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प्रिय प्रशांत किशोर,
जब मैं यह ख़त लिखने बैठा हूँ, तब बाहर बिहार में जश्न का शोर है
लोग ढोल बजा रहे हैं, नारे लगा रहे हैं,
और भीतर मेरे मन में सिर्फ एक ही ख़्याल घूम रहा है
इस जीत की असल कहानी किसी ने नहीं लिखी…
पर मैं लिख रहा हूँ।
क्योंकि 2025 के इस चुनाव में
अगर किसी ने सबसे ज़्यादा पसीना बहाया है,
सबसे ज़्यादा किलोमीटर पैदल चला है,
सबसे ज़्यादा गालियाँ खाईं और फिर भी मुस्कुराया है,
तो वो तुम हो प्रशांत किशोर।
तुमने लोगों को पहली बार दिखाया
कि जात–धर्म से ऊपर भी राजनीति होती है।
तुमने मजमा नहीं लगाया,
तुमने दिमाग लगाया।
तुमने लोगों को सिखाया
कि जाति से पेट नहीं भरता,
रोज़गार से भरता है।
तुमने बताया
कि पलायन सिर्फ आँकड़ा नहीं,
बिहार के हर घर की चीख है।
तुमने नेताओं को मजबूर किया कि
वे पहली बार रोज़गार का मतलब समझें,
पहली बार पलायन को अपराध की तरह देखें,
पहली बार सड़कों पर जा कर जनता को सुनें।
कई जगह तुमने दबाव बनाया
और यही दबाव राजनीति में “जियोनुका” की तरह लगा।
जैसे खेत में पानी न जाए तो किसान नहर खोल देता है,
वैसे ही तुमने सरकार की गर्दन पकड़कर कहा
“काम करो नहीं तो जनता देख रही है।”
लोग क्या समझें
यह दबाव था या प्रेरणा।
पर असल बात यह है कि
जिस काम को सरकार 20 साल में नहीं कर सकी,
उसे तुमने 1 साल की जनसुराज यात्रा में करवा दिया।
सच कहूँ
अगर 2025 के चुनाव में सरकार जीती,
तो उसमें आधी जीत उनकी है…
और आधी तुम्हारी।
क्योंकि तुम वो दबाव बल बने
जिसने नीतियों को धक्का दिया,
जिसने मंत्रियों को हिलाया,
जिसने अफसरों को जगाया,
जिसने जनता को उम्मीद दी।
तुमने बिहार के लोगों को पहली बार एहसास कराया कि
राजनीति सिर्फ गादी की लड़ाई नहीं है
रोज़गार की भी लड़ाई है।
तुमने बताया कि
बिहार को जाति से ज़्यादा नौकरी चाहिए,
नारे से ज़्यादा नीयत चाहिए।
आज लोग कहते फिर रहे हैं
“बिहार जीता।”
पर मैं कहता हूँ
बिहार को तुमने जगाया।
और जो इंसान किसी प्रदेश को जगा दे,
वो सिर्फ चुनावी रणनीतिकार नहीं होता,
वो इतिहास लिखने वाला शख़्स होता है।
आज की इस जीत में
तुम्हारी मेहनत,
तुम्हारा संघर्ष,
तुम्हारी आवाज़,
और तुम्हारा दबाव
सब कुछ शामिल है।
कई बार सोचता हूँ,
अगर तुम न होते,
तो शायद यह चुनाव भी
पुरानी लकीरों पर चल जाता।
पर नहीं
इस बार बिहारी जागा है।
और उसे जगाने वाला
एक ही आदमी है तुम।
तुम्हारा एक शुभचिंतक,
जो बिहार को बदलते हुए देखकर
तुम्हारी भूमिका समझ गया।
#BiharElection2025
"Prashant Should Quit Politics, Prashant Should Go Home Now"
ये मेरी व्यक्तिगत राय है।
@PrashantKishor आप ने पूरी मेहनत की। अगर उनका मकसद सामाजिक चेतना जगाने का था तो उसमें आप सफल नहीं हो पाए।
इसलिए प्रशांत, आप जाइए, अपने परिवार के साथ समय बिताइए। अपनी निजी ज़िंदगी को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करके बिहार के गाँवों में अगले 5 साल फिर से धूल फाँकना कोई समझदारी नहीं है 🙏
आपने कोशिश की, पूरी ईमानदार कोशिश की। आपकी इस कोशिश को लोग याद भी रखेंगे, और आपको भी यह सुकून रहेगा कि आपने बिहार के लिए एक सच्ची कोशिश की थी।
बिहार को बदलने की ज़िम्मेदारी अब किसी और की होगी। कोई और आएगा जो 10 या 20 साल बाद बिहार बदलने की कोशिश करेगा।
अभी बिहार बदले या ना बदले, आपके जीवन, आपकी निजी ज़िंदगी या आपके परिवार पर 1% भी फर्क नहीं पड़ने वाला।
इसलिए आप बिहार बदलने की यह ज़िद छोड़िए। बिहार को बदलना होगा तो बदल जाएगा, नहीं बदलना होगा तो वहीं का वहीं रहेगा।
अगर आप राजनीति में रहेंगे तो मीडिया से लेकर हज़ारों लोगों को जवाब देना पड़ेगा - “क्या हुआ आपके बड़े-बड़े दावों का ?”
