राजनीतिक विश्लेषक | MA Political Science (BU, Bhopal) 🎓 | सीवान, बिहार | लोकतंत्र, नीति और इतिहास में गहरी रुचि | बेबाक विचार ✍️
हमेशा प्रगति के पक्ष में।
ये पटना नाला रोड की तस्वीर है और आज की है ,कुछ घंटे पहले की
आप तस्वीर से बहुत कुछ अंदाजा लगा सकते है,
लोग बदलाव तो चाहते है लेकिन खुल कर सामने नहीं आ पा रहे है और उनको अंतिम समय फिर ठगाए जाने का डर सता रहा है ,ये ग्राउंड पर बात करने पर पता चला है...
तो सभी से नम्र निवेदन है कि हम तो बहुत बार ठगे गए है लेकिन जो उम्मीद और जज्बा प्रशांत किशोर ने जगाई है वो औरों से अलग है इसलिए...
....पूरा देश प्रशांत किशोर से उम्मीद लगाए बैठा है।
बांकीपुर वालों, पूरी ताकत लगा दो। इस भ्रष्ट सरकार का सफाया अब ज़रूरी है। भविष्य के प्रधानमंत्री को जिताओ!
@amarkant_jha_1 इन चोरों को ही तो पहचानना है ,अब बिहार से बिहारी शब्द की परिभाषा को सुदृढ़ करना है...बिहारी एकता और बिहारी मजदूर को केवल मजदूर के नजर से नहीं बल्कि काबिलियत के नजर और सम्मान को उठाना है
घमंड टूटा,अरे बीजेपी घमंड टूटना भी नहीं चाहिए
रामकृपाल अब तो जान गए होंगे कि प्रशांत किशोर कहां के हैं, कौन है ,क्या है ,कितना ताकतवर है, कि अभी भी बाकी है ।आप सब जान गए होंगे प्रशांत किशोर के बारे में ,बोलते हैं कि कौन है हम नहीं जानते हैं अब तो जान गए होंगे आपभी...
जनता का जनादेश किसी की बपौती नहीं होता। 40 वर्षों का राजनीतिक गढ़ भी तब बदल जाता है, जब जनता बदलाव का मन बना लेती है। यदि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी सीट हार रहे हैं, तो यह जनता के मूड का स्पष्ट संकेत है—लोकतंत्र में सबसे बड़ा फैसला जनता ही सुनाती है।
प्रशांत किशोर की जीत से भी ज्यादा खुशी इस बात की है कि भाजपा का अहंकार चूर हो गया है। जो भाजपा का अहंकार चरम पर था कि हम कुत्ता-बिल्ली को भी जिता देंगे बांकीपुर से, आज भाजपा के वो तमाम नेता कुत्ता-बिल्ली वाला चेहरा लेकर घूम रहे हैं। यही लोकतंत्र का सौंदर्य है। जब आप मतदाताओं को अपमानित करते हैं, तो मतदाता आपको ऐसे ही सबक सिखाता है।
बांकीपुर के बारे में लोग जानते हैं कि यह पटना जिला का शहरी विधानसभा क्षेत्र है। पहले इसका नाम पटना पश्चिम हुआ करता था और लगभग 40 वर्षों से यह भाजपा का अभेद्य दुर्ग और गढ़ रहा था। पहले यहां से नवीन किशोर सिन्हा विधायक हुआ करते थे, फिर उनकी मौत के बाद उनके बेटे नितिन नवीन आ गए और नितिन नवीन बिहार सरकार में मंत्री भी रहे। फिर पिछले कुछ महीने पहले वो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए, राज्यसभा चले गए और उन्होंने ये सीट खाली कर दी, तो यहां उपचुनाव हुआ। अब जब चुनाव आयोग ने उपचुनाव की अधिसूचना जारी की थी, तब तो भाजपा वाले एकदम सत्ता के नशा में चूर थे और कहते थे कि हम तो कुत्ता-बिल्ली खड़ा कर देंगे बांकीपुर से तो वो भी जीत जाएगा। लेकिन उसके बाद जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर की एंट्री हो गई।
