लिखते समय जितना भी अकेलापन हो, वह काफ़ी अकेलापन नहीं है, कितनी ही ख़ामोशी हो वह पर्याप्त ख़ामोशी नहीं है, कितनी ही रात हो वह काफ़ी रात नहीं है।
ज्ञानरंजन
कैसे बेवकूफ़ हैं हम ! जिन्दगी हमारे सामने झोली खोले खड़ी है-बीन लो जो चाहे सो... और हम उँगलियाँ झुलस जाने के डर से सहमे खड़े हैं। हमें आग की ज़रूरत भी है पर उसके बहुत पास बैठ भी नहीं सकते।
गोविन्द मिश्र ( तुम्हारी रोशनी में किताब से )
अब बारिश और अँधेरा है। मैं टेबल-लैम्प जलाते हुए डरता हूँ—उस आत्मीय अँधेरे को तोड़ना नहीं चाहता जो दिन भर मेरे कमरे में मेरे भीतर, मेरे साथ, जमा होता गया है।
( निर्मल )
Indian Railways to broadcasting Chhath songs at railway stations on the auspicious occasion of Chhath Puja. This initiative aims to connect passengers with the auspicious spirit of the festival and make their journey more pleasant. At major stations like Patna, Danapur, Hajipur, Bhagalpur, Jamalpur, Sonpur, New Delhi, Ghaziabad, and Anand Vihar Terminal, these songs are giving passengers a sense of home and culture, infusing their journey with devotion and joy: Indian Railways
तुम मेरे जीवन में नदी की तरह आईं
मुझे तुम में डूब जाना था
अभागा हूँ मैं
आगे की यात्रा के लिए प्रार्थनाएँ बुदबुदाते हुए
मैंने तुम्हें एक पुल से पार किया।
(प्रदीप सैनी)
1986- वे भी क्या दिन थे!
ह्वाट्सअप क्या, लैंडलाइन फ़ोन भी नहीं होता था।फिर भी दोस्तों से बात करना इतना मुश्किल नहीं था।हम चिट्ठियाँ लिखा करते थे।
बीए का पहला साल था।इंटर पास करके बीएचयू पहुंचा था। अपने प्रिय मित्र राकेश को यह चिट्ठी लिखी थी, जिसे कल घर की सफाई करते हुए मिल गई।
बिछड़ गए तो ये दिल 'उम्र भर लगेगा नहीं
लगेगा लगने लगा है मगर लगेगा नहीं
नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है
मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं
- उमैर नजमी