Inspired by deceptive brahmins like @dr_chayanika & @sandeep_PT
जनहित में जारी - those who understand this diagram, definitely understand the real politics in India: the identity politics obscured by "left vs right" ideological drama.
Even Muslim Rajputs are traditionally regarded with contempt by other Muslim elites - particularly those with ancestry from Turkic, Persian and Turranic nobility.
The Hindutva's contempt for Hindu Rajputs is mirrored by the Islamist's contempt for Muslim Rajputs and Khalistanis contempt for Sikh Rajputs. Just as Hindutva brigade undermines the contributions of Hindu Rajputs, Islamists undermine the contribution of Muslim Rajputs & Khalistanis deny contributions of Sikh Rajputs. जितनी गुलामी करनी है, कर लो।
Kshatriyas, irrespective of faith, will continue to suffer if they seek validation from respective religious nationalists. Instead focus on pan-Kshatriya unity and institution building.
PS: Punjabi Islamist couplet terming a Muslim Rajput (Ranghar) a bigger enemy than an 'infidel'.
Baniyas appear to have been held in notably low regard within much of Indo-Muslim history.
Nawab Afrasiab Khan Bahadur, the Regent of Empire (Mukhtar), Chief of Nobles (Amir-ul Umara) and the Lord of Aligarh, was a convert to Islam from Hinduism (Baniya caste).
Despite being a remarkably brave and capable general (particularly his triumphant military operations against the Sikhs and the Rohillas), one imperial noble once made a quiet, mocking remark: "Ah! You wouldn't know, You are a Baniya," implying that Baniyas are fit for military actions.
ज़मीन क्षत्रिय समाज की थी, जिसे पंडित नेहरू सरकार ने लठैतों में बांटी।
आरक्षण मूल ओबीसी (माली, सैनी, सुथार, विश्वकर्मा,साइन, रेबारी) का था जिसे पंडित वाजपायी ने लठैतों को दिया।
आज के दौर में पुनः पंडितजी के लॉबी राजपूत व्यक्तित्वों के इतिहास को लठैतों में रेवड़ी की तरह बांटने पर लगी है। पंडित राजनीति लठैतों के तुष्टिकरण के लिए दूसरे समाजों को नुक्सान पहुंचाती आई है। @shailmayaram@tanuja_kothiyal@tishasaroyan
हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों के दोहरे मापदंड शायद कभी इतने साफ़ नज़र नहीं आए जितने आज आते हैं।
राजपूत इतिहास की बात आते ही कहानी का स्वर बदल जाता है। एक मानवीय त्रासदी पर शोक मनाने की जगह पूरी संस्कृति का मज़ाक बनाया जाने लगता है।
September 1948 : Jayanarayan Vyas: "We respect the Rajput community. The Thikanas (feudal estates) will not be abolished."
August 1949 : "Now that we have come to power, we will abolish the Thikanas."
मैने कभी किसी क्षत्रिय राजनीतिज्ञ को ब्राह्मणों के खिलाफ इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते नहीं देखा लेकिन कई ब्राह्मणों को क्षत्रियों को गलत बोलते देख लिया है । यह garhwa झारखंड का विधायक सत्येंद्र तिवारी है। इनलोगों की यह भाषा क्षत्रियों का युवा वर्ग जो अब समाज पर ध्यान देने लगा है वो इग्नोर नहीं करेगा। इसका इलाज होना चाहिए और यही सब चलता रहा तो पूर्वाचल और Baghel खंड की तरह झारखंड मे भी क्षत्रिय ब्राह्मण संघर्ष शुरू हो जाएगा ।
बद्री-केदार मंदिर समिति में ऐसे नियम बनाए गए हैं कि कोई भी क्षत्रिय जाति का व्यक्ति या वैश्य समाज या अनुसूचित जाति का व्यक्ति उसका अध्यक्ष नहीं बन सकता। सिर्फ एक जाति के व्यक्ति का इस पर कब्ज़ा कहाँ तक जायज़ है?
अगर एक क्षत्रिय समाज का व्यक्ति बद्री-केदार मंदिर समिति का अध्यक्ष बनता, तो इसमें हो रही इस तरह की अनियमितताएँ नहीं रहतीं। क्षत्रिय हमेशा शासक वर्ग रहा है; वह किसी के दान के साथ ऐसी चोरी-लूट की घटनाएँ नहीं होने देता।
Note : पंडित प्रमोद नौटियाल जो बद्री केदार समिति के अध्यक्ष पंडित हेमंत द्विवेदी का निजी सचिव है कथित तौर पर बद्रीनाथ के दान के पैसे में हेरा फेरी करते हुए देखा गया है .
@ChankyNai पुनः पढ़िए।
पाग दस्तूर से समस्या हो रही है, गाँवों वालों से व्यक्तिगत बात करो या इंस्टाग्राम पर डालो जहां trad audience होती है ।
X एक पॉलिटिकल प्लेटफॉर्म है - यहां अपके trad assertion से समाज को नुक्सान होता है और कुछ नहीं।
Every Sikh Home Should Have a Portrait of Raja Jai Singh I of Jaipur
In 1664, Raja Jai Singh I of Amber (Jaipur) gave shelter to Guru Har Krishan Ji in his Delhi palace. After the Guru’s passing, the Hindu Raja generously donated his entire palace for the Sikh community.
