लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है
~ राहत इंदौरी
(ज़द: चपेट, साहिबे मनसद: सिंहासन पर बैठने वाला)
शोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूद
हम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूद
वज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूद
ये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूद
यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो
तुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी हो..!!
#AllamaIqbalDay
मोदी सरकार में सब भ्रष्ट हैं ? एक 'इथेनॉल' से लूट रहा है, दूसरा 'जमीन हड़प' रहा है तीसरा 'पेपर लीक' से पैसे बना रहा है, चौथा 'निकोबार द्वीप' लूट रहा है
: ध्रुव राठी, ब्लॉगर
राजस्थान के अजमेर में बुर्के और दुपट्टे में NEET की परीक्षा देने पहुंची मुस्लिम छात्रा कुलसुम फ़ातिमा (18) को सेंटर के बाहर रोक दिया गया, बुर्का पहनने के कारण सुरक्षाकर्मियों द्वारा रोकी गई छात्रा खुशामद करती रही लेकिन न उसकी परीक्षा का ख्याल किया गया और न ही NTA की गाइडलाइन को माना गया।
कुलसुम फ़ातिमा और उसके पिता सेंटर के बाहर रोकने वाले सुरक्षाकर्मियों को बुर्के की वजह से पाबंदी न लगाने वाली NTA की गाइडलाइन दिखाते रहे लेकिन सब नियमों की धज्जियां तो उड़ी ही साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता का भी हनन किया गया। कुलसुम के मुताबिक़ उसने 3 मई को भी बुर्के और दुपट्टे में ही NEET का एग्जाम दिया गया था उसे किसी ने नहीं रोका था, अब कुलसुम ने कहा "अगर मुझे दुप्पटे और बुर्के में प्रवेश नहीं दिया गया तो मैं एग्जाम नहीं दूंगी।"
छात्रा राजस्थान के ब्यावर जिले की रहने वाली हैं जो कि अजमेर शहर के सावित्री इलाके में स्थित राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय सेंटर पर बुर्के में परीक्षा देने के लिए पहुंची थी लेकिन बुर्के की वजह से परीक्षा केंद्र में प्रवेश करने से रोक दी गई।
बिहार के सिवान जिले के बरहरिया थाना क्षेत्र के शिवराजपुर गांव में 30 मई 2026 को 25 वर्षीय मुस्लिम युवक शहज़ाद अली की मॉब लिंचिंग में मौत हो गई थी। अब सिवान के पूर्व सांसद मरहूम मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब ने शहज़ाद अली के परिवार से मुलाक़ात की हैं। इस दौरान उन्होंने परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की और न्याय की उम्मीद बनाए रखने की बात कही। शहज़ाद अली की मौत का मामला इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है और पीड़ित परिवार न्याय की मांग कर रहा है।
ये दिल्ली के फरिश्ते हैं! इन्होंने 50 के क़रीब ज़िंदगियों को बचाया है। इनकी तस्वीरें दो रोज़ से वायरल हो रही हैं। इनकी सराहना की जा रही है। विडंबना यह है कि इंसानियत के लिए अदा किए गए इनके फर्ज़ की सराहना भी वही लोग कर रहे हैं, जो इस देश में नफ़रती एजेंडे और नफ़रत की सियासत के धुर विरोधी रहे हैं।
क्या इस देश के प्रधानमंत्री को इन सभी लोगों को अपने शासकीय आवास पर बुलाकर इनकी हौसला अफ़ज़ाई नहीं करनी चाहिए? क्या दिल्ली की मुख्यमंत्री और लेफ्टिनेंट गवर्नर को इन सभी फरिश्तों को बुलाकर इनकी हौसला अफ़ज़ाई नहीं करनी चाहिए? क्या राष्ट्रपति साहिबा को इन्हें राष्ट्रपति भवन बुलाकर सम्मानित नहीं करना चाहिए? इससे देश में एक संदेश जाएगा कि इंसानियत को बचाने वाले हर जगह सराहे जाते हैं, नफ़रत फैलाने वाले नहीं।
उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के एक गांव में बुधवार देर रात एक 30 वर्षीय राहुल ने मां के पास सो रही 7 साल की मासूम बच्ची का मुंह दबाकर अपहरण कर लिया और घर से 500 मीटर दूर श्मशान घाट ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया. वारदात के बाद आरोपी बच्ची को लहूलुहान और बेसुध हालत में वहीं छोड़कर फरार हो गया था. गुरुवार सुबह करीब 4 बजे जब मां की नींद खुली, तो बेटी को गायब पाकर खोजबीन शुरू हुई और करीब एक घंटे बाद परिजन गांव के श्मशान पहुंचे, जहां बच्ची ने होश में आने पर गांव के ही आरोपी राहुल की करतूत के बारे में बताया. परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर पीड़िता को तुरंत मेडिकल परीक्षण के लिए भेजा और त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी राहुल को गिरफ्तार कर आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है.
सूर्या असद की बहन को छेड़ता था
कई बार असद ने समझाया, घर बदल लिया मगर सूर्या ने ये हरकत नहीं छोड़ी, फिर असद में सूर्या की हत्या कर दी - ऐसा कथित तौर पर सूर्या के पड़ोसी एक हिंदू युवक एक पत्रकार से कह रहा है।
ये महिला पहले तो रिजर्वेशन वाले डिब्बे में घुसी फिर मुस्लिम बुजुर्ग व्यक्ति ने उठने को कहा तो उसे गालीगलौज कर रही है।
सोशलमीडिया पर वायरल ये क्लिप अगर नफरती मीडिया के हाथ लग जाती तो इस बुजुर्ग के खिलाफ ही नैरेटिव के साथ चला देते।।
ये हीरो हैं…हीरो! हीरो समझते हैं किसे कहते हैं? जो अपनी जान पर खेलकर दूसरों की जान बचा ले जाए.., वही होरी कहलाता है, वही बहादुर कहलाता है। वो नहीं जो आए दिन ‘दूसरों’ की जान लेने का आह्वान करते हों, वो नहीं जो नफ़रती भाषण से ‘दूसरों’ के खिलाफ हिंसा का आह्वान करते हों। वो हीरो नहीं बल्कि विलेन हैं। असली हीरो यही हैं। सलाम इनको।
एक तरफ चेतन सिंह हैं, जो आज एक गंभीर मामले के बाद सलाखों के पीछे हैं, और दूसरी तरफ RPF कर्मचारी संतोष पंडित राव हैं, जो यात्रियों की मदद कर लोगों की दुआएं बटोर रहे हैं। हाल ही में वह एक मुस्लिम बुजुर्ग को बैठने के लिये जगह उपलब्ध कराई थी अब मुस्लिम महिला को ट्रेन में सीट उपलब्ध कराते हुए दिखाई दिए। उनके लिए इंसानियत और कर्तव्य सबसे पहले है।
यही फर्क होता है नफरत और मोहब्बत में। एक रास्ता इंसान को सम्मान, दुआएं और लोगों के दिलों तक पहुंचाता है, जबकि दूसरा रास्ता उसे सलाखों के पीछे ले जाता है।
"20 लठ्ठ अज़ीज़ ख़ान नाम के औऱ 20 दाढ़ी के नाम के.."
इन बुज़ुर्ग को सुनकर दिल रो गया। गांधी के भारत में मुसलमानों की ये हालत कर दी है इस संघी सरकार ने..