वरिष्ठ IAS अधिकारी और भगवान बुद्ध के अनुयायी राज कुमार थापा सर हमारे परिवार के एक सदस्य जैसे थे। मेरे लिए वह बड़े भाई से भी बढ़कर थे।
वह राजौरी में तैनात थे। आज पाकिस्तानी हमले में शहीद हो गए। वे अपनी अंतिम सांस तक राष्ट्रसेवा करते रहे। इसी हफ्ते सर से बात हुई थी। अपूरणीय क्षति।
I am blessed to be a son of Dr. Ambedkar. Born to my parents, I breathe freely today because of Babasaheb’s sacrifices.
Today, my birthday, I pledge to dedicate my life to uplifting the oppressed, unwavering despite any hurdles.
Everything is given by Babasaheb, Jai Bhim!
Sanitary workers dying everyday in septic tanks too have wives who love them crazily. But this love never makes it to the big screens and these lives are invisible to the eyes of the kind hearted savarnas. Aesthetics of caste and class matters to make movies on love right ?
दलितों से मानसिक गुलामी नहीं छूट रही। ऐसा नहीं की कोई इनको गुलाम बनाने का प्रयास कर रहा हो, बल्कि यह खुद ही उस व्यवस्था की गुलामी कर रहे हैं जिस व्यवस्था ने इनके पूर्वजों के साथ जानवर से भी बदतर सलूक किया।
अच्छे खासे पढ़े-लिखे आर्थिक रूप से मजबूत दलित समाज के लोग भी मानसिक रूप से दिवालिया होते जा रहे हैं। ना अपने इतिहास की समझ ना अपने महापुरुषों का ज्ञान और ना ही अपनी संस्कृति की पहचान।
बाबा साहब ने इन लोगों की आजादी और हक अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया लेकिन यह उस दमनकारी जातिवादी व्यवस्था और उसके रीति रिवाज को छोड़ने को तैयार नहीं.
बहुत शर्म और दुख की बात है!
देखिए, किसी भी पार्टी की विचारधारा को समझना हो तो उसके नेता से नहीं, बल्कि कार्यकर्ता से समझिए। नेता की मजबूरी होती है कि वह सिर्फ अच्छी बातें ही बताएगा, लेकिन एक साध���रण कार्यकर्ता या सदस्य ऐसी मजबूरियों से नहीं बंधा होता।
ये व्यक्ति बीजेपी के लिए जमीन तैयार करता है, बाबा साहेब की किताब "थॉट्स ऑन पाकिस्तान" का हवाला देता है, मोदी जी की तारीफ करता है, और हिंदुओं को कथित रूप से जागरूक करने की बात करता है। लेकिन जब बात आरक्षण की आती है, तो इसका नजरिया बेहद नकारात्मक होता है। सवाल है, ऐसी सोच इसमें आई कहाँ से? इसका स्रोत आरएसएस और बीजेपी की विचारधारा है। दरअसल, बीजेपी की मूल सोच आरक्षण को समाप्त करने की है क्योंकि यह पार्टी ब्राह्मणवादियों की पार्टी मानी जाती है। कांग्रेस भी आरक्षण के खिलाफ रही है, क्य��ंकि उसकी जड़ें भी ब्राह्मणवादी मानसिकता में हैं।
इन पार्टियों का तरीका यही है कि पहले समाज में आरक्षण के खिलाफ माहौल बनाया जाए ताकि एक समय पर संसद में उसे समाप्त करना आसान हो जाए। ये रणनीति वे हमेशा से अपनाते आए हैं और अभी भी अपना रहे हैं। इस व्यक्ति का कहना है कि आरक्षण आपको कमजोर बना रहा है।
