हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे
~vks
वायु प्रदूषण की वजह से हमारी अगली पीढ़ी सबसे ज्यादा प्रभावित होगी। हम अब नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी। जागरूक बनिए और जागरूक करिए। डाउन टू अर्थ अपनी जिम्मेवारी को समझते हुए अगले दो दिन तक एक मुहिम चला रहा है। आप भी अपनी जिम्मेवारी निभाएं। संभव हो तो हमारी पोस्ट रिट्वीट करें
वायु प्रदूषण की वजह से हमारी अगली पीढ़ी सबसे ज्यादा प्रभावित होगी। हम अब नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी। जागरूक बनिए और जागरूक करिए। डाउन टू अर्थ अपनी जिम्मेवारी को समझते हुए अगले दो दिन तक एक मुहिम चला रहा है। आप भी अपनी जिम्मेवारी निभाएं। संभव हो तो हमारी पोस्ट रिट्वीट करें
मुझे विश्वास है
यह पृथ्वी रहेगी
यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड्डियों में
यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में
रहती हैं दीमकें
जैसे दाने में रह लेता है घुन
यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अन्दर
यदि और कहीं नहीं तो मेरी ज़बान
और मेरी नश्वरता में
यह रहेगी
#केदारनाथ_सिंह#WorldEnvironmentDay
हर दौर में ऐसे राष्ट्रीय धरोहर जन्म लेते रहेंगे जो कर्म पर फिदा हो जाना ही अपना ईमान समझेंगे। 1857 के क्रांति के प्रथम अग्रदूत अमर शहीद मंगल पांडेय जी को शहादत दिवस पर नमन🙏
मुझे गर्व है कि मैं उनका वंशज हूँ।
#मंगल_पांडेय#मंगल_पाण्डेय_बलिदान_दिवस
प्रासादों के कनकाभ शिखर
होते कबूतरों के ही घर
महलों में गरुड़ ना होता है
कंचन पर कभी न सोता है
रहता वह कहीं पहाड़ों में
शैलों की फटी दरारों में
- रामधारी सिंह दिनकर
हर भाषा का अपना एक ज्ञान होता है। जब एक भाषा खत्म होती है तो उसे बोलने वाले पूरे समूह का ज्ञान लुप्त हो जाता है। जो एक बहुत बड़ा नुकसान है क्योंकि भाषा ही एक माध्यम है जिससे लोग अपनी सामूहिक स्मृति और ज्ञान को जीवित रखते हैं।
- गणेश देवी (प्रसिद्ध भाषाविद)
#MotherLanguageDay
खौफ मंझधार से जो खाता है
वो किनारे पे डूब जाता है
मैने बैसाखियां जिसे दी थी
वो मुझे दौड़ना सिखाता है
सांप की केंचुली को लहराकर
तू सपेरों को क्या डराता है
दर्द बेवाओं का वो क्या जाने
जो हरी चूड़ियां बनाता है
पांव उसके भी नर्म होते हैं
जो तेरी पालकी उठाता है
- फहमी बदायूंनी
जब हम जवान होते हैं, हम समय के ख़िलाफ़ भागते हैं, लेकिन ज्यों-ज्यों बूढ़े होते जाते हैं, हम ठहर जाते हैं, समय भी ठहर जाता है, सिर्फ़ मृत्यु भागती है, हमारी तरफ़।
– निर्मल वर्मा
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ।
न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ।
जहाँ से चली मैं
जहाँ को गई मैं -
शहर, गाँव, बस्ती,
नदी, रेत, निर्जन,
हरे खेत, पोखर,
झुलाती चली मैं।
झुमाती चली मैं!
#बसंत_पंचमी
चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक!
~माखनलाल चतुर्वेदी
#गणतंत्रदिवस के सुअवसर पर हर स्वतंत्रता सेनानी को नमन🙏जय हिंद 🇮🇳
सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए
मैं अपने आप से गुज़रा हूँ तुझ तक आते हुए
फिर उस के बाद ज़माने ने मुझ को रौंद दिया
मैं गिर पड़ा था किसी और को उठाते हुए
कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई
कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए
- रहमान फ़ारिस
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जन पर्व मकर संक्रांति आज
उमड़ा नहान को जन समाज
गंगा तट पर सब छोड़ काज।
नारी नर कई कोस पैदल
आरहे चले लो, दल के दल,
गंगा दर्शन को पुण्योज्वल!
लड़के, बच्चे, बूढ़े, जवान,
रोगी, भोगी, छोटे, महान,
क्षेत्रपति, महाजन औ’ किसान।
~ सुमित्रानंदन पंत
#मकर_संक्रांति 💐