महाराष्ट्र, कोल्हापुर में बाढ़ का पानी गैस सिलेंडर गोदाम तक पहुंच गया बताया जा रहा HPCL कंपनी के हजारों सिलेंडर पानी के तेज बहाव में बह गए...
करीब 3 महीने पहले जिन गरीबों को लूटा था,
आज वही गोदाम बाढ़ में बह गया
कर्म का हिसाब देर से सही, लेकिन होता ज़रूर है
दारा सिंह ने अपने बेटे विंदू को फराह नाज़ से शादी ना करने की सलाह दी थी, क्योंकि यह अलग-अलग धर्मों के बीच होने वाली शादी थी..
उन्होंने कहा था: हिंदू-मुस्लिम शादियां बहुत मुश्किल होती हैं..
विंदू प्यार में था और उसने बात नहीं मानी लेकिन बाद में उसे एहसास हुआ कि उसके पिता सही थे
एक आदमी ₹40 लाख का प्लॉट खरीदने जा रहा था?
उसने सोचा कि पैसे दूंगा, रजिस्ट्री होगी और जमीन मेरे नाम हो जाएगी।
लेकिन रजिस्ट्री ऑफिस पहुंचते ही उससे पूछा गया,
"कौन-सी रजिस्ट्री करवानी है?"
वह हैरान रह गया।
उसे लगा था कि ₹40 लाख का प्लॉट हो या ₹4 करोड़ का मकान,
हर जगह एक ही तरह की रजिस्ट्री होती होगी।
तब उसे समझाया गया कि Property की कीमत नहीं,
बल्कि उसका लेन-देन किस तरीके से हो रहा है, उसी के हिसाब से रजिस्ट्री तय होती है।
अगर आपने ₹40 लाख का प्लॉट खरीदा है,
तो Sale Deed बनती है।
अगर कोई पिता अपनी ₹60 लाख की जमीन बेटे या बेटी को बिना पैसे लिए देना चाहते हैं,
तो Gift Deed बनती है।
अगर दो भाइयों के बीच ₹1 करोड़ की पुश्तैनी जमीन का ���ंटवारा होना है,
तो Partition Deed की जरूरत पड़ती है।
अगर परिवार का कोई सदस्य ₹25 लाख के अपने हिस्से का अधिकार छोड़ना चाहता है,
तो Relinquishment Deed (हक त्याग डीड) बनती है।
अगर दो लोग ₹30-30 लाख की अपनी-अपनी जमीन आपस में बदलना चाहते हैं,
तो Exchange Deed बनाई जाती है।
अगर ₹50 लाख का Home Loan लेने के लिए मकान बैंक के पास गिरवी रखा जाता है,
तो Mortgage Deed बनती है।
और अगर ₹20 लाख की दुकान या ₹80 लाख का मकान 11 साल के लिए पट्टे पर देना हो,
तो Lease Deed का इस्तेमाल किया जाता है।
तब उस आदमी को समझ आया कि अगर ₹40 लाख की Property पर गलत रजिस्ट्री बन गई,
तो आगे चलकर कानूनी विवाद और लाखों रुपये का नुकसान भी हो सकता है।
इसलिए उसने सीखा कि Property खरीदते समय सिर्फ कीमत नहीं,
सही रजिस्ट्री चुनना भी उतना ही जरूरी ह?
प्रकृति के इस सूखे के संकेत को गंभीरता से लें, पानी की बरबादी रोकें 👇
जैसे कि इस साल जामुन की बंपर बहार
इस साल बाजार में दिख रहे हैं।
इतने जामुन मैंने पिछले दो तीन दशकों में कभी नहीं देखे।
जहां भी देखिए जामुन के पेड़ों के नीचे जामुन के ढेर लगे हैं।
जिन पेड़ों पर पिछले साल इक्का-दुक्का फल आए थे, वे पेड़ भी इस बार जामुन से लदे हुए हैं।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
हमारे बुजुर्ग हमेशा कहते थे कि.....
"जिस गर्मी में जामुन ऐसे ढेरों गिरते हैं, उस साल सूखा पड़ता है।"
बुजुर्गों का ये पारंपरिक ज्ञान वनस्पति शास्त्र के हिसाब से बिल्कुल सटीक है। विज्ञान में इस प्रक्रिया को "Masting" या "Stress Fruiting" कहते हैं।
पेड़ों के खुद को खत्म करके ज्यादा से ज्यादा फल देने के इस आखिरी प्रयास को "Suicide Fruiting" या "Bumper Crop" भी कहा जाता है।
विज्ञान इसके बारे में कहता है कि....
Survival Instinct यानी अस्तित्व की लड़ाई
जब पेड़ को जमीन के नीचे पा��ी की कमी महसूस होती है, तब पेड़ "Defense Mode" में चला जाता है। अपनी प्रजाति को जिंदा रखने के लिए पेड़ अपनी सारी ताकत फल बनाने में लगा देता है।
और नए पत्ते-टहनियों पर रोक लग जाती है।
ऐसे साल में पेड़ नई कोंपल निकालना बंद कर देता है।
ऊर्जा बचाकर सिर्फ जामुन का उत्पादन बढ़ाता है।
इसीलिए पिछले साल कम फल वाले पेड़ भी इस बार लदे ह��ं।
इस भविष्यवाणी और सूखे से रिश्ता देखें तो हमारे बड़े बूढ़ों का अनुभव सही है, क्योंकि पेड़ मौसम के बदलाव को पहले पहचान लेते हैं।
जामुन की जड़ 'Taproot' बहुत गहराई तक जाती है।
जब भूजल स्तर बहुत नीचे जाता है, तभी जड़ों को तनाव महसूस होता है।
ये तनाव ही आने वाले सूखे का संकेत है।
सीधी बात सी बात यह है कि,
जामुन का पेड़ आत्महत्या नहीं कर रहा, बल्कि खुद का बलिदान देकर अगली पीढ़ी को जन्म दे रहा है।
यहां हमारे पूर्वजों ज्ञान अनेकों पीढ़ियों का अनुभव और विज्ञान यहां एक बिंदु पर मिलते हैं।
इस साल जामुन का स्वाद लें, पर प्रकृति के इस 'सूखे' के संकेत को गंभीरता से देखें।
पानी संभलकर इस्तेमाल करें।।
प्रश्न :- अगर श्री राम का मंदिर तोड़ा गया तो इसका जिक्र तुलसीदास ने क्यो नही किया..??
