लड़ो
लड़ नहीं सकते, बोलो
बोल नहीं सकते, लिखो
लिख नहीं सकते, साथ दो
साथ नहीं दे सकते,
काम करने वालो का मनोबल बढ़ाओ
यदि वो भी नहीं कर सकते हो,
जो कर रहे हैं, उनका मनोबल मत तोड़ों
क्योंकि वो तुम्हारे हिस्से की लड़ाई लड़ रहा है।
— खुदीराम बोस
हम आँधियो मे फँसे
तन्हा दिये
डगमगाऐंगे
गमों को सीने मे दबाये
मिलन के गीत गायेंगे।
हम आसमान मे तन्हा सूरज सा
बाकि बची उम्रो पर
खिलखिलाऐगा
मिलन के गीत गायेगे।
हम समय की धार मे बह रहे
उदास चेहरे
टूटी कश्तियो पे बैठे मुस्कुरायेगे
और एक दिन डुब जाऐगे।
~विभोर
खैर! जैसे भी हो
जीवन कट जाएगा
न अपना घर होगा न जमीन
फिर भी आसमान तो होगा कुछ-न-कुछ
फिर भी नदी होगी कभी भरी कभी सूखी
रास्ते होंगे शहर होगा
और एक पुकार
और यह भी कि
कोई इच्छा थी कभी
तपती धरती पर तलवे का छाला
~ अरुण कमल
मैं अवाक हूँ, अपलक हूँ ।
मेरे पास और कुछ नहीं है
तुम भी यदि चाहो
तो ठुकरा दो :
जानता हूँ कि मैं भी तो ठीकरा हूँ ।
और मुझे कहने को क्या हो
जब अपने तईं खरा हूँ ?
~ अज्ञेय
माथे पे सिकन लिये
ढुँढता फिर रहा हूँ
मुस्कुराहट मै
जो कुछ गमों के बीच खो गई
सफर मे तो अब
गम ही गम बचा है
खुशियाँ तो
दरख्तों की छाव मे सो गई
हर वक्त संजीदगी
सजाऐ रहते हैं चेहरे पे
लोग कहते हैं
हम हँसना भूल गये हैं
हिज्र के पेड़ की एक शाख पर
गमों के फंदे लगा के झूल गये हैं..
अक्सर मानसून की कुछ बूँदें
रेगिस्तान तरफ मुड़ जाता है
और
अमवसी रात की तनहाई में
ओस पर बैठे बैठे
चाँद की ख्वाहिश पर लिखता है
एक कविता…
वही कविता जिसे वह लिखना नहीं,
जीना चाहता था..
~ विभोर
जंगल में औरतें हैं
लकड़ियों के गट्ठर के नीचे बेहोश
जंगल में बच्चे हैं
असमय दफ़नाए जाते हए
जंगल में नंगे पैर चलते बूढ़े हैं
डरते-खाँसते अंत में ग़ायब हो जाते हुए
जंगल में लगातार कुल्हाड़ियाँ चल रही हैं
जंगल में सोया है रक्त
धूप में तपती हुई चट्टानों के पीछे
वर्षों के आर्तनाद हैं
और थोड़ी-सी घास है बहुत प्राचीन
पानी में हिलती हुई
अगले मौसम के जबड़े तक पहुँचते पेड़
रातोंरात नंगे होते हैं
सूई की नोक जैसे सन्नाटे में
जली हुई धरती करवट लेती है
और एक विशाल चक्के की तरह घूमता है आसमान
जिसे तुम्हारे पूर्वज लाए थे यहाँ तक
वह पहाड़ दुख की तरह टूटता आता है हर साल
सारे वर्ष सारी सदियाँ
बर्फ़ की तरह जमती जाती हैं निःस्वप्न आँखों में
तुम्हारी आत्मा में
चूल्हों के पास पारिवारिक अंधकार में
बिखरे हैं तुम्हारे लाचार शब्द
अकाल में बटोरे गए दानों जैसे शब्द
दूर एक लालटेन जलती है पहाड़ पर
एक तेज़ आँख की तरह
टिमटिमाती धीरे-धीरे आग बनती हुई
देखो अपने गिरवी रखे हुए खेत
बिलखती स्त्रियों के उतारे गए गहने
देखो भूख से बाढ़ से महामारी से मरे हुए
सारे लोग उभर आए हैं चट्टानों से
दोनों हाथों से बेशुमार बर्फ़ झाड़कर
अपनी भूख को देखो
जो एक मुस्तैद पंजे में बदल रही है
जंगल से लगातार एक दहाड़ आ रही है
और इच्छाएँ दाँत पैने कर रही हैं
पत्थरों पर।
- मंगलेश डबराल
जब तुम अपने मस्तक पर
बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे
और काँपोगे नहीं
तब तुम पाओगे कि
कोई फ़र्क़ नहीं
सब कुछ जीत लेने में
और अंत तक हिम्मत न हारने में।
-कुँवर नारायण