आईआईटी मुंबई के प्रोफेसर के साथ जो हो रहा है वह बेचैन करनेवाली है । यह शिक्षण संथाओं के बुनियाद को हिला कर रख देगा । बचपन ��ें हम स्कूल में पढ़ते थे । हरि जी उस स्कूल में चपरासी थे । लेकिन हिंदी के विद्वान थे । जाति से कहार थे और हम स���ी पैर छूते थे । दूसरे शिक्षक यादव थे जियोग्राफी पढ़ाते थे । अच्छी खासी कुटाई करते थे यदि हम टास्क न पूरा करें तो । बुढ़वा मास्टर साहब कुर्मी थे । न जाने कितनी छड़ियाँ तोड़ी लेकिन दादा जी और माता को पता लगता था तब कहती थी मास्टर साहब ने अच्छा किया । आज भी उन्हें याद कर आँखें गीली हो जाती हैं । आज हम कहाँ आकर खड़े हैं ।
शिक्षक मारना तो दूर डाँट नहीं सकता । नक़ल पकड़ने पर सस्पेंड हो जाय तो कौन शिक्ष��� आगे आयेगा । हम शिक्षण संस्थानों में जातीय संघर्ष का बीजारोपण बहुत पहले ही कर चुके हैं । ईश्वर ही मालिक है ।
देश तो उन्हीं को चुन रहा है जो दूसरों पर ओछी-फूहड़ तंज कसते है। बेरोजगारी, पेपर लीक, सिस्टम,शिक्षा को छोड़कर धर्म की बात करते है।
अब कांग्रेस ने धर्म को छोड़कर तंज चुना है तो इसमें दिक्क़त क्या है ?
पेपर लीक के खिलाफ़ सरकार की लाठी खाने वालों ने उनकी को दुबारा चुना ना?
राहुल गांधी इंदौर गए थे छात्रों से बात करने।
बेरोज़गारी, पेपर लीक, सिस्टम, शिक्षा—सब पर बातें हुई होंगी।
लेकिन वायरल क्या हुआ?
एक कॉमेडियन मोदी जी की mimicry कर रहा है, और राहुल गांधी हँस रहे हैं।
देश को content मिल गया।
अब BJP नाराज़ है कि प्रधानमंत्री क�� mimicry क्यों हुई।
Congress कह रही है—अरे भाई, comedy थी।
और मैं बस ये सोच रहा हूँ कि हमारे यहाँ राजनीति और comedy का रिश्ता अब इतना गहरा हो चुका है कि दोनों को अलग करना मुश्किल है।
राहुल गांधी के लिए भी lesson है—
भारत में नेता का हँसना भी politically sensitive activity है।
संसद में हँसो, clip बनेगा।
रैली में हँसो, clip बनेगा।
कॉमेडियन पर हँसो, तीन दिन debate चलेगी।
वैसे नेताओं को mimicry से इतना ��रेशान भी नहीं होना चाहिए।
हमारे यहाँ नेता रोज़ एक-दूसरे की आवाज़, अंदाज़, नारे, gestures—सब copy करते रहते हैं। लालू यादव ने तो मास्टरी की थी इस कला में।
बस comedian करे तो अचानक मर्यादा याद आ जाती है।
और comedians के लिए भी सलाह है—
राजनीति पर joke करते वक्त punchline सोच-समझकर लिखना।
क्योंकि joke audience को पसंद आया या नहीं, ये बाद की बात है।
पहले party spokesperson उसका review पहले देगा।
3. कांग्रेस कैंडिडेट मिलन प्रधान की गिरफ्तारी 20 साल प���राने केस में तभी क्यों हुई ज़ब उन्हें ममता बनर्जी ने समर्थन दिया ?
क्या सीएम सुवेंदु जी को भरोसा नही है की वो अपनी सीट जिता पाएंगे ?