प्रश्न वाजिब था..
खैर तलाश, रिसर्च प्रारम्भ हुआ और मि��� भी गया....
पढ़ें तुलसीदास जी ने भी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है!
सच ये है कि कई लोग तुलसीदास जी की सभी रचनाओं से अनभिज्ञ है और अज्ञानतावश ऐसी बातें करते हैं l
वस्तुतः रामचरित मानस के अलावा तुलसीदास जी ने कई अन्य ग्रंथो की भी रचना की है . तुलसीदास जी ने *तुलसी शतक* में इस घंटना का विस्तार से विवरण भी दिया है .
हमारे वामपंथी विचारको तथा इतिहासकारो ने ये भ्रम की स्थति उत्पन्न की, कि रामचरितमानस में ऐसी कोई घटना का वर्णन नही है .
*"तुलसी दोहा शतक "* का अर्थ इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रस्तुत किया है |
प्रत्येक दोहे का अर्थ उनके नीचे दिया गया है , ध्यान से पढ़ें |
*(1) मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।*
*जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास ॥*
श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और ��तिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।
*(2) सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग ।*
*भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग ॥*
श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवीत से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।
*(3) बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।*
*हने पचारि पचारि जन तुलसी काल कराल ॥*
श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार ���िये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।
*(4) सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि ।*
*तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि ॥*
(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)
श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।
*(5) राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय ।*
*जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी कीन्ही हाय ॥*
जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।
*(6) दल्यो मीरबा��ी अवध मन्दिर रामसमाज ।*
*तुलसी रोवत ह्रदय हति त्राहि त्राहि रघुराज॥*
मीर बाकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदीर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।
*(7) राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।*
*तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच ॥*
तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीर बाकी ने मस्जिद बनाई ।
*(8)रामायन घरि घट जँह, श्रु���ि पुरान उपखान ।*
*तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान ॥*
श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।
गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया
है!
सभी से विनम्र निवेदन है कि सभी देशवासियों को अपने सभ्यता के स्वर्णिम युग के गौरवशाली अतीत के बारे में बताइये....Read News
जरा आहिस्ते तमाचे मार जिंदगी,
चेहरे पर निशान दिखने लगे हैं 🥺
वीडियो महाराष्ट्र के लातूर जिले के बांबली गाँव तहसील देवनी का है काशीनाथ गायकवाड़ एक गरीब किसान हैं बिजली गिरने से उनका एक बैल मर गया पैसों की कमी की वजह से दूसरा बैल खरीद नहीं पाए तो उनकी पत्नी हौसाबाई ने ही बैल की जगह ले ली मेरी @Dev_Fadnavis जी से दरख्वास्त है कि किसान दंपति की उचित मदद करें 🙏
52 वेबसाइटें जो ज़्यादातर कॉलेज डिग्रियों से ज़्यादा कीमती हैं:
1. Coursera. org – यूनिवर्सिटी के कोर्स, जिन्हें आप पूरी तरह से मुफ़्त में देख सकते हैं
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4. GitHub. com – असल दुनिया के प्रोजेक्ट्स से कोडि��ग सीखें
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6. Archive. org – लाखों मुफ़्त किताबें और पुरानी वेबसाइटें देखें
7. Project Gutenberg – 70,000 मुफ़्त क्लासिक किताबें
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9. Notion. so – अपनी पूरी ज़िंदगी और पढ़ाई को व्यवस्थित करें
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12. OpenLibrary. org – लाखों किताबें ऑनलाइन मुफ़्त में उधार लें
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15. PubMed. gov – असली साइंटिफ़िक रिसर्च पेपर्स देखें
16. Edx. org – Harvard, MIT और दूसरी जगहों के मुफ़्त कोर्स
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18. Anki – अब तक बनाया गया सबसे दमदार मेमोरी टूल
19. Canva. com – डिज़ाइनर न होते हुए भी कुछ भी डिज़ाइन करें
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21. Readwise. io – आपने जो कुछ भी पढ़ा है, वह सब याद रखें
