भयावह। जागो जनता जागो। लुट गया लोकतंत्र का कारवां । मत करो ऐसा। मत होने दो ऐसा। इस देश को आज़ादी लाखों के संघर्ष और त्याग से मिली है। इसलिए नहीं कि वोट का अधिकार उनसे बीच राह में छीन लिया जाएगा। वोट का अधिकार आज़ादी का अधिकार है।
लोकतंत्र है, जनता तय करेगी किसे वोट देना है- कौन जीता, कौन हारा-जनादेश है… ये सब उपदेश जीतने के बाद सत्ता पक्ष देता है।
लोकतंत्र ये नहीं कि चुनाव वाले दिन मशीनों ने अच्छा काम किया। और चुनाव आयोग का काम इतना नहीं कि चुनाव के बाद आकर बताए कि कहाँ Highest % Voting हुई।
उससे पहले अगर आपने जनता को वोट देने का मौका ही निष्पक्ष और भरोसेमंद तरीके से नहीं दिया, तो काहे का लोकतंत्र?
चुनाव आयोग सरकार, विपक्ष या किसी पार्टी की संपत्ति नहीं है। ये 140 करोड़ लोगों की लोकतांत्रिक पूंजी है।
इसीलिए आयोग के भीतर से उठी हर गंभीर Procedural आपत्ति का स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए। नहीं तो अब बहुत हुआ, ज्ञानेश जी- आपकी इस्तीफे की मांग होनी चाहिए
आज से ठीक 1 साल पहले जब राहुल गांधी जी ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाया था और कहा था कि
मुझे एक बार चुनाव आयोग का डेटा अगर मिल जाता है तो मैं साबित कर दूंगा कि वोट चोरी हुई है और लोग चोरी से ही सरकार बनाए हैं।
आज राहुल गांधी जी सही साबित हुए और ताज्जुब होता है कि इतने दूरदर्शी नेता को लोग पप्पू कहते रहते हैं। ऐसे लोगों को एकबार फिर से अपना नजरिया बदलना चाहिए।
राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति बहुत ही बेहतर है वो अलग बात है कि सत्ता में नहीं आ पाए हैं लेकिन PM पद के दमदार दावेदार हैं।
अब इसमें कोई शक नहीं रह गया है कि ज्ञानेश कुमार लोकतंत्र के हत्यारे हैं. और मोदी की सत्ता बचाने के लिए चुनाव आयोग अपनी बपौती समझ कर चला रहे हैं
Indian Express ने आज एक ज़बरदस्त रिपोर्ट में खुलासा किया है कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार शिकायत की है. जिसमें साफ कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्त - सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी नहीं दी जाती. उनसे सलाह नहीं ली जाती. उनसे बिना पूछे या बताए हुए फैसले लिए जा रहे हैं
इन 14 शिकायतों में - SIR, वोटर लिस्ट से नाम हटाना और जोड़ना, वोट कटने के ख़िलाफ़ अपील जैसे मुद्दे शामिल हैं
साफ़ है खुलेआम 'वोट चोरी' का काम ज्ञानेश कुमार को वहाँ बिठा कर नरेन्द्र मोदी करा रहे हैं
लेकिन याद रखियेगा - राहुल गांधी ने कहा था वक्त आने पर सबका हिसाब होगा, जवाबदेही तय होगी. इस अपराध की सजा जरूर मिलेगी
ज्ञानेश कुमार को तत्काल इस्तीफ़ा देना चाहिए
शिक्षा मंत्री @mkrtiwari_bjp जी बिहार के सभी शिक्षकों के लिए ई-शिक्षाकोष पर अवकाश में Compensatory Leave (क्षतिपूर्ति अवकाश) का option देने का कृपा करें l
@BiharEducation_
✊ School Teacher Federation Of Bihar (STF Bihar) सहरसा के जिलाध्यक्ष डॉ. विकास कुमार के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने माननीय शिक्षा मंत्री, बिहार सरकार को सातवें वेतनमान के अनुरूप उचित Pay Level एवं वेतन निर्धारण की मांग को लेकर विस्तृत ज्ञापन सौंपा।
🔥 सातवां वेतनमान • न्यायसंगत Pay Level • शिक्षकों का सम्मान
🇮🇳 STF Bihar — शिक्षकों के अधिकार की आवाज़
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ये औरंगाबाद के शिक्षक संघ ऑल बिहार टीचर एसोसिएशन द्वारा 7 वें वेतनमान लेवल 6 से 8 तक के लिए जिला इकाई ने अपने आवाज बुलंद करना शुरू किए है
ये आवाज हर जगह से उठेगी।।
#BiharTeachersNeed7thPay
आश्वासन नहीं, अधिकार: बिहार के शिक्षकों को कब मिलेगा पूर्ण 7वें वेतनमान का लाभ?