क्यों ज़रूरत है इतने लोगों को हज़ार जवाब देने की ? आराम से, इज़्ज़त से राजनीति छोड़ दीजिए और अपने पुराने काम पर वापस जाइए। अपनी आरामदायक और अच्छी ज़िंदगी का आनंद लीजिए।
लेकिन अगर आपका लक्ष्य एक राजनीतिक दल बनाकर अगले 20–50 साल की राजनीति करना है, तो उसकी शुरुआत हो चुकी है। 3.4% वोट शेयर एक शुरुआत है।
नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे बड़े नेता भी जब जनता दल से अलग होकर समता पार्टी बनाए थे, तब उन्हें भी सिर्फ 7% वोट मिले थे।
लेकिन अगर आप इसी तरह की आदर्शवादी राजनीति करते रहे और KC Sinha जैसे सज्जन लोगों को चुनाव लड़वाते रहे, तो 2030 में भी शायद नतीजा न बदले।
अगर प्रशांत राजनीति में रहेंगे तो उन्हें भी वही जातीय समीकरण बनाने पड़ेंगे, वही बाहुबली उम्मीदवारों को टिकट देने पड़ेंगे, शायद दूसरी पार्टी से गठबंधन करना पड़े, या जाति-आधारित नेताओं को पार्टी में शामिल कराना पड़े।
अंत में प्रशांत भी शायद उसी रास्ते पर चल देंगे जिस पर JDU चल रही है - और कहना पड़ेगा, “बाघ के सामने बकरी को चुनाव नहीं लड़वा सकते।”
एक राजनीतिक पार्टी चलाना आसान काम नहीं है। इसमें बहुत पैसा, संसाधन और कार्यकर्ता लगते हैं। और यह सब एक व्यक्ति के लिए जुटाना बेहद मुश्किल होता है।
ये धन, संसाधन और लोग कहाँ से आएंगे ?
कितने लोग अब तक ईमानदार राजनीति के लिए दान दे रहे हैं ? और कब तक देंगे ? और कितना देंगे ?
आखिरकार, ये सब जुटाने के लिए आपको उन्हीं भ्रष्ट ठेकेदारों, बालू माफिया और क्रोनी कैपिटलिस्ट पर ही निर्भर होना पड़ेगा।
Prashant राजनीति में रहेंगे तो हो सकता है 2030 नहीं, पर 2035 में सरकार बना लें। लेकिन क्या तब वे वही आदर्शवादी Prashant रह पाएँगे जो आज हैं ?
लोकतंत्र में नई पार्टियों का आना ज़रूरी है, यह अच्छी बात है।
लेकिन आने वाले 10 साल में बिहार की राजनीति पलायन या शिक्षा पर नहीं होने वाली।
Prashant जो भी निर्णय लेंगे, सोच-समझकर ही लेंगे।
उन्हें आगे के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ।
🙏
पानी को जहर बनाने वाली सरकारी नीति को Pinch करिए। Bihar के रोहतास में विकलांग होता पूरा गांव।
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देखिए पूरा वीडियो हमारे यूट्यूब पर @Abhinav_Pan के साथ।
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