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वाह! दो नन्हे-मुन्ने बच्चों ने तो कमाल कर दिया 💫
इनका डांस देखकर दिल खुश हो गया ❤️
इतनी छोटी उम्र में इतना शानदार प्रदर्शन — सच में लाजवाब 👏
हर स्टेप में आत्मविश्वास और हर मूव में मासूमियत झलक रही थी 🌟
ईश्वर करे ये दोनों बच्चे यूँ ही आगे बढ़ते रहें और अपने टैलेंट से सबका दिल जीतते रहें ❤️
1947 का वह दिन सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि आर्थिक पुनर्जन्म का प्रतीक था। सदियों के औपनिवेशिक शोषण ने भारत की रीढ़ तोड़ दी थी।
ब्रिटिश राज ने इस देश को एक विशाल कच्चे माल की खान और उनके उद्योगों के लिए सस्ते बाजार के रूप में ढाल दिया था। भारत के किसान कपास, जूट, चाय और मसाले उगाते थे, लेकिन इनसे बनी वस्तुएँ इंग्लैंड की फैक्ट्रियों में बनकर फिर भारत में ऊँचे दामों पर बिकती थीं। यह दोगुना शोषण था.मशालें हमारे हाथों में, पर उजाला उनकी गलियों में।
जब आज़ादी का सूरज उगा, तो उस रोशनी में कितना अंधकार छिपा था देश की राष्ट्रीय आय प्रति व्यक्ति मात्र ₹250 सालाना थी। औसत जीवन प्रत्याशा बमुश्किल 32 वर्ष, साक्षरता दर केवल 12 प्रतिशत। उद्योग का हिस्सा GDP में सिर्फ 11.8 प्रतिशत। गाँवों में खेत सूखे पड़े थे, शहरों में कारखाने गिने-चुने, और पेट में भूख की आग जल रही थी।
फिर विभाजन आया घाव पर नमक बनकर। कपास उगाने वाले इलाक़े पाकिस्तान चले गए, पर कपड़ा मिलें भारत में रह गईं। जूट बंगाल का गर्व था, पर उसका अधिकांश उत्पादन क्षेत्र अब पाकिस्तान में था, जबकि जूट मिलें कोलकाता में रह गईं। यह असंतुलन भारत के आर्थिक भविष्य पर गहरी छाया डाल गया।
सवाल था: देश कौन-सा रास्ता चुने?
महात्मा गांधी के “स्वावलंबन” और “ग्राम उद्योग” के विचार अभी भी गूँज रहे थे, लेकिन स्वतंत्र भारत के सामने चुनौती बहुत बड़ी थी। देश को गरीबी, बेरोज़गारी और औद्योगिक पिछड़ेपन से उबारने के लिए एक ठोस आर्थिक ढाँचे की ज़रूरत थी।
उस समय दुनिया दो खेमों में बँटी थी.
•एक ओर अमेरिका और पश्चिमी यूरोप का पूंजीवादी मॉडल, जहाँ निजी कंपनियाँ विकास की गाड़ी खींचती थीं।
•दूसरी और सोवियत संघ का समाजवादी मॉडल, जहाँ राज्य सबकुछ अपने हाथ में ले चुका था।
पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनकी दूरदर्शी टीम ने सोचा भारत न तो पूरी तरह पूंजीवाद अपना सकता था, न ही कठोर समाजवाद। यह देश विविध रंगों, भाषाओं और संस्कृतियों से बना था, यहाँ का प्रत्येक मनुष्य स्वयं में एक सभ्यता था। इसलिए उन्होंने चुना एक तीसरा रास्ता “मिश्रित अर्थव्यवस्था”।
नेहरू का विश्वास था कि विकास केवल कारखानों से नहीं, बल्कि इंसानों की तरक्की से मापा जाएगा। उनके नेतृत्व में पहली पंचवर्षीय योजना (1951) का सूत्रपात हुआ, जिसमें कृषि और सिंचाई पर जोर दिया गया। देशभर में भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, दामोदर घाटी जैसे बड़े बांध बने जिन्हें नेहरू ने “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा।
दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956) में भारत ने भारी उद्योगों की नींव रखी। भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर जैसे स्टील प्लांट बने। BHEL, HAL, ONGC जैसी सार्वजनिक कंपनियाँ खड़ी हुईं। सरकार ने बुनियादी ढाँचा तैयार किया ताकि निजी उद्योग भी बढ़ सकें। शिक्षा के क्षेत्र में IITs और IIMs जैसी संस्थाओं की स्थापना से नई पीढ़ी को प्रशिक्षित किया गया वही पीढ़ी आगे चलकर भारत के तकनीकी चमत्कार की जननी बनी.