बिहार में राज्य शासन व्यवस्था का ढांचा एक विचित्र विरोधाभास से जूझ रहा है। एक तरफ राज्य सरकार के प्रशासनिक अमले में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (आदेशपाल) से लेकर शीर्ष पर बैठे सचिव तक को 7वें वेतन आयोग के अनुरूप पे-मैट्रिक्स, ग्रेड-पे और तय लेवल का पूर्ण वित्तीय लाभ मिल रहा है। दूसरी तरफ, राज्य के भविष्य की नींव रखने वाले लाखों शिक्षक आज भी अपने न्यायसंगत वेतनमान और वास्तविक वित्तीय अधिकारों के लिए सड़कों पर संघर्ष करने को मजबूर हैं।
केवल नाम का राज्यकर्मी का दर्जा?
हाल के वर्षों में सक्षमता परीक्षा और BPSC के माध्यम से शिक्षकों को "राज्यकर्मी" का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू की गई। परंतु सवाल यह उठता है कि यदि राज्यकर्मी बनने के बाद भी वित्तीय संरचना, बेसिक पे का निर्धारण और सेवा शर्तें अन्य सरकारी कर्मचारियों के समकक्ष नहीं हैं, तो इस दर्जे की प्रासंगिकता क्या है? केवल कागजों पर या नाम के लिए राज्यकर्मी घोषित कर देने से किसी शिक्षक का जीवन स्तर नहीं सुधरता। बिना पूर्ण वेतनमान और वित्तीय समानता के यह दर्जा महज एक प्रशासनिक छलावा प्रतीत होता है।
असंतुलन और विसंगति
7वें वेतन आयोग का मूल सिद्धांत ही कार्य के अनुरूप न्यायसंगत वेतन और सम्मान प्रदान करना है। जब सचिवालय के लिपिक या क्षेत्रीय कार्यालयों के कर्मचारियों को पे-लेवल और फिटमेंट फैक्टर का स्पष्ट लाभ मिलता है, तब शिक्षकों के लिए एक अलग और सीमित फिक्स/एंट्री पे स्ट्रक्चर लागू रखना समझ से परे है। प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर अध्यापन करा रहे शिक्षकों को उनके पद और योग्यता के अनुसार पूर्ण पे-मैट्रिक्स का लाभ न मिलना सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों की उपेक्षा है।
शिक्षकों की स्पष्ट माँगें:-
7वें वेतनमान का पूर्ण पे-मैट्रिक्स: अन्य राज्यकर्मियों की भांति शिक्षकों के लिए भी लेवल और ग्रेड-पे के अनुसार फिटमेंट टेबल लागू हो।
समान काम का समान वेतन: BPSC, सक्षमता उत्तीर्ण और पूर्व से कार्यरत शिक्षकों के बीच वेतन विसंगतियों को दूर कर एक पारदर्शी वित्तीय ढांचा बने।
पूर्ण वित्तीय और सेवा अधिकार: समयबद्ध प्रोन्नति (Promotion), ऐच्छिक स्थानांतरण, और अन्य भत्तों (HRA, TA) का पूर्ण लाभ मिले।
शिक्षा किसी भी राज्य के विकास का आधार स्तंभ है, और शिक्षक उस व्यवस्था की रीढ़। जब तक शिक्षकों को आर्थिक असुरक्षा और हीनता के भाव से बाहर नहीं निकाला जाएगा, तब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सपना अधूरा ही रहेगा। बिहार सरकार को अब आश्वासनों का दौर समाप्त कर शिक्षकों को 7वें वेतनमान का पूर्ण वित्तीय हक देना चाहिए, ताकि "राज्यकर्मी" का दर्जा केवल एक शब्द न रहकर एक सम्मानजनक वास्तविकता बन सके।
बिहार सरकार ने शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा तो दिया, लेकिन इसके अनुसार वेतन नहीं: चपरासी से लेकर सचिव तक को 7वें वेतनमान का लाभ मिल रहा, लेकिन शिक्षकों को नहीं; मंडे स्पेशल में जानें बिहार में शिक्षकों को क्यों नहीं मिल रहा 7वां वेतनमान
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