सरस्वती की तरह एक रोज़
नाम रह जाएगा बस
सूख जाएगा भीतर का पानी
जो कुछ बचेगा
मुट्ठी भर राख होगी केवल
गंगा में मत बहाना उसे
सुस्ताने देना अपनी जगह
इंतज़ार करना किसी कोसी का
जो रास्ता बदलकर पहनने आए मुझे
बहुत लोगों को जिया है मैंने
चाहता हूँ, कोई जिए मुझे।
- अंजुम शर्मा 🌷