आज लू है, पर तुम्हारे हाथ की बाजरे की रोटी की याद आते ही पसीना भी मीठा लगने लगता है...।”
बाहर शंख बजा, घाट पर आरती की घंटियाँ बजीं और अंदर पीले दरवाज़े के पीछे कलम कागज़ पर चलती रही।
कभी-कभी शहर बदल जाते हैं,
पर
कुछ दरवाज़े जान-बूझकर पुराने रखे जाते हैं, ताकि लौटने पर स्याही की महक हमें नाम से पुकार ले।
*गंगा शरण सिंह*
पिछले 25 वर्षों में भारतीय मानसून के पैटर्न में बड़ा बदलाव दर्ज हुआ है, जिसमें उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा बढ़ी और गंगा के मैदानी क्षेत्रों सहित कई हिस्सों में सूखे का जोखिम बढ़ा है।
एजीयू एडवांसेज में प्रकाशित नए शोध के अनुसार, उत्तरी अटलांटिक महासागर में ग्रीनलैंड के दक्षिण स्थित ठंडे पानी का विशाल क्षेत्र, जिसे ‘कोल्ड ब्लॉब’ कहा जाता है, जेट स्ट्रीम की दिशा बदलकर अधिक नमी उत्तर-पश्चिम भारत की ओर खींच रहा है।
वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को ‘बारोट्रॉपिक गवर्नर मैकेनिज्म’ नाम दिया है, जिसमें बड़े पैमाने की वायु प्रणालियां छोटे तूफानी तंत्रों को नियंत्रित कर वर्षा वितरण को बदल देती हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि जलवायु मॉडल अटलांटिक-मानसून संबंध को बेहतर ढंग से शामिल करें, तो मानसून, सूखा और बाढ़ की भविष्यवाणी अधिक सटीक हो सकेगी, जिससे करोड़ों लोगों की आजीविका और सुरक्षा की योजना बेहतर बन पाएगी।
पूरी रिपोर्ट पढ़ें - https://t.co/X48U9ULvAF
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The best piece of advice the 15-year old Vaibhav Suryavanshi could get! And who better than Virat Kohli to help fuel his fire in the right direction. 🔥🫡❤️
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