That very place is now the sacred Gurdwara Bangla Sahib — one of Sikhism’s most important shrines.
In delhi.
This noble act of courage and kindness saved and supported the Sikh faith at a critical time. Let us honour Raja Jai Singh’s memory by keeping his portrait in our homes as a symbol of Hindu-Sikh brotherhood and gratitude. 👏👏
@the_lama_singh@JaipurDialogues@tinderwale@erbmjha@puneet_sahani@HindutvaDon_@kingkapoor72
कई लोगों ने पूछा कि वीपी सिंह जी ने ऐसा क्या किया कि क्षत्रिय उन्हें याद करे?
तो भाई वीपी सिंह ने ही ये हिम्मत दी कि लोकतंत्र में कोई क्षत्रिय प्रधानमंत्री बन सकता है।
वरना उनके pm बनने से पहले 42 साल में कितने क्षत्रिय PM बने थे?
उसी लोकसभा के कार्यकाल में फिर चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने।
फिर उसके बाद 35 साल से कोई क्षत्रिय प्रधानमंत्री नही बन पाया है।
वीपी सिंह जी ने तो तुम्हें समाजवाद का अगुआ बनाया, टिकट बांटने वाला बनाया था।
लेकिन हमें तो समाजवाद नहीं कमण्डलवाद पसन्द था।
टिकट देना वाला नहीं, बल्कि टिकट लेने वाला बनना था, मालिक बनना पसन्द ही नहीं था। मालिक बनने का मौका तुमने खुद से गंवाया है, प्रतिक्रियावादी ताकतों के बहकावे में आकर।
:~ व्हाट्सएप पर परितोष भैया ने भेजा
वो सही है किन्तु उस पिता ने अपनी पुत्री को अधिकार दिया एवं गाँव के अन्य राजपूतों ने उसका स्वागत किया। और वह उस परिवार का निजी मामला है - इसे इतना बड़ा इशू बनाकर हम केवल राजपूत महिलाओं को अपमानित कर रहे - ऐसे में कोई भी पढ़ी लिखी राजपूत महिला क्यों समाज के पक्ष में बात करेंगी।
कभी सोचिये कि राजपूत पक्ष में लिखने वाली शिक्षित महिलाएं गिनती की क्यों है - और इसी चीज़ की तुलना आप अपने विरोधियो से भी कीजिये।
रक्त तलाई, जहाँ राजा रामशाह तंवर, झाला मान और हकीम ख़ाँ सूर की स्मृति में क्रमशः छतरियाँ एवं मक़बरा स्थित हैं।
हल्दीघाटी का युद्ध निर्णायक नहीं रहा, किंतु इसकी स्मृति अनेक वीरों के अद्वितीय बलिदानों से अमर हो गई।
क्षत्रिय समाज और क्षत्रिय युवाओं को अपने इतिहास को किसी 'राइट बनाम लेफ्ट' के द्वंद्व से दूर रखने का प्रयास करना चाहिए , विशेषकर जब हम सभी जानते हैं कि ना तो ये मराठा-सुप्रिमेसिस्ट राइट और ना पंजाबी-डोमिनेटेड लिबरल आपके शुभचिंतक हैं - दोनों केवल अपने स्वार्थ के लिए आपके इतिहास को appropriate करते हैं और उसका मानमर्दन भी करते हैं। जिस तरह इन नागपुरियों का उत्तर भारत में राजनैतिक एजेंडा है , उसी प्रकार पंजाबी एलीट्स का भी राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल और वेस्ट यूपी में इकोनोमिक interests हैं।
हल्दीघाटी का युद्ध भी ऐसा ही एक उदहारण है जहां ये पंजाबी-सेंट्रिक लिबरल और मराठा-सुप्रिमेसिस्ट राइट आपको सामाजिक क्षति पहुँचाने के लिए 'टग-ऑफ़-वॉर' खेलता है। क्या कभी आपने इस पंजाबी लिबरल वर्ग को तब विरोध करते देखा है जब बात पंजाबियों द्वारा ऐतिहासिक पंजाबी एंटी-मुग़ल रसिस्टेंस के गुणगान की होती है? क्या कभी इस पंजाबी वर्ग ने हिंदुत्व के केंद्र में बैठे मराठा सुप्रेमेसिस्ट नरेटिव को चैलेन्ज किया ? कभी नहीं। वो तो छोडिय, कई क्षत्रिय संगठनों ने महाराणा प्रताप की विरासत को हिंदुत्व की राजनीति से दूर करने का सुप्रयास किया - उसमें भी भी so-called लिबरल ने कोई सहयोग नहीं किया। इनका उद्देश्य सिर्फ हिंदुत्व-बेशिंग के नाम पर राजपूत-बेशिंग करना है और साथ में पंजाबी नॉन-क्षत्रिय हिस्ट्री को बढ़ाचढ़ाकर दिखाना है --- इन्होने तो पंजाब के राजपूत/क्षत्रिय इतिहास को भी लोकविमर्श से गायब कर दिया है जबकि यूनाइटेड पंजाब में भी राजपूतों का बड़ा इतिहास है। यदि भारत के हिन्दू राजपूत और पाकिस्तान के पंजाबी मुस्लिम राजपूत मिलबैठकर पंजाब का इतिहास लिखेंगे तब इन पंजाबी कोंग्रेसी हिन्दुओं द्वारा इतिहासवीकृतिकरण पकड़ा भी जाएगा । यह लुट्येन्स इतिहासकार मुख्यतः पंजाबी शहरी सवर्ण एलीट्स हैं , जिनमें से कई पार्टीशन के वक्त भारत आय किन्तु नेहरू-गांधी परिवार की सहयता से किंगमेकर की भूमिका में स्थापित रहे।
हल्दीघाटी की बात करें तो निःसंदेह मेवाड़ यह युद्ध नहीं जीता था। किन्तु क्या साम्राज्य्वादी यह युद्ध जीते थे ? नहीं , यदि राजा मानसिंहजी यह युद्ध जीते होते तो बादशाह अकबर उनको ना देखने से मना करते और ना उन्हें पुनः मेवाड़ भेजने से इंकार करते। और नाही बादशाह अकबर को हल्दीघाटी युद्ध के उपरान्त खुद भाग लेना होता। मेवाड़ के जो main territorial losses हुए वे 1576 से 1580 के दौरान हुए क्योंकि तब तक काफी सेनानायक शहीद हुए थे और सेनाबाल को क्षति पहुँच चुकी थी । 1582 का दिवेर के युद्ध में परिस्थिति पूरी तरह से बदल गई, और मेवाड़ 1616 तक एक sovereign रहा। 1582 से 1616 का अर्थ है 34 साल। यह है वो इतिहास जो हिंदुत्ववादी और पंजाबी लिबरल एलिट लोकविमर्श से गायब रखता है।
अपितु हल्दीघाटी के एक नायक राजा मानसिंहजी इसलिए भी थे, क्योंकि उन्होंने मेवाड़ के संघर्ष को जारी रखने में अपना कूटनीतिक सहयोग दिया। राजा मानसिंहजी ने अपने कार्यकाल में दो ही राजपूत राजाओं के विरुद्ध लड़ाई लड़ी और दोनों से उन्होंने सहयोग किया - एक थे महाराणा प्रताप और दूसरे थे राजा ईसाखान बैस। ज़्यादातर राजा मानसिंहजी का कार्यकाल अफगानो के विरुद्ध लड़ते हुए बीता।
अब वहीँ ये गैर-क्षत्री पंजाबी सवर्ण मुग़ल साम्राज्यों से अपने संघर्षों को याद करते , तब कोई कोंग्रेसी लिबरल कूदकर उनकी ऐतहासिक स्मृति और लोकितिहास का मानमर्दन नहीं करता , क्योंकि ये लिबरल नेहरुवियन इतिहासकार भी पंजाबी मूल के ही हैं - ये अपने इतिहास का मानमर्दन थोड़ी करेंगे । Don't Let others dictate your history and political thought.
Copper Inscription sanctioned by Maharana Karan Singh to Ghisaji Balai (SC) making his family the hereditary priests of Khakul Devji mandir (bhilwara) in 1624 CE
जय भीम, जय महाराणा, नमो बुद्धाय 🙏
@netajia44015 We had already distributed our lands in 1950-60s. Now its your turn to distribute your lands, wealth, jobs and daughters.
More SC ST with brahmin, kayasth wives will help them integrate into Hinduism better.
आधुनिकता की ब्राह्मण परिभाषा में क्षत्रिय समाज फिट नहीं बैठता है :- अतः आर्य समाज के ही समय से इनका एजेंडा क्षत्रियों को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक क्षति पहुँचाना रहा है।
इनका हिंदुत्व के नाम पर क्षत्रियों को मुसलमानो, और सवर्णत्व के नाम क्षत्रियों को sc st से भिड़ाने के पीछे भी यही षड्यंत्र है।।
इस साल मालवा क्षेत्र के सुजालपुर जनपद के स्थानीय बैंसो ने सम्राट हर्षवर्धन बैस की जयंती मनाने की शुरुआत की है। सुजालपुर जनपद में बैंस क्षत्रियों के लगभग साठ गाँव होना बताते है जो पिछले कई सदियों से मालवा में ही निवासरत है।
विजेता दहिया ज़मींदार जाट है, जिन्हें अटलबिहारी वाजपेयी के कारण अब ओबीसी में रखा गया है। यदि ये वाकई में सामाजिक न्याय का समर्थक होता तो अब तक रोहिनी कमीशन के पक्ष में बोल दिया होता।