पटना के एक प्राइवेट स्कूल ने पिछले साल क्लास KG और तीसरी की किताब, कॉपी के लिए 14 हजार 635 रुपए की वसूली की थी। शायद किताबों पर सोने या चांदी की वर्क लगी होगी। उसी साल लखनऊ के बड़े स्कूल में क्लास आठवीं की किताब कॉपी 9590 तो पांचवीं के लिए 6 हजार से ज्यादा की लूट हुई। लुटेरों का मौसम आ गया है। लेकिन एक बात गांठ बांध लीजिए, इस खुली डकैती के खिलाफ नेता बोलेंगे न अधिकारी। अमीर बोलेगा नहीं क्योंकि उसे इससे फर्क नहीं पड़ता। नेता अधिकारी इसलिए नहीं बोलेंगे क्योंकि वे खुद इस गोरखधंधे में संलिप्त हैं। हमें ही लड़ना होगा। कमर कस लीजिए।
आज का सबसे बड़ा सवाल यही है –
क्या हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं, या सिर्फ किताबों के बोझ तले दबा रहे हैं?
क्लास 1 के बच्चे के बैग में 15–20 किताबें ठूंस दी जाती हैं, मानो ज्ञान का वजन किलो में नापा जाता हो। लेकिन यही बच्चे 20 साल बाद डिग्री लेकर भी बेरोज़गारी की लाइन में खड़े नजर आते हैं। तो समस्या कहां है?
समस्या यह है कि हमने शिक्षा को समझने के बजाय “दिखाने” का माध्यम बना दिया है। ज्यादा किताबें = अच्छी पढ़ाई, इस गलत धारणा ने पूरे सिस्टम को खोखला कर दिया है। असल में बच्चे को समझ, कौशल और सोचने की क्षमता चाहिए न कि हर विषय की मोटी-मोटी किताबें।
इस स्कैम में दोषी सिर्फ स्कूल नहीं हैं,
बल्कि हमारे देश का पूरा शैक्षणिक सिस्टम ही दोषी हैं। प्राइवेट स्कूल शिक्षा के नाम पर किताबों का कारोबार चला रहे हैं। 300–500 रुपये में आने वाली किताबों का सेट, कमीशन के खेल में 5–6 हजार तक पहुंचा दिया जाता है। और दुखद यह कि इनमें से कई किताबें सालभर खुलती तक नहीं हैं। इसके बावजूद भी न तो शिक्षा मंत्रालय के कान में जू रेंगता हैं और न ही जनपद स्तरीय पदाधिकारियों को कुछ दिखाई पड़ता है।
आज हर माता-पिता मजबूर हैं –
क्योंकि “अच्छी शिक्षा” के नाम पर सवाल उठाने से डरते हैं। स्कूल जानते हैं कि यही डर उनका सबसे बड़ा बिज़नेस मॉडल है। और इसी डर व बिजनेस मॉडल के बीच में हम बच्चों को “भविष्य” देने के लिए आज ही उनका बचपन और सोचने की आज़ादी छीन रहे हैं। हम सिर्फ किताबों का बोझ बढ़ रहा है, लेकिन समझ और कौशल से बच्चों को बहुत दूर कर रहे हैं।
~ साभार: @NCIBHQ
@DocRGM_ जिलाधिकारियो को तुरंत सूचना दीजिये लिखित में बुक्स के बिल ओर लिस्ट सहित बच्चो की हर साल बदलने वाली महंगी किताबो की मोती दलाली ओर महंगी फीस खाने चूसने वाले निजी स्कूलों ने हमारे आपके बच्चे के शिक्षा के नाम पर आर्थिक और मानसिक शोषण करने वाली इस रीति नीति पर आवाज उठाना ही होगा
इन स्पेशल ट्रेनों को स्थायी करने का प्रस्ताव भेजिए @ECRlyHJP@spjdivn
🔸Darbhanga New Delhi Clone Humsafar Special
🔸Jaynagar Amritsar Clone Special
🔸Raxual Tirupati Express
🔸Darbhanga Ahmedabad Clone Special
🔸Jaynagar Miraj (Pune) Tag Train
🔸Santragachi Darbhanga/Raxual -Howrah
🔸Samastipur-Lokmanya Tilak स्पेशल का परिचालन पुनः दरभंगा/जयनगर या लौकहा से।
@gopaljeebjp@sanjay_saraogi@SanjayJhaBihar
Schools are running scams
I guess the manufacturing cost of these books will not be more than 1000 rupees but the school is charging 9000 from parents.
