जिसने जीवन के कठिन दौर और भीतर के अकेलेपन को करीब से महसूस नहीं किया, उसके लिए शायद आस्था की गहराई को समझना सहज न हो..कुछ बाते जीवन के कठिन दौर से गुज़र कर समझ आती हैं।
असली कंपटीशन देखना है तो एक बार लाइब्रेरी मे जाकर देखो, वहाँ हर रोज 70% छात्र उपस्थित होते है उनमें से 30% छात्र सोते है, बाकी के 40% मे से 20% रील्स, मूवी देखते है बाकी के 20% में से 10% इधर-उधर घूमते रहते है, बाकी 10% छात्र में ही कंपटीशन है, इसलिए आप मेहनत करो आपका सिलेक्शन पक्का है...
अगर हमने जल्द से जल्द इस बच्चे की माँग पर विचार नहीं किया, तो इतिहास हमें कभी माफ़ नहीं करेगा।
जिस महत्वपूर्ण विषय की ओर इस बच्चे ने हमारा ध्यान दिलाया है, सच तो यह है कि संविधान निर्माण के बाद ही हमें इसके लिए एक संवैधानिक संशोधन विधेयक लाना चाहिए था l जिसमें हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इस माँग की अनिवार्य समीक्षा का प्रावधान होता।
लेकिन स्वतंत्रता के 80 साल बाद भी हम इस दिशा में कुछ नहीं कर पाए। न जाने कितने मासूमों की आँखें इसी इंतज़ार में सूख गईं। हम सब सामूहिक रूप से इसके दोषी हैं।और माँग भी ऐसी कोई असंभव माँग नहीं है।
इस बच्चे का कहना है कि स्वतंत्रता के 80 साल बाद भी स्वतंत्रता दिवस पर हमें सिर्फ दो लड्डू ही क्यों मिलते हैं ?
अगर लोग हमारे बारे में सोचते, हमारी भावनाओं का सम्मान करते और हर स्वतंत्रता दिवस पर सिर्फ एक-एक लड्डू बढ़ाते जाते, तो आज हमें 80 लड्डू मिल रहे होते।
और अगर 80 लड्डू देना सरकारों को भारी लगता था, तो कम से कम एक काजू कतली का पैकेट तो दिया ही जा सकता था l
यह वास्तव में सिर्फ दो लड्डुओं का सवाल नहीं है। यह उस पीढ़ी का सवाल है जिसने 80 साल तक इंतज़ार किया है।
इसलिए अब समय आ गया है कि संसद गंभीरता से विचार करे l अगले स्वतंत्रता दिवस पर दो लड्डू होंगे, चार होंगे, या फिर आखिरकार हर बच्चे के हिस्से में एक काजू कतली का पैकेट आएगा?
इतिहास सबकुछ देख रहा है। इस महत्वपूर्ण विषय पर हमारी चुप्पी इतिहास में लिखी जाएगी l
स्कूल ठीक करो!
इंस्टाग्राम पर हर 10 में से 6 रील स्कूल की बदहाल हालत दिखा रही हैं।
देश का Genz और GenAlpha अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए सरकारों से स्कूल के हालात पर सवाल पूछ रहा हैं
क्या भारत अब क्रांति के मोड़ में जा रहा हैं?
#SchoolThikKaro
After hearing young Yato Wangnao sing the National Anthem on our 80th Independence Day, how could Nagaland not be on top of the travel bucket list today?
#SundayWanderer
(Video courtesy @nehaGurung1692 )
ज़ेन अल्फ़ा भी अब ग़दर काट रहा है,, ये उज्जैन की स्कूली छात्राएँ हैं जो अपने स्कूल को दूर नई बिल्डिंग में शिफ्ट करने का विरोध कलेक्ट्रेट जाकर कर रहीं हैं “कलेक्टर साहब को आना होगा “ @collectorUJN
कभी-कभी हम किसी की जिंदगी में
बस एक बातचीत होते हैं
एक आदत होते हैं,
एक खाली समय भरने का जरिया होते हैं।
और हम उसे
रिश्ता समझ बैठे होते हैं।
शायद इसलिए अकेलापन इतना नहीं दुखता
जितना यह एहसास दुखाता है
कि जिसे हम अपना समझ रहे थे
उसके लिए हम
सिर्फ एक समय-व्यतीत करने वाले साथी थे।
In present scenario as parents, our biggest responsibility is not just to give our children a successful future, but to give society a good human being.
Wheather they grow up to be engineers, doctors, entrepreneurs, or whatever they. But having strong moral values.
Every parent wants to give their child the best possible start.
But sometimes, we've started confusing "the best" with "the most expensive."
A good school absolutely matters. A safe environment, great teachers, and meaningful opportunities can make a real difference.
But beyond a certain point, your child's future is shaped far more by curiosity, values, emotional security, and the environment they grow up in at home than by the brand name on their school uniform.
The goal isn't to win the school race.
The goal is to raise a confident, kind, curious, and resilient human being.
Twenty years from now, very few people will remember where your child went to school.
They'll remember the person they became.
What do you think matters most in shaping a child's future?
Disclaimer-
This reel discusses general patterns and is not a judgment of any school or parenting choice. Every child and every family's circumstances are different.
#life #mindset #kids #school
कलियुग का अब तक का सबसे घिनौना स्वरूप…. इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ
मुंबई में बड़े कपड़ा व्यापारी रहे शिवचरण रामरत्न गुप्ता की हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में मौत हो गई. आश्रम से इसकी सूचना उनकी तीनों बेटियों को दी गई
तीनों में से कोई भी बेटी नहीं आई। कलयुगी बेटियों ने ऑनलाइन 5100 रुपए भेजकर अंतिम संस्कार सोनीपत में ही कराने को कहा। वीडियो कॉल के जरिए पूरी प्रक्रिया देखा
ऐसी औलाद समाज के लिए अभिशाप है।
जयपुर के ये छात्र जर्जर क्लास रूम, साफ़ पीने का पानी भी नहीं और गंदे टॉयलेट के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं।
जो बच्चे सुन नहीं सकते, बोल नहीं सकते… वो भी आज अपनी आवाज़ उठा रहे हैं।