यह दिलचस्प बात है कि प्रशांत किशोर जिंदगी में पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं और वो भी बांकीपुर से, इसके पहले वो चुनाव लड़ाते थे, लड़ते नहीं थे। एक तरह से कहा जाए तो उन्होंने बहुत बड़ा राजनीतिक जोखिम लिया कि उन्होंने अपनी चुनावी पारी की शुरुआत ऐसी जगह से की जिसे भाजपा का दुर्ग माना जाता था। और उसके बाद देखिए, धीरे-धीरे भाजपा के हाथ-पैर एकदम फूलते गए और घबराहट में भाजपा ने एक के बाद एक कई कदम उठाए। पहला काम तो यह किया कि भाजपा ने अपना उम्मीदवार बदला; अभिषेक सिन्हा बंटी को हटाया और नीरज सिन्हा को उम्मीदवार बना दिया। फिर भाजपा ने जन सुराज पार्टी में तोड़-फोड़ मचा दी और जो गणितज्ञ माने जाते हैं, केसी सिन्हा, उनको भाजपा में शामिल किया गया। फिर भाजपा ने जनशक्ति जनता दल की जो उम्मीदवार थीं, वीणा मानवी, उनका पर्चा रद्द करवा दिया। इसके बाद भाजपा ने प्रशांत किशोर की घेराबंदी के लिए 40 स्टार प्रचारकों की फौज उतारी, जिसमें रिंकिया के पापा से लेकर पावर स्टार तक सब शामिल थे।
चुनाव के दौरान ही सम्राट चौधरी ने भरत तिवारी के परिजनों से मुलाकात की, क्योंकि भरत तिवारी की हत्या भी एक बड़ा मुद्दा बन रही थी। उसके बाद जिलाधिकारी पटना ने मतदाता जागरूकता के नाम पर जीविका दीदियों को लगा दिया और वो जीविका दीदियां घर-घर जाकर कहती थीं कि भाजपा को वोट दो नहीं तो राशन बंद हो जाएगा। जब तेज प्रताप यादव ने प्रशांत किशोर का सपोर्ट किया, तो उन्हें झूठे मामलों में जेल भेज दिया गया और बेउर जेल घुमा दिया गया। मतलब पूरा गुंडई और नंगा नाच हुआ और यह सब मतदान के आखिरी दिन तक चला। बांकीपुर में भाजपा की जो यह हार हुई है, उसमें तीन लोगों की नाक कट गई है ,सम्राट चौधरी, नितिन नवीन और कार्तिकेय शर्मा की। ये जो कार्तिकेय शर्मा हैं, आईपीएस अधिकारी और पटना के सीनियर एसपी हैं, इन्होंने पूरी चुनावी प्रक्रिया के दौरान भाजपा के गुंडे की तरह काम किया।
मतदान से एक रात पहले, आधी रात में एक-दो बजे घर-घर में घुसकर पटना पुलिस ने जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं को उठाया, जिसे एकदम एकतरफा कार्रवाई कहा जा सकता है। यहां तक कि मतदान के दिन मारपीट भी हुई है, खुशबू पाठक को मतदान के दिन भाजपाई गुंडों ने मारा-पीटा है। इन सबके बावजूद, आज इन लोगों की इतनी शर्मनाक हार हुई है। प्रशांत किशोर 19,000 वोट से जीते हैं, जबकि मुश्किल से 35 फ़ीसदी ही मतदान हुआ था। 19,000 एक बहुत अच्छा खासा मार्जिन होता है। नितिन नवीन के बूथ पर भाजपा पिछड़ गई, रामकृपाल के बूथ पर भाजपा पिछड़ गई, नीरज सिन्हा के बूथ पर भाजपा पिछड़ गई। अब तो इन लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए।
लेकिन काम अब भी नहीं खत्म हुआ है ये 2014 के बाद अगला जोश है और हमलोग प्रशांत किशोर को बिहार का चीफ मिनिस्टर बना कर ही दम लेंगे
जय बिहार
बिहार की राजनीति का सबसे निर्णायक दिन आज है! 🔥
•आज भाजपा के राजनीतिक पतन की शुरुआत होगी।
•आज राजद की राजनीति को सबसे बड़ा झटका
मिलेगा।
•आज जनसुराज के नए दौर का आगाज़ होगा। 🚩🔥
बिहार बदलाव लिखने जा रहा है।
जय बिहार ✊🙏
हमारे दो नेता/कार्यकर्ता (Ward 30:- सुजीत और गब्बर) को बेउर थाना अरेस्ट किया था। कोई चार्ज नहीं, बस ऐसे ही...