22. Google Scholar – असली एकेडमिक पेपर्स खोजें
23. Codecademy. com – कोडिंग करना पूरी तरह से मुफ़्त में सीखें
24. ChatGPT – AI ट्यूटर जो दिन के 24 घंटे उपलब्ध है
25. Figma. com – प्रोफ़ेशनल डिज़ाइन मुफ़्त में सीखें
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27. Huberman Lab Podcast – साइंस पर आधारित हेल्थ एजुकेशन
28. Mindmeister. com – बेहतर सोच के लिए माइंड मैपिंग
29. NerdWallet. com – पर्सनल फ़ाइनेंस को आसान बनाता है
30. Quizlet. com – फ़्लैशकार्ड्स की मदद से ज़्यादा स्मार्ट तरीके से पढ़ाई करें
31. Gapminder. org – दुनिया की असली हालत देखें
32. PhET Simulations – ऑनलाइन इंटरैक्टिव साइंस एक्स���ेरिमेंट
33. Numbeo. com – धरती के हर शहर के लिए रहने-सहने के खर्च का डेटा
34. 23andMe. com – अपनी खुद की जेनेटिक्स को समझें
35. Zapier. com – बिना कोडिंग के अपने काम को ऑटोमेट करें
36. Lesswrong. com – गहरी तार्किक सोच और फ़ैसले लेना
37. Documentaryheaven. com – हज़ारों मुफ़्त डॉक्यूमेंट्री
38. Trading Economics – हर देश के लिए आर्थिक डेटा
39. Perplexity. ai – AI से चलने वाला रिसर्च टूल
40. Stanford Encyclopedia of Philosophy – हर दार्शनिक विचार को समझाया गया है
41. Librivox. org – क्लासिक साहित्य की मुफ़्त ऑडियोबुक
42. Zooniverse. org – असली वैज्ञानिक रिसर्च में हिस्सा लें
43. Futurelearn. com – टॉप यूनिवर्सिटी से मुफ़्त छोटे कोर्स
44. Typing. com – सही तरीके से और तेज़ी से टाइप करना सीखें
45. Drawabox. com – बिल्कुल शुरू से चित्र बनाना सीखें
46. Grammarly. com – हर स्थिति में बेहतर लिखें
47. Khanacademy. org – हर किसी के लिए मुफ़्त, विश्व-स्तरीय शिक्षा
48. Desmos. com – सबसे शक्तिशाली मुफ़्त ग्राफ़िंग कैलकुलेटर
49. Stellarium. org – अपनी स्क्रीन से रात के आसमान को देखें
50. Psychologytoday. com – मानसिक स्वास्थ्य और मनोविज्ञान को समझाया गया है
51. Worldometers. info – हर चीज़ पर रियल-टाइम वैश्विक ��ँकड़े
52. Notion. so/ templates – अपनी पूरी ज़िंदगी को व्यवस्थित करने के लिए मुफ़्त टेम्प्लेट....Read News
डायनामाइट से पहाड़ तोड़ने लगे।
��ाँ का फैसला
सावित्री ने आरव को कमरे में बंद कर दिया। "अब एक शब्द नहीं। तूने बोला और किसी ने माना नहीं। अब चुप रह।"
पर आरव सो नहीं पाता था। वो दीवारों पर खरोंचता। "4:17... 4:17... पानी आ रहा है माँ..."
13वें दिन, सावित्री टूट गई। आधी रात को उसने गाँव के 10 परिवारों को जगाया - वो सब जिनपर उसे भरोसा था। "मेरा बेटा आज तक गलत नहीं निकला। मैं जा रही हूँ। जिसके साथ आना ��ै आ जाए।"
लोगों ने मज़ाक उड़ाया। सिर्फ 8 परिवार माने - 32 लोग। वो रातों-रात गाँव छोड़कर 30 किमी दूर ऊँचे टीले पर बने हनुमान मंदिर में चले गए।
4:17 सुबह
14वाँ दिन। 4:10 सुबह। देवताल गहरी नींद में था। पहाड़ पर ड्रिलिंग चल रही थी।
4:16 पर कुत्ते एक साथ रोने लगे। गायों ने रस्सी तोड़ दीं। हवा रुक गई।
4:17 पर... धमाका।
पहाड़ का एक हिस्सा नहीं, आधा पहाड़ फटा। और उसके अंदर से निकला समंदर। लाखों लीटर पानी, 100 फीट ऊँची दीवार बनकर। वो कोई बाढ़ नहीं थी, सैलाब था।
10 सेकंड में देवताल नक्शे से मिट गया। स्कूल, पंचायत, घर, रिसॉर्ट की नींव - सब। 400 लोग सोते हुए बह गए।
30 किमी दूर हनुमान मंदिर के टीले पर, 32 लोग काँपते हुए ये मंजर देख रहे थे। सावित्री आरव को सीने से लगाए रो रही थी।
आरव की आँखें खुली थीं। वो सैलाब को देख रहा था, पर रो नहीं रहा था। बस ��ीरे से बोला, "माँ, मैंने कहा था ना? पर काल को सिर्फ वही सुनता है जो सुनना चाहता है।"
बाद का सच
NDRF आई। सैटेलाइट इमेज आई। जियोलॉजिकल सर्वे की रिपोर्ट आई: "देवताल के नीचे 2 किमी लंबी भूमिगत झील थी। डायनामाइट से उसकी छत चटक गई। ये भारत की सबसे बड़ी 'जल-प्रलय' दुर्घटना है।"
मीडिया टूट पड़ा। "7 साल के बच्चे ने कैसे जाना?"
डॉ. वर्मा फिर आए। इस बार वो आरव के पैरों में बैठ गए। "बेटा, तू क्या है?"
आरव ने पहली बार पूरी बात बताई। "डॉक्टर अंकल, जब मैं 3 साल का था, तो सपने में एक सफेद रोशनी आई। उसने मेरे सिर पर हाथ रखा। बोली, 'बेटा, तू काल का दरवाज़ा है। तुझे वो दिखेगा जो होने वाला है। पर याद रखना, तू सिर्फ बता सकता है, बदल नहीं सकता। क्योंकि लोगों के कर्म का फैसला लोग खुद करते हैं'।"
"वो रोशनी कौन थी?"
आरव मुस्क��राया। "माँ। पर आपकी वाली नहीं, सबकी माँ।"
नया जीवन
सरकार ने उन 32 लोगों को नया गाँव बसाकर दिया - "नव-देवताल"। आरव अब 8 साल का है। वो स्कूल जाता है, क्रिकेट खेलता है।
पर अमावस्या की रात को वो नहीं सोता। कागज़ पर कुछ बनाता है। सावित्री ने एक बार देखी - वो नक्शे थे। किसी फैक्ट्री का, किसी पुल का, किसी शहर का। हर नक्शे पर क्रॉस बना था और समय लिखा था।
"बेटा ये क्या है?"