धन,बल, साम, दाम का उपयोग कर चुनाव लड़ना/जीतना को जनता के गुस्से का नाम मत दीजिए
1. सर... थोड़ी सी जानकारी मेरे पास है, आपसे thread में साझा करना चाहता हूँ।
बंगाल चुनाव में SIR के जरिये 91 लाख नाम काटे गए भाजपा की सरकार बनी और ��ुनाव के बाद अपील किए गए जीतने मामलों का निपटारा हुआ उसमें से 91% नाम फिर से मतदाता सूची में जोड़े गए है।
पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम उप चुनाव में ममता बनर्जी की प्रत्याशी संचिता डे के सीएम शुभेंदु अधिकारी से मुलाक़ात के बाद नामांकन वापस लेना सामान्य घटना नहीं है।
ममता बनर्जी ने बंगाल में भय, भ्रष्टाचार और लोकतंत्र को कुचलने की सारी हदें पार कीं थीं,इसलिए बंगाल की जनता ने लोकतंत्र बचाने की लड़ाई बीजेपी के साथ कंधे से कंधे मिलाकर लड़ी और ममता को सत्ता से बाहर कर दिया।
ममता के नेतृत्व में डेढ़ दशक से ज़्यादा बंगाल को लूटने वाले और आम बंगाली का खून चूसने वाले विधायकों और सांसदों ने ���ातो रात पाला बदला और बीजेपी के छतरी के नीचे आ गए।
बीजेपी सरकार आने पर जिन्हें हवालात में होना चाहिए था,वे सब बीजेपी के साथ हलवा खा रहे हैं।जिनके ख़िलाफ़ बीजेपी लड़ी आज सत्ता में आने के बाद उन्ही के साथ खड़ी है।
कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हाकिम,जिसने कोलकत्ता को मिनी पाकिस्तान बनाने की क़सम खाई थी।जिस फिरहाद हाकिम ने बकरों के समान संघ के प्रचारकों क�� गर्दन काटने की धमकी दी थी,आज वही फिरहाद हाकिम अपनी अकूत अवैध कमाई को बीजेपी के देख रेख में वैध कर रहा है।
राजनीतिक रूप से लगभग खत्म हो चुकी ममता के उम्मीदवार को सीएम शुभेंदु अधिकारी की बेहद मजबूत सीट से हराना बीजेपी के लिए क्या इतना मुश्किल था कि उम्मीदवार को डर और प्रलोभन देकर चुनाव से बाहर करवा दिया?
ममता के पास ना सत्ता है, ना पार्टी है,ना विधायक है, ना सांसद है, ना कैडर है, ना सहयोगी दलों का ��मर्थन है,ना चुनाव लड़ने के लिए पैसे है, फिर भी बीजेपी सीएम के घर में एक चुनाव लड़ने की हिम्मत क्यो नहीं जुटा पाई?
सीएम शुभेंदु अधिकारी ख़ुद विपक्ष में रहते सीएम ममता बनर्जी को इस नंदीग्राम सीट से हरा चुके हैं।जब ममता के पास सबकुछ था, तब ममता ख़ुद नंदीग्राम से हार गई थीं, आज ममता के पास कुछ नहीं है तो कैसे सत्ता पर काबिज बीजेपी को ममता का प्यादा हरा देता?
बीजेपी को चुनाव लड़ना था और नंदीग्राम के संग्राम में ममता को फिर हराना था।
बीजेपी लोकतांत्रिक पार्टी है।बीजेपी को यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र में चुनाव सर्वोपरि है।ख़ुद लड़�� और सबको लड़ने दे। लोकतंत्र में जनता का फ़ैसला अंतिम और सर्वमान्य होता है।
लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई सबसे ज़्यादा बीजेपी ने लड़ी है।
ममता को राजनीतिक रूप से खत्म करने के लिए लोकतंत्र को खत्म करने या देश को नंदीग्राम जैसे चुनाव से मुक्त करने की जरूरत नहीं है।
2.फरक्का विधानसभा के मोताब शेख का भी नाक मतदाता सूची से काटा गया था, वो कोर्ट की शरण में उनका नाम मतदाता सूची में जुड़ा और आज वो विधायक है।
भय की राजनीति tmc ने की तो tmc के क��ंडिडेट का नामांकन वापस जनता से मुलाकात के बाद होना चाहिए.. भाजपा नेता से मुलाकात के बाद वापस क्यों हुआ?
आज अंबिकापुर में सरगुजा महाराज, पूर्व उप मुख्यमंत्री श्री टी.एस. सिंहदेव जी के निवास कोठीघर पहुँचकर उनसे भेंट की.
