इंडियन एक्सप्रेस वालों की साहब के साथ कोई पिछले जन्म की दुश्मनी लगती है.
ज्ञानेश के बाद BDL यानि भारत डायनामिक्स लिमिटेड पर पोल खोलकर रख दी है.
तस्वीर में दिख रहा आदमी सिद्धार्थ मिश्रा है जो BDL का पूर्वचेयरमैन है, इसकी पत्नी संभुई मिश्रा एक कंपनी चलाती है Aindri डिफेन्स एडवाइजरी
BDL जो वायु सेना के लिए एंटी टैंक मिसाइल बनाने का काम करती है, उसकी 300 साइट्स का ठेका मिश्रा जी की पत्नी की कंपनी को मिला है.
वो भी 57 करोड़ का, और मज़ेदार बात ये है कि
इस कंपनी की सालाना टर्नओवर 44 लाख रही है पिछले साल.
और तो और कंपनी का कोई उत्पादन प्लांट ही नहीं है और ताला लगा हुआ है ऑफिस पर.
तो सवाल ये है कि देश की सुरक्षा के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ कर कौन रहा है??
वो कौन है जो बिना कॉम्पीटिशन के इतना बड़ा अमाउंट एक कंपनी को दे रहा 🤔
आर्काइव | मोदी के शासनकाल में न्यायपालिका का पूरी तरह रूपांतरण हुआ है. अपने पहले कार्यकाल में कार्यपालिका ने आहिस्ता-आहिस्ता अदालतों का घेराव किया और मोदी के दुबारा चुने जाने के बाद इस पर धावा बोल दिया गया. सुप्रीम कोर्ट, जिसका मकसद जनता के अधिकारों की रक्षा करना था, उसकी ख्याति अब सरकार की इच्छाओं का चैंपियन बनना है. सहारा-बिड़ला डायरी में कथित तौर पर कॉरपोरेट घरानों द्वारा मोदी तथा अन्य राजनीतिज्ञों को दी जाने वाली धनराशि का ब्यौरा था लेकिन जब अदालत से कहा गया कि इसकी जांच का आदेश जारी करे तो उसने साफ तौर पर कह दिया कि इसकी कोई जरूरत नहीं है. अमित शाह के खिलाफ हत्या के एक मामले की जांच करने वाले न्यायाधीश बी एच लोया की अचानक हुई मृत्यु के बाद अदालत ने सरकार की इस बात से ही खुद को संतुष्ट कर लिया कि कहीं कुछ भी गलत नहीं हुआ है. ऐसा ही मुद्दा एलेक्टोलर बांड्स का था जिसके जरिए बीजेपी को गुप्त दान के रूप में अपार धनराशि की प्राप्ति हुई लेकिन इस मामले में भी अदालत ने इसके संवैधानिक होने की जांच की अपनी न्यायिक जिम्मेदारी को भी ताक पर रख दिया . 2019 में मोदी के दोबारा चुने जाने के बाद से सरकार ने ज्यादातर मामलों में - खासतौर पर कश्मीर के मामले में ऐसा काम किया है जैसे वह किसी भी संवैधानिक बाध्यता के प्रति उत्तरदायी नहीं है.
अदालतों में और खासतौर पर सुप्रीम कोर्ट में नरेन्द्र मोदी का चेहरा तुषार मेहता हैं. 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही समय बाद अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल के पद पर मेहता की नियुक्ति हुई और सरकार का पक्ष रखने के लिए वह कतार तोड़कर सबसे आगे आ गए. 2017 में जब उनके पूर्ववर्ती सॉलिसीटर जनरल ने इस्तीफा दे दिया तो सरकार ने एक वर्ष तक इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं की जबकि दो अन्य असिस्टेंट सॉलिसीटर जनरल के अंदर हताशा का भाव पैदा हो रहा था क्योंकि उन्होंने मेहता के मुकाबले ज्यादा समय तक सेवाएं दी थीं. अक्टूबर 2018 में इन दोनों व्यक्तियों पी॰ एस॰ नरसिम्हा और मनिंदर सिंह ने एक के बाद एक इस्तीफा दे दिया. सिंह ने उसी दिन इस्तीफा दिया जिस दिन मेहता को सॉलिसीटर जनरल बनाया गया.
मेहता का उदय एक बड़ी योजना का हिस्सा हैः राष्ट्रीय दृश्य पटल पर आने के बाद मोदी सरकार का अपनी सत्ता को सुदृढ़ करना और इस सत्ता का विस्तार अदालतों तक ले जाना. मोदी के सबसे बड़े सहयोगी और मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह के विश्वास पात्र के रूप में मेहता उस समय से ही हैं जब से गुजरात में इस सदी की शुरूआत में दोनों की मुलाकात हुई. भारत की राजनीति में अब तक के सर्वाधिक विवादास्पद राजनीतिक जीवन के धनी अमित शाह की जिंदगी के हर उतार चढ़ाव में मेहता उनके साथ खड़े रहे हैं और मेहता की खुद की किस्मत इन राजनीतिज्ञों की किस्मत के साथ आगे बढ़ती रही है.
