लाल बहादूर शास्त्री यांनी १९६५ च्या दुष्काळ आणि अन्नटंचाईच्या काळात देशवासीयांना आठवड्यातून एक वेळ (सोमवारी संध्याकाळी) जेवण न करण्याचे आवाहन केले होते. पण देशाला हा सल्ला देण्यापूर्वी त्यांनी स्वतःच्या कुटुंबावर याचा प्रयोग करून पाहिला होता.
माझ्याबरोबरहीस अगदी असेच झाले…
बरंच शोधलं, ४ ठिकाणचे बूथ धुंडाळून शेवटी blo ला यादीत मीच माझे नाव शोधून दिले.(जाणीवपूर्वक नाव नाही हे सांगितले) अनेक लोक नाव नाही म्हणून मतदान न करताच निघून गेले.
बीएमसी निवडणूक:
जुहू येथील जमनाबाई नरसी शाळेत मतदार यादीतून नावे गायब.
तासन्तास रांगेत उभे राहिल्यानंतर मतदारांना बाहेर पडावे लागले.
बीएमसी निवडणूक आयोगाची संपूर्ण व्यवस्था उद्ध्वस्त झाली आहे.
लोकशाहीचे उघडपणे उल्लंघन केले जात आहे.
जबाबदारी कोण घेणार?
Our inspiration, Our idol, Our father, Our Leader. His vision cannot be matched, his knowledge will never be matched. Words are not enough for him.
On his Mahaparinirvan Day, we pay tribute to one of India’s tallest sons — Babasaheb Ambedkar. 🙏🏾
फ़िल्मों के नाम की अपनी नियति होती है जैसे इस फ़िल्म में दो किरदारों के नाम की अपनी नियति है। मुझे नहीं लगता कि ऑस्कर वाले इस फ़िल्म को समझ पाएँगे। भारत की तमाम सरकारें भी SSC, BPSC, UPPSC, MPPSC, WBPSC की भर्ती परीक्षाओं के चक्र में फंसे जवानों की सिपाही और सैनिक बन जाने की आकांक्षा को कहाँ समझ सकी हैं। युवाओं को भी नहीं पता होगा कि उनके दौर की एक फिल्म आई है। सभी भर्ती परीक्षा बोर्ड के सचिव से लेकर सहायक तक को यह फ़िल्म दिखाई जानी चाहिए। नेताओं को देखना चाहिए। जिस मसान में अरमानों की चिताएँ जलती हैं उसका नाम है भर्ती परीक्षा, इस फ़िल्म का नाम है Homebound बस यह फ़िल्म उन कमरों तक पहुँच जाए जिनसे निकल कर बनी है। वही उसके लिए ऑस्कर होगा। मैं सोच रहा था अगर नीतीश कुमार की सरकार पटना के कोचिंग सेंटर के अंधेरों में उम्मीद की खेती कर रहे युवाओँ को यह फिल्म दिखा दें तो राजनीति में क्या असर होगा? यह भी अभी तक राहुल गांधी और तेजस्वी इस फ़िल्म को देखने क्यों नहीं गए? क्या इसका नाम भर्ती परीक्षा ही होना चाहिए था. Homebound ऑस्कर वाइल्ड की कहानी पर बनी फ़िल्म नहीं है। करोड़ों चंदन और शोएब की कहानी पर बनी फ़िल्म है जिनके पास इस फ़िल्म को देखने का पैसा तक नहीं होगा। पैसा होगा लेकिन फॉर्म भरना होगा। यह फ़िल्म वास्तविकता के इतनी क़रीब है और घोर राजनीतिक है, शायद इसीलिए लोग इसकी बात नहीं कर रहे हैं। क्या ऐसा किया जा सकता है कि फॉर्म भरने से करोड़ों कमाने वाले भर्ती बोर्ड छात्रों के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था कर दें ताकि वे फ़िल्म देख सकें। मसान वाले नीरज घेवण ने शानदार फ़िल्म बनाई है। सचमुच ये अपने दौर की कहानी है।
धम्म चक्क पवत्तन को सही से समझिए। धम्म का अर्थ 'शील' होता है, और सम्राट अशोक के द्विभाषीय अभिलेख से धम्म का सही अर्थ स्पष्ट होता है। 'चक्क' का अर्थ चक्र या पहिया होता है, और 'पवत्तन' का अर्थ परिवर्तन नहीं होता, जैसा कि हिंदी में समझा जाता है। यह पाली का शब्द है, इसलिए इसका अर्थ भी पाली के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। 'पवत्तन' का सही अर्थ है 'रुके हुए को गति देना', अर्थात उसे फिर से गतिमान करना।
धम्म चक्क पवत्तन का अर्थ है 'शील के रुके हुए चक्र को फिर से गतिमान करना।' अब सवाल यह है कि बुद्ध ने क्या गतिमान किया? सिंधु सभ्यता में एक सील मिली है, जिस पर धम्म चक्र बना हुआ है, लेकिन उसकी तीलियाँ 6 थीं। तथागत ने इन 6 तीलियों में 2 और जोड़कर 8 तीलियाँ बना दीं और अष्टांगिक मार्ग देकर धम्म के चक्र को पवत्तन किया। बुद्ध ने कोई नया धर्म स्थापित नहीं किया, बल्कि श्रमण परंपरा में कुछ जोड़कर रुके हुए चक्र को गतिमान किया।
14 अक्टूबर 1956 को बाबा साहेब आंबेडकर ने कोई नया धर्म या बुद्ध के धम्म की नई शाखा (नवयान) स्थापित नहीं की। उन्होंने अष्टांगिक मार्ग की शिक्षाओं में 14 शिक्षाएँ जोड़कर 22 प्रतिज्ञाएँ दीं और धम्म के रुके हुए चक्र को फिर से गतिमान किया।
धम्म चक्क पवत्तन दिवस की आप सभी को मंगल कामनाएँ!
जय भीम नमो बुद्धाय।