इस दौरान पूर्व मंत्री श्री अमरजीत भगत ��ी भी साथ थे. @TS_SinghDeo
सोशल मीडिया पर लिखने वाला एक वर्ग तथ्यों से बुरी तरह अपरिचित होता है और भावनाओं में बुरी तरह बह कर लिखता है। इस वर्ग के साथ समस्या यह भी है कि यह वर्ग क्रांति करने को बुरी तरह उत्साहित रहता है लेकिन क्रांति की वास्तविकता से बुरी तरह अपरिचित होता है।
इस वर्ग को ऐसे भी पहचाना जा सकता है कि यह वर्ग किसी घटना पर बुरी तरह उछल कर प्रतिक्रिया देते हैं और सच उनसे दूर खड़ा उन पर बुरी तरह हंस रहा होता है।
भाई मैं तो पटना राजधानी में था एक वक़्त... वहां तो कंकरबाग एरिया में... एक तरफ सब्जी बिकता था दूसरी तरफ सूअर कचरा चरते थे।
मैं तो खुद बिहारी हूँ... लेकिन सच को कैसे झुठलाऊ
वायरल होना चाहते होंगे ये अलग बात है
लेकिन आप am चूस कर खाते है या काटकर, आपके चेहरे पर इतना ग्लो क्यों है.., आप पर्स में बटुआ रखते ह क्या....
ऐसे प्रश्नों से बेहतर है... वायरल होने वाला सवाल करना... जो जनहित से जुड़ा हो
लोगों ने देखा कि नॉर्वे की एक लगभग अनजान सी पत्रकार अपने अंदाज़ में सवाल पूछकर रातोंरात स्टार बन गई थी। हालांकि उसके सवाल पूछने का तरीका पत्रकारिता के मानदंडों के अनुकूल बिल्कुल नहीं था।
हेले लिंग वायरल हो गई। दुनिया भर में मशहूर हो गई। फॉर्मूला हिट है। इंडि���ा में भी नकल हो रहा है। सबलोग वायरल होना चाहते हैं!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत के संघ के शताब्दी वर्ष में न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्��न से दिए गए ऐतिहासिक भाषण को आने वाली कई शताब्दियों तक याद रखा ��ाएगा।
हिंदू होना क्या होता है,सच्चा हिंदू कौन है और संघ का हिंदुत्व क्या है,यह मोहन भागवत ने देश में कई बार,कई मौकों पर बताया है,अब विदेश की धरती से दुनिया को संघ का संदेश दिया है।
दरअसल मोहन जी का यह संदेश उन स्वघोषित स्वयंसेवकों को भी ध्यान से सुनकर अपने जीवन में अमल में लाना चाहिए,जिन्होनें सत्ता से मिलने वाली मलाई के लिए ख़ुद को स्वयंसेवक घोषित कर लिया है।
समाज में एक ऐसा वर्ग 2014 के बाद कुकुरमुत्तों की तरह उग आया है, जिनका संघ से कभी कोई लेना देना नहीं रहा।कभी शाखा नहीं गए,आज भी नहीं जाते,सारे काम संघ की सीख से अलग करते हैं,समाज में नफ़रत फैलाते हैं और दिन भर मुसलमानों को गाली देते हैं।मुस्लिम मुक्त समाज की बात करते हैं।संघ प्रार्थना की दो लाइन गा नहीं सकते, गुरु पूर्णिमा पर संघ को एक रुपया गुरु दक्षिणा नहीं देते,लेकिन ख़ुद को संघ का स्वयंसेवक और बाल काल से स्वयंसेवक कहने में शर्म महसूस नहीं करते।
दरअसल संघ ऐसे ही जबरिया बन गए फर्जी स्वयंसेवकों से समाज में बदनाम है।ऐसे नफ़रती लोग संघ का मुखोटा लगाकर समाज में मुसलमानों के ख़िलाफ़,किसी राजनीतिक दल के ख़िलाफ़, किसी व्यक्ति विशेष के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते रहते हैं।मोहन जी ने बताया कि ऐसे जीते जागते और चलते फिरते नफ़रती लोग हिंदू धर्म और संघ के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
संघ में घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे या आंशिक रूप से घु�� गए ऐसे नफ़रती लोग ना हिंदू धर्म को जानते हैं ना संघ को।
सच्चे हिंदुओं,सच्चे स्वयंसेवकों और संघ को ऐसे लोगों से सतर्क रहना चाहिए।मोहन भागवत जी को सुनिए,
समझिए और अपने जीवन में उतारिए।