This mandatory forced selling of books, school uniforms etc by schools should be banned.
@EduMinOfIndia@PMOIndia
Hello @dpradhanbjp ji,
Please bring some regulation to school textbook pricing as well.
What exactly is being taught that a single book costs ₹1000?
This is not education anymore, it’s becoming a financial burden on families.
@spjdivn जयनगर -दरभंगा रुट से राजस्थान के जयपुर,बीकानेर रुट ओर उत्तराखंड हरिद्वार रुट से जोड़ने के लिए भी नई एक्सप्रेस ट्रेनें चलनी चाहिए जिससे कि नेपाल,बिहार के पर्यटकों,व्यपारियो को पर्यटन और व्यपारिक यात्राएं करने में आसानी हो ओर रेल राजस्व भी बढ़े।
लगभग 1963 का समय रहा होगा...
गाड़ियां नहीं..
रोड नहीं..
पानी नहीं..
लाइट नहीं..
एक भक्त के मन मे शंका उतपन्न हुई
उसने बाबा से पूँछा
बाबा धाम बना तो रहे हो यहाँ कौन आएगा ??
बाबा चिर परिचित अंदाज मे मुस्कराते हुऐ बोले एक दिन पूरा विश्व आयेगा !!
🌸राम राम जय गुरुदेव जी 🌸
बिहार वाज वंश द इंडस्ट्रियल हर्ट ऑफ इंडिया। JRD टाटा साहब को जब भारत का पहला इंडस्ट्रियल शहर स्थापित करना था, तब उन्होंने तत्कालीन बिहार के जमशेदपुर को चुना था। डालमिया ने डालमियानगर बिहार में ही बसाया था।
फ़िल्म डिवीजन द्वारा तैयार यह वीडियो देखिए और अपना स्वर्णयुग याद कीजिए। ऐसा भी नहीं की था की केवल झारखंड क्षेत्र के खनिज बहुलता के कारण बिहार इंडस्ट्रियल हब था, बिल्कुल उसकी भी भूमिका थी लेकिन उस दौर में झारखंड क्षेत्र के अलावे शेष बिहार भी उतना ही इंडस्ट्रियल था। न केवल खनिज प्रशंसकरण या स्टील, कोल जैसे भारी उद्योग थे बल्कि शेष बिहार के मिथिला, मगध, भोजपुर क्षेत्र में भी उद्योगों का जाल था। चीनी उत्पादन, भागलपुरी सिल्क उद्योग, सुता मील, जुट मील, पेपर मील, खाद मील, बंदूक कारखाना, पेट्रोकेमिकल्स, सीमेंट उत्पादन आदि जैसे उद्योगों की बहुलता के कारण बिहार भारत के औद्यौगिक उत्पादन में अग्रतम स्थान रखता था। अन्य प्रदेशों से लोग रोजगार के लिए बिहार प्रवासीत होते थे।
समय कैसे बदल गया। झारखंड के अलग होने से न केवल खनिज आधारित उद्योग बिहार से निकल गए बल्कि वर्तमान बिहार क्षेत्र के जो कृषि आधारित उद्योग थे वो भी एक एक कर बंद होते चले गए। हमारे चीनी मिल, सुता मिल, जुट मिल, खाद मिल, पेपर मिल, भागलपुरी सिल्क उद्योग...सब बंद हो गए। हमारे लोग मजदूर बनकर दूसरे प्रदेशों में रोजगार के लिए पलायन करने लग गए। अपनी माटी छूटी, भाषा छूटी, संस्कृति छूटी, गांव छूटा, लोग छूटे...और छूटती गई स्वर्णिम इतिहास की वो यादें। आज पलायन को ही हमने सच समझ लिया है, स्वीकार कर लिया है, भाग्य और नियति समझ लिया है। हमारी पहचान गाली की तरह इस्तेमाल होती है। गाली, अपमान, मार, प्रताड़ना हमारे लोगों के हिस्से हो गया है। हम ऐसे तो न थे...ऐसा कैसे हो गए ? कारण क्या रहे ? और समाधान क्या है ?
वीडियो: साभार