आरव ने कागज़ मोड़कर रख दिया। "माँ, ���भी वक्त नहीं है। जब वक्त होगा, मैं बोल दूँगा। पर पहले लोग सुनना सीखें। वरना मैं बोलता रहूँगा, और देवताल बनते रहेंगे।"
आज नव-देवताल में नियम है: अगर आरव बोले, तो पहले काम रोको, फिर सवाल पूछो।
क्योंकि गाँव ने सीख लिया है - दिव्य शक्ति उस बच्चे में नहीं थी। दिव्य शक्ति सत्य में थी। और सत्य बोलने के लिए 7 साल का दिल चाहिए, 70 साल का दिमाग नहीं।
बच्चे ने दुर्घटना बता दी थी। पर दुर्घटना पहाड़ में नहीं, ��ंसान के अहंकार में थी। जब अहंकार फटा, तो पानी निकला।
दिव्य शक्ति से भरपूर उस बच्चे ने पहले ही बता दी आने वाली दुर्घटना
हिमालय की गोद में बसा था गाँव - देवताल। नाम देवताल था क्योंकि कहते थे यहाँ के ताल में देवता नहाने आते हैं। चारों तरफ बर्फ से ढकी चोटियाँ, देवदार के जंगल, और नीचे बहती भागीरथी की सहायक नदी।
इसी गाँव में रहता था एक बच्चा - आरव। उम्र सिर्फ 7 साल। गोल मटोल चेहरा, बड़ी-बड़ी काली आँखें, और हमेशा होंठों पर अजीब सी मुस्कान। माँ सावित्री गाँव के स्कूल में टीचर थीं। पिता का नाम कोई नहीं जानता था। सावित्री अकेली ही आरव को पाल रही थी।
आरव बाकी बच्चों से अलग था। वो बोलता कम था, पर जब बोलता तो लोग चौंक जाते। 3 साल की उम्र में उसने संस्कृत के श्लोक बोलने शुरू कर दिए थे, जबकि घर में किसी को संस्कृत नहीं आती थी। 5 साल का हुआ तो आँखें बंद करके बता देता कि किसके घर में क्या हो रहा है।
गाँव वाले पहले डरते थे। "भूत-प्रेत का साया है।" पर जब आरव ने सरपंच की खोई हुई गाय जंगल में कहाँ बंधी है, ये बता दिया, तो लोग उसे "देवता का अंश" कहने लगे।
सावित्री परेशान रहती। "बेटा, सबको भविष्य मत बताया कर। लोग डर जाते हैं।" आरव हँसता, "माँ, मैं बताता नहीं हूँ। वो खुद बोल पड़ता है। जैसे कोई मेरे अंदर बैठकर बोल रहा हो।"
पहली चेतावनी: टूटा झूला
सावन का महीना था। गाँव में मेला लगा था। लकड़ी का बड़ा झूला लगा, जो 20 बच्चों को एक साथ झुलाता।
मेले वाली सुबह आरव चुप था। नाश्ता नहीं किया। सावित्री ने पूछा, "क्या हुआ?" आरव ने स्कूल के मैदान की तरफ देखा और धीरे से बोला, "माँ, आज झूले पर मत जाना। वो टूट जाएगा। बहुत रोना होगा।"
सावित्री का दिल ��ैठ गया। उसने मेले की कमेटी को बताया। लोग हँसे। "बच्चे की बात में आ गए? नया झूला है। इंजीनियर ने पास किया है।"
दोपहर 2 बजे, झूला बच्चों से भरा था। तभी ऊपर की बल्ली चटकी। लोहे की कीलें निकल गईं। 20 बच्चे 15 फीट से नीचे गिरे। 3 की हड्डी टूटी, 12 को चोट आई।
पूरा मेला सन्न। सब सावित्री के घर दौड़े। "तेरे बेटे को कैसे पता चला?"
आरव कोने में बैठा रो रहा था। "मैंने रोका था माँ। पर किसी ने सुना नहीं।" उस दिन से ग���ँव वाले आरव से डरने लगे भी, और मानने भी लगे।
दूसरी चेतावनी: भूस्खलन
भादों की रात। लगातार 7 दिन से बारिश हो रही थी। आरव रात को 2 बजे उठा। सावित्री के बिस्तर पर आकर बोला, "माँ, पहाड़ रो रहा है। वो कह रहा है, 'मैं गिरूँगा'। स्कूल के पीछे वाला पहाड़।"
सावित्री ने तुरंत प्रधान जी को फोन किया। प्रधान जी नींद में थे। "पागल हो गई हो? पहाड़ क्या बोलते हैं?"
पर सावित्री मानी नहीं। उसने स्कूल के चौकीदार को उ���ाया। "स्कूल खाली करो। बच्चों को धर्मशाला मे�� शिफ्ट करो।"
सुबह 5 बजे, भयानक आवाज़ आई। स्कूल के पीछे का पूरा पहाड़ दरक कर गिरा। स्कूल की बिल्डिंग मिट्टी में दब गई। अगर बच्चे वहाँ होते, तो 80 जान चली जाती।
अब गाँव वाले आरव के पैर छूने लगे। "बाल-देव है।" पर आरव और चुप हो गया।
डॉक्टरों की जाँच
शहर से न्यूज़ वाले आए। एक डॉक्टर भी आया - डॉ. वर्मा, न्यूरोलॉजिस्ट। "ये सब संयोग है। बच्चे का दिमाग चेक करना होगा।"
आरव का MRI हुआ, EEG हुआ। रिपोर्ट नॉर्मल। ���ॉ. वर्मा ने सावित्री से अकेले में कहा, "देखिए, साइंस में इसे 'प्रीकॉग्निशन' कहते हैं। पर इसका कोई सबूत नहीं। हो सकता है बच्चा बहुत संवेदनशील हो। हवा का दबाव, जानवरों की आवाज़, वो सब समझ जाता हो। उसे 'देवता' मत बनाइए। वरना बच्चा खो जाएगा।"
सावित्री रो पड़ी। "डॉक्टर साहब, वो रात को सोते हुए बात करता है। किसी और भाषा में। कहता है, 'काल देख रहा हूँ। काल से पहले बोलना है'।"
सबसे बड़ी दुर्घटना: भविष्यवा��ी
कार्तिक महीना। दिव���ली के 5 दिन बाद। आरव 3 दिन से खाना नहीं खा रहा था। आँखें लाल। वो बार आसमान देखता और काँप जाता।
चौथे दिन सुबह, वो पंचायत घर गया। पूरा गाँव वहाँ था, क्योंकि टूरिज्म का बड़ा प्रोजेक्ट पास हुआ था। पहाड़ काटकर 5-स्टार रिसॉर्ट बनेगा। 200 लोगों को नौकरी मिलेगी। सब खुश थे।
आरव बीच में आकर खड़ा हो गया। 7 साल का बच्चा, पर आवाज़ किसी बुजुर्ग सी।
"मत बनाओ। पहाड़ के नीचे पानी का समंदर है। अगर पहाड़ काटोगे, तो पानी फटेगा। 15 दिन बाद, सुबह 4 बजकर 17 मिनट पर। पूरा देवताल बह जाएगा। 400 लोग..."