संघ की आड़ में अपने नफ़रती एजेंडे को संघ का चेहरा मत बनाइए।संघ का चेहरा बहुत ख़ूबसूरत है।
मोदी कैबिनेट में मोदी के अलावा छह पूर्व मुख्यमंत्री शामिल है।चार बीजेपी के मुख्यमंत्री रहे है और दो सहयोगी दलों के मुख्यमंत्री रहे हैं।
राजनाथ सिंह,शिवराज सिंह चौहान,मनोहर लाल खट्टर,सर्वानंद सोनोवाल बीजेपी के मुख्यमंत्री रहे हैं और
जीतनराम मांझी और एचडी कुमारस्वामी सहयोगी दलों के मुख्यमंत्री रहे हैं।
मोदी कैबिनेट में बीजेपी के चार पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी,राजनाथ सिंह,अमित शाह और जगत प्रकाश नड्डा शामिल है।
मोदी कैबिनेट में फेरबदल या विस्तार को लेकर दो ऐसे मंत्रियों के भविष्य को लेकर सबसे ज़्यादा चर्चा है, जिसमे से एक बीजेपी का मुख्यमंत्री के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहा है और अभी बीजेपी के पार्लियामेंट्री बोर्ड में भी है।
दूसरे नेता जिसकी सबसे ज़्यादा चर्चा है वह नेता बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष तो रहा है लेकिन कभी मुख्यमंत्री नहीं ��हा और पार्लियामेंट्री बोर्ड में भी नहीं है।
खबरों के केंद्र में यही दो नेता हैं।अपने भविष्य को लेकर सबसे ज्यादा चिंता इन्ही दो नेताओं को है।
आज तोशाम हल्के के भैरा गाँव में सरपंच श्री रूपेश जनावा जी की दादी जी के निधन पर उनके निवास पर पहुँचकर शोक व्यक्त किया।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोकाकुल परिवार को इस अ���ार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। इस कठिन समय में मेरी संवेदनाएँ परिवार के साथ हैं।
कृति सेनन बिकनी पहनकर इस पृथ्वी पर स्थिति किसी भी मस्जिद में चली जाएँ। फिर वहाँ जाकर वही सवाल पूछें, ज��� उन्होंने रक्षाबंधन को लेकर विज्ञापन करने के बाद पूछा है: "When will we stop telling women what to wear?"
अरबी में पूछ लें: मता सनतवक़्क़फ़ु अन इख़बारिन-निसाइ बिमा यजिबु अलैहिन्ना अन यर्तदीन?
फ़ारसी में पूछ लें: के दस्त अज़ इन बरमीदारिम के बे ज़नान बेगूयिम चे बेपूशंद?
उर्दू में पूछ लें: हम औरतों को ये बताना कब बंद करेंगे कि उन्हें क्या पहनना चाहिए?
किसी लिबरल से लिबरल देश में चली जाएँ। वहाँ जाकर ये सवाल पूछें। सारा वह��� निकल जाएगा। 200 करोड़ जिनकी जनसंख्या है, जो दुनिया की कुल जनसंख्या का एक-चौथाई हैं - थोड़े से सवाल उनसे भी तो कर लो। रक्षाबंधन से तिलक और आरती गायब करके उसे सेक्युलर बना दिया, अब थोड़ा मस्जिदों को भी धर्मनिरपेक्ष बना दो। थोड़ा अपना सुधारवादी एजेंडा और फेमिनिज्म वहाँ भी दिखा दो।
From a socio-political standpoint, we stand firmly for women’s bodily autonomy and agency.
Every woman, irrespective of caste, class or religion, is entitled to wear what she chooses — hijab, ghoonghat or anything else.
ऊपर लिखें गए वाक्यों का अर्थ समझते है भाई आप?
'मनुस्मृति' की रचना के लगभग 400 से 600 साल बाद इस्लाम का आया और फिर कुरान का संकलन शुरू हुआ. इस्लाम के तहत 'शरिया कानून' का व्यवस्थित रूप से विकास 8वीं और 9वीं सदी में हुआ. माने मनुस्मृति के लगभग 550 से 650 साल बाद.
'शरिया' इस्लामिक कानून और जीवन जीने की संहिता है, जिसे 'कुरान' और 'हदीस' के सिद्धांतों को मिला���र तैयार किया गया है. हदीस माने पैगंबर मोहम्मद साहब के कथन, उनके कार्यों, उनकी मौन स्वीकृतियों और उनके आचरण का लिखित अभिलेख.