यह रास्ता आसान नहीं था। संसाधन सीमित थे, विदेशी पूंजी कम थी, और जनता की ज़रूरतें अपार। लेकिन भारत ने अपने पैरों पर खड़े होने का संकल्प लिया। हमारी नीतियों ने “स्वदेशी” की भावना को आधुनिक योजना के साथ जोड़ा। यह वही समय था जब गाँवों में सहकारी समितियाँ, शहरों में लोक उपक्रम, और वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में नवाचार की संस्कृति आकार ले रही थी।
भारत धीरे-धीरे उस औपनिवेशिक अंधकार से निकलने लगा, जिसने उसे सदी दर सदी बेड़ियों में जकड़ा था। यह आंदोलन सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का पुनर्जागरण था।
नेहरू से लेकर लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी तक, स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक दशकों में यही विचारधारा जीवित रही एक ऐसा भारत जो गरीब के आँसू पोंछे, युवा को रोज़गार दे, और उद्योग को राष्ट्रनिर्माण का साधन बनाए। सरकार और निजी क्षेत्र ने साथ चलना सीखा, योजनाबद्ध विकास ने दिशा दिखाई, और जनता ने धीरे-धीरे यह विश्वास करना शुरू किया कि “हम कर सकते हैं।”
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि 1947 की धूल भरी राहों पर बोए गए वे बीज ही आज के भारत के वटवृक्ष बने हैं।
भारत-पाक का मैच होना देश का ईतना बड़ा मुद्दा था
अगर कांग्रेस चाहती तो इस मुद्दे को देश भर में भुना सकती थी
लेकिन उसने केवल सोशल मीडिया पर हल्ला किया
कांग्रेस की जगह अगर भाजपा विपक्ष में होती तो हर चौक चौराहे पर विरोध प्रदर्शन और धरना हो गया होता
यही कारण है कि कांग्रेस सत्ता से दूर है
कांग्रेस के कार्यकरता जब तक जमीन पर नहीं उतरेंगे तब तक सत्ता मिलना असंभव है
तो हरदीप पुरी और नितिन गडकरी को हर वह व्यक्ति जो अपनी कार के परफॉर्मेन्स के लिए चिंतित है, ‘मोटिवेटेड ट्रोल’ लगता है।
क्या कारण है कि कम्यूनिटी नोट लगते ही पेट्रोलियम मिनिस्ट्री उस नोट में दिए गए नीति आयोग का लिंक गायब कर देता है?
क्या कारण है कि आप कारों पर विदेशी स्टडी पर निर्भर हैं, जबकि आपके शहरों में औसत गति बीस की है, जो इंजन पर एक्स्ट्रा स्ट्रेस डालता है। बाकी का काम इथेनॉल ब्लेंड कर देता है?
क्या कारण है कि कार कंपनियाँ मैनुअल में E10 तक की छूट देते हैं, और फोन करने पर कहते हैं कि E20 मत डालिए, जैसा कि कुछ लोगों ने लिखा है?
ब्लेंड कितना है, यह जानने का कोई तरीका क्यों नहीं है सिवाय इसके कि पेट्रोल पम्प वाला ऐसा कह रहा है?
सरकार लोगों को विकल्प क्यों नहीं दे रही कि वो चुन सकें कि उनकी कार यदि 2023 से पुरानी है, तो वो इंजन बचाने के लिए उचित पेट्रोल ले सकें? उन्हें क्यों जबरन E20 लेना पड़ रहा है?
सरकार को आइटी सेल की भाषा नहीं बोलनी चाहिए, क्योंकि उस कार्य के लिए आइटी सेल स्वयं है। नागरिकों की शिकायत ‘मोटिवेटेड ट्रोलिंग’ नहीं होती। यदि आप कन्फर्म हैं कि हम मोटिवेटेड ट्रोल हैं (मेरे पास तो गाड़ी भी नहीं है), तो आप हम पर केस कर के, हमारा मोटिव उजागर कर दीजिए, हम आभारी रहेंगे।
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