पूरी पंचायत सन्न। ठेकेदार चिल्लाया, "ऐ लड़के, चुप! 200 करोड़ का प्रोजेक्ट है। शुभ-शुभ बोल।"
सरपंच बोला, "आरव बेटा, तू पहले सही निकला। पर ये तो हद है। साइंस वाले बोल रहे हैं, यहाँ कोई भूमिगत जल नहीं।"
आरव की आँखों से आँसू बहने लगे। "मैंने देख लिया सरपंच काका। माँ बह रही थी... बबलू का स्कूल... सब। प्लीज मत काटो पहाड़।"
लोगों ने बात हवा में उड़ा दी। "बच्चा है। डर गया होगा।" प्रोजेक्ट शुरू हो गया।
शेष कमेंट में
हिंदी, अंग्रेजी बोलने वाले वकीलों से आप मिले होंगे लेकिन आज मिलिए संस्कृत बोलने वाले वकील से..
इनका नाम है आचार्य श्याम उपाध्याय और यह 38 सालों से केवल संस्कृत भाषा बोलते हैं श्याम उपाध्याय शपथपत्र पत्रावली से लेकर कोर्ट में दलील तक संस्कृत भाषा में देते हैं। इनका कहना है कि 'न्यायालय का काम संस्कृत में नहीं होता, इसे देखते हुए उन्होंने यह निर्णय बचपन में ही ��े लिया था कि वह संस्कृत भाषा बोलने वाले वकील बनेंगे..हम सभी जानते हैं कि आज संस्कृत भाषा बहुत कम लोग बोलते हैं क्योंकि आज केवल अंग्रेजी को महत्व दिया जाता है, लेकिन इस बीच श्याम उपाध्याय का यह काम सराहनीय है...
#रोचक_कथा
बहुत समय पहले की बात है। कुरुक्षेत्र की भूमि पर महाभारत का भीषण युद्ध अप���े अंतिम चरण में पहुँच चुका था। चारों ओर विनाश का दृश्य था। असंख्य वीर योद्धा धराशायी हो चुके थे। कौरवों की सेना लगभग समाप्त हो गई थी और पांडव विजय के निकट थे। उसी रणभूमि में एक ओर भीष्म पितामह शरशैया पर लेटे हुए थे।
उनके समस्त शरीर में अर्जुन के बाण धँसे हुए थे। शरीर का कोई अंग ऐसा नहीं था जहाँ तीर न लगे हों। तनिक-सा हिलने पर असहनीय पीड़ा होती और बाणों के घावों से रक्त रिसने लगता। फिर भी वे जीवित थे, क्योंकि उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। जब तक वे स्वयं न चाहें, मृत्यु उन्हें स्पर्श नहीं कर सकती थी।
प्रतिदिन अनेक ऋषि-मुनि, राजा और योद्धा उनके दर्शन के लिए आते। सभी उनके धैर्य, त्याग और ज्ञान को प्रणाम करते। एक दिन स्वयं भगवान श्रीकृ���्ण भीष्म पितामह से मिलने पहुँचे। श्रीकृष्ण को देखते ही भीष्म के मुख पर हल्की मुस्कान आ गई।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा— “आइए प्रभु! आप तो सर्वज्ञ हैं। कृपा करके मुझे यह बताइए कि मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया था, जिसका दंड आज मुझे इस भयानक पीड़ा के रूप में मिल रहा है? मैंने जीवन भर धर्म का पालन किया, सत्य का साथ दिया, फिर भी यह कष्ट क्यों?”