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चार साल हो गए। इंसाफ देना ही नहीं था। राज्य में लगातार विरोध प्रदर्शन होता रहता है। अगर जी- प्रिंटर से नतीजों के प्रिंट निकाल लाने का गुमान नहीं होता तो कोई भी राजनीतिक दल राज्यपाल का पद नहीं देता। पहले इंसाफ करता। इसका क्या बचाव हो सकता है कि चार साल से राज्य की जनता अंकिता के इंसाफ को लेकर संघर्ष कर रही है। उत्तराखंड की जनता के उस हिस्से की दाद देनी होगी जो आए दिन इसे लेकर सड़क पर उतरती है। बड़ी बात है।
काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर से सोना गायब होने के आरोप ने हलचल मचा दी है। अधिवक्ता नित्यानंद राय ने शिकायत कर दावा किया कि मंदिर के शिखर से सोने के कई कलश गायब हैं और हर दूसरे दिन सोना नोचने की घटना हो रही है। शिकायत के बाद PMO ने संज्ञान लिया है और मामले में इंटरनल जांच शुरू हुई। शिकायतकर्ता ने मंदिर की वेबसाइट पर इससे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग भी की है। वहीं, IIT मद्रास की सर्वे रिपोर्ट आने के बाद मरम्मत किए जाने की बात कही गई है।
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जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में लाठी लेकर पहुंचे लड़के प्रदर्शनकारियों को धमकाते दिखे। पुलिस ने कार में कुछ भी आपत्तिजनक न मिलने का दावा किया, लेकिन भास्कर के वीडियो में एक युवक कार से लाठी निकालता दिख रहा है। देखें एक्सक्लूसिव वीडियो।
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अंकिता भंडारी हत्याकांड में अंकिता के माता-पिता द्वारा स्पष्ट रूप से नाम लिए गए वीआईपी को राज्यपाल बनाया जाना उत्तराखंड के आम जनमानस की भावनाओं को गहरी चोट पहुँचाने के समान है। वहीं, सीबीआई की जाँच एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी है और सीबीआई ने नामजद आरोपी के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की है। ऐसे व्यक्ति को राज्यपाल के पद पर नियुक्त करना घोर आपत्तिजनक है।
अतः मैं कल दोपहर 12 बजे गांधी पार्क, देहरादून स्थित गांधी प्रतिमा के सम्मुख प्रतिकारात्मक विरोध स्वरूप एक घंटे के मौन उपवास पर बैठूँगा।
जिसने गांधी का दांडी मार्च नहीं देखा, वो स्टेट्समैन बिल्डिंग से राहुल गांधी के मार्च का नज़ारा देख ले! करीब 5 लाख लोगों ने देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए राहुल के कदम से कदम निभाया इतिहास के पन्ने पलटते नहीं, कभी-कभी आँखों के सामने दोहराए जाते हैं!
यह पिछले 12 वर्षों के दौरान कांग्रेस पार्टी के द्वारा किया गया सबसे बड़ा प्रदर्शन था।भीड़ का दबाव इतना तेज था कि मैं तीन बार भीड़ की चपेट में आकर जैसे तैसे निकलने में सफल रहा, मेरा कैमरामैन जरूर चोटिल हुआ।
दरअसल जो ज्ञानेश कुमार के खिलाफ गुस्सा है वो अब उन्माद में बदल चुका है। ठीक यहीं से क्रांति का जन्म होता है। मुझे सैकड़ों लोग ऐसे मिले जो कांग्रेस या किसी राजनीतिक विचारधारा की वजह से नहीं सरोकारों की वजह से आंदोलन में शामिल होने आए थे। एक लड़की ऐसी मिली जिसने कहा हम आंदोलन के देश में पैदा हुए हैं हम आंदोलन की बेटी हैं।
तीन अलग अलग राज्यों से आई तीन सहेलियां आपस में बात कर रही थी कि यह आंदोलन देखकर आंखों में आंसू आ रहे हैं जैसे न जाने कबसे इसका इंतजार था।
एक सरदार जी मिले बिना पूछे खुद बोले मैने सोचा नहीं था यह मार्च इतना सफल होगा। आज यकीन हुआ राहुल जब तक हैं कोई उनके आगे पीछे नहीं टिक सकता। सिर्फ एक आवाज उन्होंने दी और इतनी भीड़ इकट्ठा हो गई। अगर एक पत्रकार की निगाह से देखा जाए तो तकरीबन 35 हजार के आसपास की भीड़ थी।
आर्काइव | सूर्यकांत पर गंभीर अनियमित्ता के आरोप हैं. 2012 में एक रियल एस्टेट एजेंट ने सूर्यकांत पर कम कीमत दिखा कर करोड़ों रुपए की संपत्ति का अवैध कारोबार करने का आरोप लगाया था. 2017 में पंजाब में एक कैदी ने याचिका दायर कर सूर्यकांत पर 8 मामलों में रिश्वत लेकर जमानत देने का आरोप लगाया. इस याचिका पर छह सालों तक कॉलेजियम ने सुनवाई नहीं की और वे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने रहे. अक्टूबर 2018 में उन्हें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया और अब उनके खिलाफ शिकायतों का निवारण किए बिना कॉलेजियम ने उन्हें मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया. एक पूर्व जज के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में सूर्यकांत को पदोन्नत करने के लिए भी कॉलेजियम यही करने वाला है.