अभी जन सुराज के वरीय नेता आरके मिश्रा (पूर्व DG, बिहार) जी और मुंगेर के पूर्व कमिश्नर से सेवानिवृत्त ललन बाबू के साथ अपने दोनों Jan Suraaj के नेताओं/ कार्यकर्ताओं को छुड़वा लिया गया है ✊✌️
ये जानते हैं कि चुनाव हार गये हैं इसलिए पुलिस से डिस्टर्ब कर 03 बजे के बाद BJP के लोग Bogus करना चाहता है
डटे रहिए, जमे रहिए... हमलोग जीत चुके हैं!
70% एकतरफा वोटिंग हमारे पक्ष में चल रहा है।
#PrashantKishor #JanSuraaj #Bankipur #jsp
आज उन सभी युवाओं को यह देखना चाहिए जो चंद पैसों या स्वार्थ के लिए अन्य राजनीतिक पार्टियों के पीछे आँख मूंदकर भाग रहे हैं। एक बार प्रशांत किशोर जी को देखिए! एक सच्चा नेता वही होता है जो अपने दो सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए भी चिंतित हो और उनके हक के लिए पुलिस-प्रशासन से भिड़ जाए।
ज़रा सोचिए, जो व्यक्ति अपने कार्यकर्ताओं के लिए इतना फिक्रमंद है, यदि उसके हाथों में बिहार का नेतृत्व सौंपा जाए, तो वह कैसे एक 'नए बिहार' का निर्माण करेगा। वह पूरे बिहार को अपना परिवार मानते हैं। मेरी नज़र में, वह एक सच्चे और निस्वार्थ इंसान हैं, जो केवल अपनी मातृभूमि और मिट्टी का कर्ज चुकाने के लिए बिहार वापस आए हैं।
बिहारवासियों, अगर सच में एक नया और खुशहाल बिहार बनाना है, तो आगे आएं और इनका साथ दें। वरना, पिछले 70 सालों से जिन नेताओं ने आपको जाति, धर्म, मंदिर और मस्जिद के नाम पर उलझाकर सिर्फ आपका वोट लिया है, वे आगे भी आपको ऐसे ही मूर्ख बनाते रहेंगे। फैसला आपके हाथ में है!
जय बिहार!
लोग बोल रहे है ये बच्चे नहीं है आतंकवादी है तो भाई सा बच्चे ऐसे ही होते है या तो आप कॉलेज , यूनिवर्सिटी में पढ़े ही नहीं हो या स्टूडेंट ग्रुप के साथ रहे ही नहीं हो ... टोटल ऑर्गेनिक माइंड ही होता है बच्चों का और तुम कर क्या रहे हो सिर्फ जितना दम है उतना दम से लाठी भांज रहे हो ,थकते नहीं क्या...
थक गए होगे। नींद तो आ जाएगी ना आज रात को। तकलीफ इस बात की नहीं रहेगी कि तुम लाठी नहीं मारते। मारना ना मारना तुम्हारे हाथ में था ही नहीं। तुम तो अपना काम कर रहे थे, हम समझते हैं। तकलीफ इस बात की जरूर रहेगी कि तुम थोड़ा धीरे से मारते। इतने धीरे से कि चोट नहीं लगती।
तुमने चुनाव किया है कि मुझे कितनी ज़ोर से वो लाठी घुमानी है। और इस चुनाव के साथ तुमको आजीवन जीना पड़ेगा याद रखना। ये भ्रम अपने अंदर मत रखना कि मुझे सरकार ने मारने के लिए बोला था। कितनी ज़ोर से मारना है ये सरकार ने नहीं बोला था। ये तुमने चुना था और ये चुनाव मरते दम तक तुम्हारे भीतर रहेगा।
तुम चाहते तो धीरे भी मार सकते थे, बच्चे ही तो थे ना। और ये युद्ध का नियम होता है कि निहत्थों पे वार नहीं किया जाता। दुनिया का पहला प्रोटेस्ट नहीं है। बहुत से देशों में प्रोटेस्ट हुआ है जहां पुलिस ने चुना है ना मारना, रोकना। ये तुम कर सकते थे आज।
लेकिन तकलीफ आज सबसे ज्यादा तुमसे है। तुमने जितनी बेरहमी से मारा है ना वो लाठियां सिर्फ वहां के बच्चों को नहीं पड़ी हैं, जो वहां नहीं थे उनको भी पड़ी हैं। और हम लोग भूलेंगे नहीं इस बात को।
किसी सरकार से कोई गुरेज नहीं है। तुम अपनी पार्टियां चलाते रहो, सब करते रहो। मार्स पे जब आबादी आ जाए तुम वहां भी अपनी पार्टी बना लेना, मतलब नहीं है। हमें मतलब है जब तुम वो लाठी घुमा रहे थे तो कितनी ज़ोर से घुमाना है, वो इंसानियत से। और उसको तुमने चुना है आज मारना।
