जो बात मुनासिब है वो हासिल नहीं करते
जो अपनी गिरह में है उसे खो भी रहे हैं
बेइल्म भी हम लोग हैं गफलत भी है तारी
अफ़सोस के अंधे भी हैं और सो भी रहे हैं
- अकबर इलाहाबादी
व्यंग्य मत बोलो।
काटता है जूता तो क्या हुआ
पैर में न सही
सिर पर रख डोलो।
व्यंग्य मत बोलो।
क्या रखा है कुरेदने में,
हर एक का चक्रव्यूह भेदने में,
सत्य के लिए
निरस्त्र टूटा पहिया ले
लड़ने से बेहतर है
जैसी है दुनिया
उसके साथ होलो।
व्यंग्य मत बोलो।
◆◆◆ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
वह लकड़ी चीर रहा था
कई रातों तक
उसे लकड़ी में
गिलहरी के पूँछ की हरकत महसूस हो रही थी
एक गुर्राहट थी
एक बाघिन के बच्चे सो रहे थे लकड़ी के अंदर
एक चिड़िया का दाना गायब हो गया था
वह चीर रहा था
और चिड़िया खुद लकड़ी के अंदर
कहीं थी
और चीख रही थी।
~ केदारनाथ सिंह (बढ़ई और चिड़िया)
अंग्रेज बहुत चालाक हैं। भरी बरसात में स्वतंत्र करके चले गए। उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाए। वह बेचारी भीगती बस-स्टैंड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है।
स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतंत्र-दिवस ठिठुरता है।
◆◆◆ हरिशंकर परसाई
हमारे जमाने में नारी को जो भी मुक्ति मिली है, क्यों मिली है? आंदोलन से? आधुनिक दृष्टि से? उसके व्यक्तित्व की स्वीकृति से? नहीं, उसकी मुक्ति का कारण महंगाई है। नारी-मुक्ति के इतिहास में यह वाक्य अमर रहेगा, "एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता"।
◆◆◆ हरिशंकर परसाई
There are known knowns. These are things we know that we know.
There are known unknowns. That is to say, there are things that we know we don't know.
But there are also unknown unknowns. There are things we don't know we don't know.
- Donald Rumsfeld
उसकी खुशबू खरीद लाए हैं
फूल जादू खरीद लाए हैं
जो मोहब्बत लुटाया करते थे
वो तराजू ख़रीद लाए हैं
आज हम हुस्न की नुमाइश से
दिल पे क़ाबू खरीद लाए हैं
एक जिन्दा चराग के बदले
मुर्दा जुगनू ख़रीद लाए हैं
- फहमी बदायूनी