श्रीकृष्ण शां�� स्वर में बोले— “पितामह! आपके पास दिव्य दृष्टि है। आप अपने पूर्व जन्मों को देख सकते हैं। स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर खोजिए।”
भीष्म ने नेत्र बंद कर लिए और ध्यान में लीन हो गए। उन्होंने अपने एक-एक पूर्व जन्म को देखना प्रारंभ किया। वे दस जन्म पीछे गए, फिर बीस, फिर पचास। उन्होंने सौ जन्मों तक अपने जीवनों को देखा। हर जन्म में उन्होंने धर्म, दान, तप और सदाचार ही पाया। कहीं भी ऐसा कोई पाप दिखाई नहीं दिया, जो इस भीषण यातना का कारण बन सके।
कुछ समय बाद उन्होंने आँखें खोलीं और आश्चर्य से बोले— “माधव! मैंने सौ जन्म देख लिए, पर मुझे कहीं भी ऐसा कोई कर्म नहीं मिला, जिसका फल यह कष्ट हो।”
तब श्रीकृष्ण ने गंभीर स्वर में कहा— “पितामह! एक जन्म और पीछे जाइए। उत्तर वहीं मिलेगा।”
भीष्म पुनः ध्यानस्थ हुए। इस बार उन्होंने 101वाँ जन्म देखा। उस जन्म में वे एक प्रतापी राजा थे। एक दिन वे अपनी विशाल सेना के साथ वनमार्ग से गुजर रहे थे। तभी एक सैनिक दौड़ता हुआ आया और बोला— “म��ाराज! मार्ग में एक सर्प पड़ा हुआ है। यदि सेना आगे बढ़ी तो वह कुचलकर मर जाएगा।”
राजा ने तुरंत आदेश दिया— “किसी जीव की हत्या उचित नहीं। उसे हटाकर सुरक्षित स्थान पर छोड़ दो।”
सैनिक ने आदेश का पालन किया। उसने सर्प को बाण की नोक पर उठाया और दूर झाड़ियों में फेंक दिया। किंतु दुर्भाग्य से वह झाड़ी अत्यंत कंटीली थी। सर्प उसमें बुरी तरह उलझ गया।
जितना वह बाहर निकलने का प्रयास करता, उतना ही अधिक काँटे उसके शरीर में धँसते जाते। उसके शरीर से रक्त बहने लगा। रक्त की गंध पाकर चींटियाँ और अन्य कीड़े वहाँ आ गए। वे जीवित सर्प को काटने लगे। बेचारा सर्प पाँच-छह दिनों तक असहनीय पीड़ा सहता रहा और अंततः तड़प-तड़पकर उसके प्राण निकल गए।
यह दृश्य देखकर भीष्म का हृदय काँप उठा। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा— “प्रभु! मेरा उद्देश्य तो उस सर्प की रक्षा करना था। मैंने जानबूझकर उसे कष्ट नहीं दिया। फिर भी मुझे इतना बड़ा दंड क्यों मिला?”
श्रीकृष्ण ��रुणा भरे स्वर में बोले— “तात श्री! संसार में प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है। चाहे कर्म जानबूझकर किया जाए या अनजाने में, उसका प्रभाव समाप्त नहीं होता। उस सर्प को अत्यंत पीड़ा हुई और उसके प्राण चले गए। उसी कर्म का फल आज आपको इस शरशैया के रूप में भोगना पड़ रहा है।”
उन्होंने आगे कहा— “आपके महान पुण्यों के कारण वह कर्मफल सौ जन्मों तक दबा रहा। किंतु जब समय आया, तब उसका फल सामने आ गया। यही कर्म क�� अटल नियम है।”
फिर श्रीकृष्ण बोले— “मनुष्य को हर कार्य अत्यंत सावधानी, दया और करुणा के साथ करना चाहिए। क्योंकि किसी भी जीव को दिया गया दुख कभी व्यर्थ नहीं जाता। वह किसी न किसी रूप में लौटकर अवश्य आता है।”
भीष्म पितामह मौन होकर श्रीकृष्ण की बातें सुनते रहे। उस दिन उन्हें कर्म और उसके फल का गहन रहस्य समझ में आ गया।
सच ही कहा गया है—
“मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल उसे अवश्य प्राप्त होत��� है।”
एक सेठ बड़ा धार्मिक था संपन्न भी था। एक बार उसने अपने घर पर पूजा पाठ रखी और पूरे शहर को न्यौता दिया। पूजा पाठ के लिए बनारस से ए��� विद्वान शास्त्री जी को बुलाया गया और खान-पान की व्यवस्था के लिए शुद्ध घी के भो��न की व्यवस्था की गई। जिसके बनाने के लिए एक महिला जो पास के गांव में रहती थी को सुपुर्द कर दिया गया।
शास्त्री जी कथा आरंभ करते हैं, गायत्री मंत्र का जाप करते हैं और उसकी महिमा बताते हैं उसके हवन पाठ इत्यादि होता है लोग बाग आने लगे और अंत में सब भोजन का आनंद लेते घर वापस हो जाते हैं। ये सिलसिला रोज चलता है।
भोज्य प्रसाद बनाने वाली महिला बड़ी कुशल थी वो अपना काम करके बीच बीच में कथा आदि सुन लिया क��ती थी।
रोज की तरह एक दिन शास्त्री जी ने गायत्री मंत्र का जाप किया और उसकी महिमा का बखान करते हुए बोले कि इस महामंत्र को पूरे मन से एकाग्रचित होकर किया जाए तो इस भव सागर से पार जाया जाएगा सकता है। इंसान जन्म मरण के झंझटों से मुक्त हो सकता है।
खैर, करते करते कथा का अंतिम दिन आ गया। वह महिला उस दिन समय से पहले आ गई और शास्त्री जी के पास पहुंची, उन्हें प्रणाम किया और बोली कि शास्त्री जी आपसे एक निवेदन है।
शास्त्री उसे पहचानते थे उन्होंने उसे चौके में खाना बनाते हुए देखा था। वो बोले कहो क्या कहना चाहती हो ?
वो थोड़ा सकुचाते हुए बोली शास्त्री जी मैं एक गरीब महिला हूँ और पड़ोस के गांव में रहती हूँ। मेरी इच्छा है कि आज का भोजन आप मेरी झोपड़ी में करें।
सेठ जी भी वहीं थे, वो थोड़ा क्रोधित हुए लेकिन शास्त्री जी ने बीच में उन्हें रोकते हुए उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बोले आप तो अन्नपूर्णा हैं। आप ने इतने दिनों तक स्वादिष्ट भोजन करवाया, मैं आपके साथ कथा के बाद चलूंगा।
वो महिला प्रसन्न हो गई ��र काम में व्यस्त हो गई। कथा खत्म हुई और वो शास्त्री जी के समक्ष पहुंच गई, वायदे के अनुसार वो चल पड़े गांव की सीमा पर पहुंच गए देखा तो सामने नदी है।
शास्त्री जी ठिठक कर रुक गए बारिश का मौसम होने के कारण नदी उफान पर थी कहीं कोई नाव भी नहीं दिख रही थी। शास्त्री जी को रुकता देख महिला ने अपने वस्त्रों को ठीक से अपने शरीर पर लपेट लिया व इससे पहले की शास्त्रीजी कुछ समझते उसने शास्त्री जी का हाथ थाम कर नदी में छलांग लगा दी और जोर जोर से ऊँ भूर्भुवः स्वः .... ऊँ भूर्भुवः स्वः बोलने लगी और एक हाथ ��े तैरते हुए कुछ ही क्षणों में उफनती नदी की तेज़ धारा को पार कर दूसरे किनारे पहुंच गई।
शास्त्री जी पूरे भीग गए और क्रोध में बोले मूर्ख औरत ये क्या पागलपन था अगर डूब जाते तो?