खैर, अच्छे से सोना, बढ़िया नींद लेना, हल्दी वाला दूध पी लेना और... हम तुमको याद रखेंगे गुरु। याद रखेंगे।"
कृप्या बड़े भीमकाय मुँह वाले लोग अपनी ज्ञान ना दे की बच्चे है तो सिर्फ पढ़ना चाहिए ये सब नहीं करना चाहिए तो ऐ dash dash वाले तुम क्यों नहीं उतर जाते मैदान में , बच्चे पढ़ाई करते ... तुमको तो भीमकाय शक्ल बना कर हुवा हुवा करके , मुंह में पान रखकर ज्ञान बांटना है
कुछ नहीं कहना है ,बस आप।महसूस करे और बांकीपुर से अपने छिपे भाव को प्रदर्शित करे...
आखिर हमें क्या चाहिए विकास चाहिए या ऐसी सरकार जो हमारी बात ही ना सुने...
इतिहास के पन्नों को पलटते हुए कई बार एक अजीब सी टीस उठती है। सोचिए, वे सात समंदर पार से आए अजनबी शासक, जिनका हमारी मिट्टी, हमारी बोलियों और हमारी रगों में बहती संस्कृति से कोई सीधा वास्ता नहीं था, उन्होंने भी इस देश को समझने की कोशिश की। हुकूमत करने के बावजूद, उन्होंने हमारी परंपराओं को सिरे से खारिज करने के बजाय हमारे साहित्य और दर्शन में गहरी दिलचस्पी दिखाई। उन्होंने सिर्फ राज नहीं किया, बल्कि हमारे विलुप्त हो रहे ज्ञान को सहेजा, गौरवशाली प्राचीन ग्रंथों के अनुवाद किए, और इस देश की नई पीढ़ी के हाथों में आधुनिक शिक्षा की मशाल थमाने का एक ईमानदार, संस्थागत प्रयास किया।
हम बेशक यह तर्क दे सकते हैं कि बनारस में संस्कृत कॉलेज का खुलना, विलियम जोन्स द्वारा 'अभिज्ञान शाकुंतलम्' का अनुवाद, या फिर चार्ल्स वुड के डिस्पैच से विश्वविद्यालयों की नींव पड़ना—यह सब उनके साम्राज्यवादी स्वार्थों के छलावे थे। मंशा चाहे जो रही हो, लेकिन परिणाम यही हुआ कि उस शिक्षा ने भारत की सोई हुई चेतना को झकझोर कर रख दिया। आज का बड़े से बड़ा राष्ट्रवादी भी इस सच से मुंह नहीं मोड़ सकता कि उसी विदेशी शिक्षा और नीतियों की खिड़की से भारत ने अपनी खोई हुई अस्मिता को पहचाना और राष्ट्रीय संस्कृति को एक नई दिशा मिली।
यह उसी शिक्षा रूपी खाद-पानी का नतीजा था कि उन्नीसवीं सदी के अंत तक इस देश की मिट्टी से ऐसे प्रखर युवा बुद्धिजीवी, वकील और पत्रकार निकले, जिनकी बौद्धिक धार ने अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिला दीं। उसी पीढ़ी ने एक सच्चे, वैचारिक और स्वदेशी राष्ट्रवाद की नींव रखी। उन्होंने उसी शिक्षा को हथियार बनाया, आंखों में आंखें डालकर सवाल किए और आज़ादी की वह मुकम्मल लड़ाई लड़ी, जिसने अंततः इस देश को खुली हवा में सांस लेने का अधिकार दिलाया।
लेकिन आज, जब हम मुड़कर अपने ही बनाए इस 'स्वतंत्र' और 'राष्ट्रवादी' भारत को देखते हैं, तो कलेजा मुंह को आता है। आज जो लोग हर सांस के साथ राष्ट्रवाद का दम भरते हैं, जो खुद को इस देश के धर्म और संस्कृति का इकलौता ठेकेदार मानते हैं, उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था को किस दलदल में धकेल दिया है? आज के युवाओं के लिए एक बेहतर भविष्य की खिड़कियां धीरे-धीरे बंद की जा रही हैं। एक पारदर्शी और निष्पक्ष परीक्षा का आयोजन, जो किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बुनियादी जिम्मेदारी है, आज एक अकल्पनीय सपना बन गया है। पूरे के पूरे शिक्षा तंत्र में एक ऐसा खोखलापन और अविश्वास भर गया है कि अब उस पर से भरोसा ही उठने लगा है।