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अरे भाई ये SIR मज़ाक हो गया है। इसको बंद करो। अब तो हँसी भी नहीं आती। पौने तीन लाख लोगों की पैदाइश 1900 की है? लगता है यही लोग 1947 का विकसित भारत देखने के लिए बचे रहेंगे। अब ये सब पीछे से फ़िक्स किया जा रहा है। इसलिए कि पब्लिक को हिंदी में समझ आ गया है।
यूपी में SIR के दौरान ECI सॉफ्टवेयर ने बिना कारण बताए 85,854 मतदाताओं के नाम काटने के फॉर्म खुद तैयार कर दिए : रिपोर्ट
- द रिपोर्टर कॉलेक्टिव की एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में SIR के दौरान चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ERONET ने बिना कारण बताए 85,854 मतदाताओं के नाम काटने के फॉर्म खुद तैयार कर दिए। 9 अक्टूबर की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ये Form 7 विधानसभा स्तर के अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर के साथ जनरेट हुए और आगे मंजूरी के लिए भेज दिए गए।
- कानून और Registration of Electors Rules, 1960 के तहत नाम हटाने का स्पष्ट कारण दर्ज करना जरूरी है- मृत्यु, नाबालिग, स्थायी रूप से स्थानांतरित, पहले से पंजीकृत या भारतीय नागरिक न होना। रिपोर्ट के मुताबिक 87,127 में से 85,854 फॉर्म (98.5%) में कोई कारण नहीं था। ये 15 मार्च से 2 अप्रैल 2026 के बीच दाखिल हुए। अधिकारियों का कहना है कि सुनवाई में सत्यापन न होने पर सिस्टम फॉर्म अपने आप बना देता था।
#UPNews #UttarPradesh #SIR #ECI #ElectionCommission #Form7 #VoterList #TheReporterCollective #tcnlive
बड़ी खबर-
क्या यूपी का चुनाव compromise हो चुका है?
Reporters’ collective का एक और बड़ा खुलासा।
यूपी में हुए SIR में चुनाव आयोग के सॉफ़्टवेयर ने 85854 फ़ॉर्म auto generate कर दिए।
ये बिना कोई वजह बताए वोटरों को डिलीट करने के लिए थे।
इन deletion form पर चुनाव आयोग के अधिकारियों के दस्तख़त थे।
इससे पहले करीब 16.18 लाख वोटरों को रहस्यमय तरीके से जोड़े जाने का मामला भी Reporters collective ने उजागर किया था।
क्या प्रचंड भ्रष्टाचार, आकंठ जातिवाद और भयावह एंटी इंकंबैंसी के बावजूद योगी आदित्यनाथ इसीलिए निश्चिंत हैं,
कि चुनाव आयोग साथ है?
कल रात SIR के जिस नए कारनामे की बात हुई थी वो रिपोर्ट आ चुकी है उसके मुताबिक
UP में ECI के सॉफ़्टवेयर ने बिना किसी कारण के वोटरों के नाम हटाने के लिए 85,854 फ़ॉर्म अपने-आप जेनरेट कर दिए।👇
गुजरात : महानगर पालिकाओं-नगर पालिकाओं में गड़बड़ी... अफसरों-ठेकेदारों ने 10 साल में ₹4400 करोड़ के घोटाले किए, ऑडिट रिपोर्ट के लिए समीक्षा समिति तक नहीं
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कैंसर दवाओं की खरीद कीमत और एमआरपी में बड़ा अंतर... सरकार को ₹333 में मिलने वाली दवा मरीजों को ₹12,500 में; सुप्रीम कोर्ट ने 2 बार सवाल उठाए
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बड़ा खुलासा, चुनाव आयोग की बड़ी चोरी
SIR के बाद उत्तर प्रदेश में 16.18 लाख रहस्यमयी तरीके से जोड़े गए है
जोड़े गए मतदाताओं की कोई पहचान सार्वजनिक नहीं है।
झबरेड़ा सीट पर 1657 आपत्तियां दर्ज कराने वाले 35 लोगों ने कहा, "हमारे फर्जी सिग्नेचर से फॉर्म भरे गए." इनमें 31 BJP के BLA हैं.
पूर्व CEC अशोक लवासा के मुताबिक ऐसे मामले में चुनाव आयोग को FIR दर्ज करानी चाहिए.
@Basantrajsonu & @AshwineSingh की रिपोर्ट.
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