महिला बड़े आत्मविश्वास से बोली शास्त्री जी डूब कैसे जाते ? आप का बताया मंत्र जो साथ था। मैं तो पिछले दस दिनों से इसी तरह नदी पार करके आती और जाती हूँ।
शास्त्री जी बोले: क्या मतलब ?
महिला बोली कि आप ही ने तो कहा था कि इस मंत्र से भव सागर पार किया जा सकता है। लेकिन इसके कठिन शब्द मुझसे याद नहीं हुए बस मुझे ऊँ भूर्भुवः स्वः याद रह गया तो मैंने सोचा भव सागर तो निश्चय ही बहुत विशाल होगा जिसे इस मंत्र से पार किया जा सकता है तो क्या आधा मंत्र से छोटी सी नदी पार नहीं होगी और मैंने पूरी एकाग्रता से इसका जाप करते हुए नदी सही सलामत पार कर ली। बस फिर क्या था मैंने रोज के 20 पैसे इसी तरह बचाए और आपके लिए अपने घर आज की रसोई तैयार की।
शास्त्री जी का क्रोध व झुंझलाहट अब तक समाप्त हो चुकी थी। किंकर्तव्यविमूढ़ उसकी बात सुन कर उनकी आँखों ��ें आंसू आ गए और बोले माँ मैंने अनगिनत बार इस मंत्र का जाप किया, पाठ किया और इसकी महिमा बतलाई पर तेरे विश्वास के आगे सब बेसबब रहा।
इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से तूने किया उसके आगे मैं नतमस्तक हूँ। तू धन्य है कह कर उन्होंने उस महिला के चरण स्पर्श किए। उस महिला को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो खड़ी की खड़ी रह गई। शास्त्री भाव विभोर से आगे बढ़ गए वो पीछे मुड़ कर बोले माँ चलो भोजन नहीं कराओगी बहुत भूख लगी है।
जगत-जननी पार्वतीजी ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो वे दौड़ी-दौड़ी शंकरजी के पास गयीं और कहने लगीं, "भगवन् ! मुझे ऐसा लगता है कि आपका कठोर हृदय अपने अनन्य भक्तों की दुर्दशा देखकर भी नहीं पिघलता। कम-से-कम उनके लिए भोजन की उचित व्यवस्था तो कर ही देनी चाहिए। देखते नहीं वह बेचारा भर्तृहरि अपनी कई दिन की भूख मृतक को पिण्ड के दिये गये आटे की रोटियाँ बनाकर शान्त कर रहा है।"
महादेव ने हँसते हुए कहा, "शुभे ! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदैव खुला रहता है। पर वह आना ��ी कहाँ चाहते हैं यदि कोई वस्तु दी भी जाये तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं फिर ऐसी स्थिति में तुम्हीं बताओ मैं क्या करूँ ?"
माँ भवानी आश्चर्य से बोलीं, "तो क्या आपके भक्तों को उदर पूर्ति के लिए भोजन की आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती ?" श्रीशिवजी ने कहा, "परीक्षा लेने की तो तुम्हारी पुरानी आदत है यदि विश्वास न हो तो तुम स्वयं ही जाकर क्यों न पूछ लो। परन्तु परीक्षा में सावधानी रखने क�� आवश्यकता है।"
भगवान शंकर के आदेश की देर थी कि माँ पार्वती भिखारिन का छद्मवेश बनाकर भर्तृहरि के पास पहुँचीं और बोली, "बेटा ! मैं पिछले कई दिन से भूखी हूँ। क्या मुझे भी कुछ खाने को देगा ?" अवश्य भर्तृहरि ने केवल चार रोटियाँ सेंकी थीं उनमें से दो बुढ़िया माता के हाथ पर रख दीं। शेष दो रोटियों को खाने के लिए आसन लगाकर उपक्रम करने लगे।
भिखारिन ने दीन भाव से निवेदन किया, "बेटा ! इन दो रोटियों से ��ैसे काम चलेगा ? मैं अपने परिवार में अकेली नहीं हूँ एक बुड्ढा पति भी है उसे भी कई दिन से खाने को नहीं मिला है।"
भर्तृहरि ने वे दोनों रोटियाँ भी भिखारिन के हाथ पर रख दीं। उन्हें बड़ा सन्तोष था कि इस भोजन से मुझसे से भी अधिक भूखे प्राणियों का निर्वाह हो सकेगा। उन्होंने कमण्डल उठाकर पानी पिया। सन्तोष की साँस ली और वहाँ से उठकर जाने लगे। तभी आवाज सुनाई दी, "वत्स ! तुम कहाँ जा रहे हो ?" भर्तृहरि ने पीछे मुड़ कर देखा। माता पार्वती दर्शन देने के लिए पधारी हैं।
माता बोलीं, "मैं तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।"
प्रणाम करते हुए भर्तृहरि ने कहा, "अभी तो अपनी और अपने पति की क्षुधा शान्त करने हेतु मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो स्वयं दूसरों के सम्मुख हाथ फैलाकर अपना पेट भरता है वह क्या दे सकेगा। ऐसे भिखारी से मैं क्या माँगू।"
पार्वती जी ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा, "मैं सर्वशक्तिमती हूँ। तुम्हारी परदुःख कातरता से बहुत प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो।"
भर्तृहरि ने श्रद्धा पूर्वक जगदम्बा के चरणों में सिर झुकाया और कहा, "यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें क�� जो कुछ मुझे मिले उसे दीन-दुःखियों के लिए लगाता रहूँ और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शान्त पूर्वक रह सकूँ।"
पार्वती जी 'एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव के पास लौट गई। त्रिकालदर्शी शम्भु यह सब देख रहे थे उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, "भद्रे ! मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते कि उन्हें कुछ मिलता नहीं है। परन्तु भक्ति के साथ जुड़ी उदारता उनसे अधिकाधिक दान कराती रहती हैं और वे खाली हा�� रहकर भी विपुल सम्पत्तिवानों से अधिक सन्तुष्ट बने रहते है।
*संस्कृत भाषा का अद्भुत चमत्कार* ,
क्या आप जानते है विश्व की सबसे ज्यादा सम्रद्ध भाषा कौनसी है.....
