"दर्द के रिश्ते
जब नम होने लगें
और गीत रचने लगेंगी
सन्नाटों की हवाएँ
समझ लो आदमी का लहू
कहीं सस्ते में बिका है"
-- ओमप्रकाश वाल्मीकि
• रासती प्रकाशन •
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प्रसिद्ध साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि जी के जन्मदिवस के अवसर पर उनकी कविता 'ठाकुर का कुआँ' का पाठ करते हुए युवा कवि व साहित्य चेतना मंच के महासचिव श्याम निर्मोही।
यदि तुम्हें,
अपने ही देश में नकार दिया जाये
मानकर बन्धुआ
छीन लिये जाएँ अधिकार सभी
जला दी जाये समूची सभ्यता तुम्हारी
नोच-नोच कर
फेंक दिए जाएँ
गौरवमय इतिहास के पृष्ठ तुम्हारे
तब तुम क्या करोगे?
ओमप्रकाश वाल्मीकि: सम्पूर्ण कविताएँ