बाबा साहेब ने अपनी किताब "गाँधी और कांग्रेस ने अछूतों के लिए ��्या किया?" में लिखा है कि "ब्राह्मणों ने अपनी शक्ति बुद्धि के बल पर नहीं पाई, क्योंकि बुद्धि पर किसी एक वर्ग का अधिकार नहीं होता। ब्राह्मणों ने कट्टर साम्प्रदायिकता के जरिए अपने लिए सर्वोच्च पदों को आरक्षित किया और शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखकर प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर दिया।" इस दृष्टि से तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य को अपंग हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
आज ये लोग उन नेताओं की आलोचना कर रहे हैं जिन्होंने आरक्षण के लिए संघर्ष किया, जबकि पहले इन्हें धार्मिक आरक्षण मिला था, तब तो आरक्षण ठीक था। अब जब दलितों, आदिवासियों, और पिछड़ों को आरक्षण मिल रहा है, तो अचानक से आरक्षण बुरा लगने लगा है।
अंबेडकरवादी आंदोलन में दो धड़े हैं: परंपरावादी और प्रगतिवादी। परंपरावादी लोग नई चीजों को अपनाने या कुछ नया करने से डरते हैं। वे बहुत सतर्क होते हैं और किसी भी बदलाव से बच��े हैं। दूसरी तरफ, प्रगतिवादी लोग नए विचारों को स्वीकार कर आगे बढ़ते हैं। दोनों में एक बुनियादी अंतर यह है कि परंपरावादी कोई नया निर्माण नहीं करते; वे केवल बाबा साहेब द्वारा बनाए गए ढांचे को बनाए रखने और उसका लाभ उठाने में लगे रहते हैं। वे स्थिर मानकों पर चलते हैं, इसलिए उनसे गलती भी नहीं होती क्योंकि वे कुछ नया करने की कोशिश ही नहीं करते। इसके विपरीत, प्रगतिवादी हमेशा कुछ नया सोचते हैं और पुर��ने मानकों को चुनौती देते हैं। वे नवाचार करते हैं, और जब कोई नया काम करता है, तो गलतियां भी होती हैं। यह दुखद है कि अंबेडकरवादी आंदोलन पर परंपरावादियों का कब्जा है, जबकि कोई भी आंदोलन प्रगतिवादी सोच के कारण ही जीवित रहता है और आँगे बढ़ता है।
Videos of police brutality against Adivasis protesting to protect the Hasdeo forest & their land are circulating on social media every day.
Why isn’t it the top story on every prime-time news?
Because the Brahmin-Bania nexus controls the media, & they’ll never highlight it.
अब 15-16% आबादी को 10% आरक्षण दिया जाएगा।
और अन्य 4-5% वंचितों को 10%।
इससे SC समाज में आपसी मनमुटाव बढ़ेगा।
रक्त नहीं बहेगा समझदार हैं मगर आँसू बहना तय है -कीचड़ होना तय है।
कीचड़ हो गया तो सबकुछ मिल गया!
अब इसी में बार-बार कमल खिलेगा।
कहीं पंक में खिलेगा, कहीं पंजे में खिलेगा।
जाति देखकर कैसे भेदभाव होता है देखिए 👇
एक तरफ गोपाल मिश्रा है जिसके शव को ना सिर्फ परिवार वालो को सौंपा बल्कि शव यात्रा निकालने की भी अनुमति दी गयी और दूसरी तरफ दलित मनीषा वाल्मिकी है जिसके शव को परिवार वालो को भी नही दिया गया और पुलिस प्रशासन द्वारा ही शव को जला दिया गया ।
बहराइच के दंगाइयों सुनो-
लाखों बौद्ध नागपुर में जमा हैं, दीक्षा ले रहे हैं-"हम ब्रह्मा विष्णु महेश को नहीं मानते।"
उनके भगवा को आपने चोरी किया है फिर भी वो झंडा नहीं उखाड़ते।
शोषित हैं मगर विचारों की लड़ाई विचारों से लड़ रहे हैं, बाबा साहब की सिखाई प्रतिज्ञा पढ़ रहे हैं।
और आप?
172 छात्राएं दहशत में अपना हॉस्टल छोड़कर घर जा चुकी हैं।
क्योंकि आधी रात को गुंडे आकर दरवाजे खटखटा रहे हैं।
उनके सरगना सरकार में हैं, शायद इसीलिए इतनी मनमानी दिखा रहे हैं।