अंग्रेजी में ' *THE QUICK* *BROWN FOX JUMPS* *OVER A LAZY DOG* ' एक प्रसिद्ध वाक्य है। जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए, मज़ेदार ��ात यह है की अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उप्लब्ध हैं जबकि इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया जिसमे चार बार O और A, E, U तथा R अक्षर का प्रयोग क्रमशः 2 बार किया गया है। इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है।
अब ज़रा संस्कृत के इस श्लोक को पढिये।-
*क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।*
*तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।*
*अर्थात* : पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे क�� बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।
श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के *सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाये दे रहे हैं वो भी क्रमानुसार*। यह खूबसूरती केवल और केवल संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा में ही देखने को मिल सकती है!
पूरे विश्व में केवल एक संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें केवल एक अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है, किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में *केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है* और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है-
*न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।*
*नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥*
*अर्थात* : जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम्!
एक और उदहारण है।-
*दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः*
*दुद्दादं दददे दुद्दे ददाद��दोऽददः*
*अर्थात* : दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दान�� तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खण्डन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।
है ना खूबसूरत? इतना ही नहीं, क्या किसी भाषा में *केवल 2 अक्षर* से पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में ये करना असम्भव है। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये –
*भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे*
*भेरीर��� भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।*
*अर्थात-* निर्भय हाथी जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।
एक और उदाहरण-
*क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।*
*कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥*
*अर्थात* - क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत, रमणीय ह��थ वाला, हाथियों को फेंकने वाला, रण ��ें कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी [था]।
पुनः क्या किसी भाषा मे केवल *तीन अक्षर* से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? यह भी संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में असंभव है!
उदहारण-
*देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां*
*दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।।*
*धन्य है संस्कृत ,, गर्व करें अपनी देवभाषा पर* ,,,
।
#औ_का
❤️ इंसानियत आज भी ज��िंदा है ❤️
टीटीई जितेंद्र मिश्रा ट्रेन में टिकट चेक कर रहे थे।
एक युवक बिना टिकट मिला। आँखों में आँसू थे। पूछने पर बोला
साहब, होटल वाले ने मारपीट करके नौकरी से निकाल दिया। गाँव जाना है, लेकिन टिकट के पैसे नहीं हैं। माफ कर दीजिए।
नियम तो कहता है कि जुर्माना लगाया जाए।
लेकिन मिश्रा जी ने इंसानियत दिखाई।
उन्होंने पहले उसे खाना खिलाया, फिर अपनी जेब से टिकट बनवाया और जाते-जाते ₹200 भी दे दिए।
���र्दी तो बहुत लोग पहनते हैं, लेकिन वर्दी में इंसानियत निभाने वाले बहुत कम होते हैं। 🙏
सलाम है टीटीई जितेंद्र मिश्रा जी को। ❤️
क्या आज के समय में ऐसे लोग ही असली हीरो नहीं हैं? ❤️
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इस तरह की खबरें कभी मेनस्ट्रीम मीडिया का हिस्सा नहीं बन पाती
वाल्मीकि समाज की बेटी की बारात ठाकुर नारायण सिंह जी की हवेली के सामने से निकल रही थी, फिर क्या था ? ठाकुर साहब ने दूल्हे समेत पूरी बारात को अपनी हवेली पर चाय नाश्ता कराया और दूल्हे को अपनी घोड़ी दी।
राजनीतिक लाभ के लिए कुछ लोग सनातनियों को आपस में लड़ाना चाहते है।
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#औ_का
भोजन ही औषधि है।
अखरोट - मस्तिष्क के लिए
गाजर - आंखों के लिए
टमाटर - हृदय के लिए
अंगूर - फेफड़ों के लिए
अदरक - पेट के लिए
खट्टे फल - रोग प्रतिरोधक क्षमता
राजमा - गुर्दे
शकरकंद - अग्न्याशय
मशरूम - कान
एवोकाडो - गर्भाशय
अजवाइन - हड्डियाँ
अनार - रक्त
चुकंदर - खून और रक्त प्रवाह
पालक - मांसपेशियाँ
केला - ऊर्जा और नसें
लहसुन - हृदय और प्रतिरक्षा
ब्रोकली - कोशिकाओं की सुरक्षा
हल्दी - सूजन कम करने में सहायक
प्रकृति ने भोजन को केवल पेट भरने के लिए नहीं बनाया, बल्कि शरीर को संतुलित, मजबूत और स्वस्थ रखने के लिए भी बनाया है। हर प्राकृतिक आहार अपने भीतर कोई न कोई पोषण, ऊर्जा और उपचार छुपाए होता है।
जब हम सही भोजन चुनते हैं, तो वही भोजन धीरे-धीरे दवा की तरह काम करने लगता है।
स्वस��थ रहे..!! मस्त रहे..!!