हदीस में महिलाओं के सामाजिक, धार्मिक और व्यक्तिगत जीवन से जुड़े कई नियम व निर्देश दिए गए हैं. इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
1. हदीस के मुताबिक, किसी महिला के लिए ��पने पति या 'महरम' (पिता, भाई, बेटा आदि रिश्तेदार जिनसे शादी नहीं हो सकती) के बिना एक दिन-रात से अधिक लंबी दूरी की यात्रा करना मना है.
2. हदीस में महिलाओं को घर से बाहर निकलते समय शरीर को पूरी तरह से ढकने जैसे कि परदा/हिजाब और सादगी बनाए रखने का सख्त निर्देश है.
यहां तक कि बाहर निकलते समय इत्र/परफ्यूम/सुगंध आदि लगाने, आकर्षक कपड़े पहनने या ध्यान खींचने वाली आवाज जैसे पायल आदि पहनने पर भी पाबंदी लगाई गई है.
3. हदीस में महिलाओं के लिए भौंहों के बाल निकालने या उन्हें बहुत पतला करने की मनाही है. शरीर पर स्थायी टैटू बनवाने को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है. अपने असली बालों में किसी और के या नकली बाल जोड़ने की भी अनुमति नहीं है.
4. महिलाओं को पुरुषों जैसे कपड़े पहनने से मना किया गया है. पुरुषों के बात करने या चलने के अंदाज की नकल करने पर भी सख्त पाबंदी है.
5. विवाह के बाद पति की अनुमति के बिना घर से बाहर जाने या किसी ऐसे व्यक्ति को घर में प्रवेश देने पर मनाही है जिसे पति नापसंद करता हो. इसके अलावा, हदीस में पति के बुलावे पर असहमति जताने को लेकर भी सख्त चेतावनी दी गई है.
6. मासिक धर्म या प्रसव के बाद के समय में महिलाओं के लिए नमाज़ पढ़ने, रोज़ा रखने और काबा का तवाफ परिक्रमा करने पर पूर्ण प्रतिबंध है.
7. हदीस में मुस्लिम महिलाओं को शवजनाज़े का जुलूस के साथ जान��� पर भी मनाही है. साथ ही, अत्यधिक रोने-चीखने की प्रवृत्ति के कारण कब्रों पर लगातार जाने को लेकर भी हदीसों में सख्ती मनाही है.
8. हदीस और कुरान के नियमों के तहत, माता-पिता या पति की संपत्ति में महिला का हिस्सा पुरुष (भाई या बेटे) की तुलना में आधा बताया गया है.
9.हदीस में एक जगह उल्लेख है कि यदि अल्लाह के अलावा किसी और को सिजदा करने की अनुमति होती, तो वह पत्नी को आदेश देते कि वह अपने पति को सिजदा करे. मनु���्मृति में भी पति को देवता के समान मानने की बात कही गई है.
10. हदीस के अनुसार, महिलाओं को ��िसी देश या राज्य के सर्वोच्च शासक (प्रधान) के पद की जिम्मेदारी संभालने से मना किया गया है. कारण कि हदीस में महिलाओं को "अक्ल (बुद्धि) और दीन (धर्म) में कम" बताया गया है, क्योंकि वे मासिक धर्म के दौरान नमाज और रोज़ा नहीं रख सकती हैं.
लेकिन यहां "Samash Patriarchy" का नारा नहीं चलेगा. इन सभी बिंदुओं पर मुस्लिम मज़हब के आकाओं को विचारना है. Socio-political standpoint पर तो @RahulGandhi
@INCIndia और @Pawankhera महिलाओं के शारीरिक और मानसिक आजादी के प��्षधर हैं लेकिन वो गाली सिर्फ मनुस्मृति के संदर्भ में ही देंगे. वो सिर्फ हिंदू समाज को ही कोसेंगे.
शायद यही उनके सियासत का StandPoint है !
कितने हिंदू घरों में मनुस्मृति रखी है? कितने हिंदू परिवार मनुस्मृति को पढ़ते हैं या उसका पालन करते हैं? कि��नों को पता है कि उसमें लिखा क्या है? कितने हिंदू बच्चों,युवाओं को मनुस्मृति के बारे में पता भी होगा? फिर ये बेवजह की टिप्पणियाँ क्यों? एक ही धर्म को backward,patriarchal साबित करने की वजह क्या है? आप ही बताइए! इसका असली मकसद क्या हो सकता है? #justasking