क्या यह इक्कीसवीं सदी के हमारे इस आजाद भारत की सबसे रुला देने वाली विडंबना नहीं है? सालों-साल बंद कमरों में अपनी आंखों में सपने सजाकर, दिन-रात एक कर देने वाले युवा जब सड़क पर उतरते हैं, तो वे कोई राजपाट नहीं मांगते। वे सिर्फ इतनी सी गुहार लगाते हैं कि उनकी परीक्षा निष्पक्ष हो, उनके पसीने और मेहनत के साथ कोई छल न हो। लेकिन इस 'राष्ट्रवादी' दौर में उन निहत्थे, अहिंसक युवाओं को जवाब में क्या मिलता है? पुलिस की बेरहम लाठियां। यह सिर्फ लाठियां नहीं बरस रही हैं, यह उस हर युवा के सपनों की हत्या हो रही है, जो एक ईमानदार व्यवस्था की उम्मीद में आज भी किताबें सीने से लगाए बैठा है।
@Bahari_Bihari If these statements are genuine, they should be condemned. Abuse, hatred, and humiliation have no place in any relationship regardless of gender. Respect and equality must go both ways.
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और अपनी बात रखना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
जब सरकारें जनता की जायज मांगों, जैसे बेहतर शिक्षा व्यवस्था संरक्षण की अनदेखी करती हैं, तो शांतिपूर्ण अनशन ही एकमात्र रास्ता बचता है।
सोनम वांगचुक जैसे निस्वार्थ देशभक्त को, जो देश के भविष्य और युवाओं के हक के लिए आवाज उठा रहे हैं, अनशन करने से रोकना या जबरन हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
नागरिकों की आवाज को दबाने के बजाय सरकार को संवेदनशीलता दिखाते हुए उनसे बातचीत करनी चाहिए।
असहमति का सम्मान करना ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।
सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से जबरन हटाना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध के संवैधानिक अधिकार पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
लोकतंत्र में असहमति का जवाब संवाद से दिया जाता है, दमन से नहीं। किसी भी सरकार की परिपक्वता उसकी आलोचना सुनने और बातचीत करने की क्षमता से तय होती है, न कि विरोध की आवाज़ को बलपूर्वक दबाने से।
लोकतंत्र की असली पहचान संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही है - डर, दमन और चुप्पी नहीं।
जब हमलोगो कि टीम ने इसको पकड़ा तो इसको जवाब देना मुश्किल हो गया, आगे आप वीडियो देखे तो समझ जाएंगे , बाकी बांकीपुर विधानसभा की सम्मानित जनता से विनम्र अपील है कि 🙏
प्रिय बांकीपुर विधानसभा के सम्मानित मतदाता भाइयों, बहनों और युवा साथियों,
यह चुनाव केवल एक प्रतिनिधि चुनने का नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र और आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य का निर्णय लेने का अवसर है।
यदि आप ईमानदार राजनीति, बेहतर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, पारदर्शिता और विकास की नई सोच का समर्थन करते हैं, तो जन सुराज के उम्मीदवार प्रशांत किशोर जी को अपना बहुमूल्य वोट देकर विजयी बनाएं।
आपका एक-एक वोट बदलाव की मजबूत नींव रख सकता है। आइए, हम सब मिलकर एक विकसित, शिक्षित और समृद्ध बांकीपुर के निर्माण में अपनी भागीदारी निभाएँ।
इस बार वोट विकास, ईमानदारी और नई सोच के नाम।
जन सुराज के पक्ष में मतदान करें।
धन्यवाद। जय हिंद।