🌿 ऋषिकेश की पावन धरती, त्रिवेणी घाट पर माँ गंगा का सान्निध्य और प्रकृति के बीच जागती चेतना 🌿
मेरे मन को ऋषिकेश की प्राकृतिक सुंदरता हमेशा से आकर्षित करती है। विशेषकर त्रिवेणी घाट पर माँ गंगा के किनारे बैठकर सामने की पहाड़ियों को निहारना, गंगा जी की निर्मल धारा को बहते हुए
परम सत्य के निकट पहुँचने का एक सुंदर माध्यम है।
ईश्वर को केवल मंदिरों में ही नहीं, प्रकृति की निर्मलता, नदियों की पवित्रता और पहाड़ों की शांति में भी खोजिए। प्रकृति के निकट जाइए, स्वयं के निकट आइए। 🌿
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जब मैं गंगा जी के किनारे बैठकर बहते जल को निहारूँ, पहाड़ों की शांति को महसूस करूँ और अपने अंतर्मन में नई ऊर्जा, सकारात्मकता तथा शांति का अनुभव करूँ। ❤️🙏
क्योंकि मेरे लिए प्रकृति केवल देखने की वस्तु नहीं है, बल्कि जीवन को समझने, मन को शांत करने और
फिलहाल मन ऋषिकेश की ओर है, लेकिन कदम अपनी जिम्मेदारियों के साथ जुड़े हुए हैं। उम्मीद है कि बैठक की व्यवस्था पूरी होने के बाद जल्द ही माँ गंगा के दर्शन करने और त्रिवेणी घाट की शांत फिजाओं में कुछ पल बिताने का अवसर मिलेगा।
ईश्वर करे, वह दिन जल्द आए
उस आनंद की अनुभूति और भी गहरी हो जाती है।
फिलहाल मन ऋषिकेश की ओर है, लेकिन कदम अपनी जिम्मेदारियों के साथ जुड़े हुए हैं। उम्मीद है कि बैठक की व्यवस्था पूरी होने के बाद जल्द ही माँ गंगा के दर्शन करने और त्रिवेणी घाट की शांत फिजाओं में कुछ पल बिताने का अवसर मिलेगा।
मेरा मानना है कि जीवन में संतुलन बहुत जरूरी है—एक ओर अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदारी और दूसरी ओर अपने मन, आत्मा तथा प्रकृति के प्रति प्रेम। जिम्मेदारियों से भागकर नहीं, बल्कि उन्हें पूरा करके जब हम प्रकृति की गोद में कुछ समय बिताते हैं, तो
पहली तारीख को हमारी सोसाइटी की स्पेशल जनरल बॉडी मीटिंग (SGBM) है। एक प्रबंधक के रूप में उस बैठक की व्यवस्था और आवश्यक तैयारियों को जिम्मेदारी से पूरा करना मेरी प्राथमिकता है। पहले अपना कर्तव्य निभाना है, उसके बाद ही ऋषिकेश की यात्रा का कार्यक्रम बना पाऊँगा।
त्रिवेणी घाट पर कुछ समय बिताऊँ, गंगा जी को निहारूँ और सामने की पहाड़ियों के बीच बैठकर प्रकृति के उस अनुपम सौंदर्य को फिर से महसूस करूँ। लेकिन जीवन केवल अपनी इच्छाओं का नाम नहीं है; इसमें जिम्मेदारियाँ भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं।
इस अद्भुत सृष्टि के पीछे कोई महान शक्ति अवश्य है। माँ गंगा के तट पर बैठकर कुछ पल मौन रहना भी अपने आप में एक ध्यान है—जहाँ मन की बेचैनी कम होती है, विचारों को ठहराव मिलता है और जीवन को देखने का नजरिया अधिक सकारात्मक बनता है।
आजकल मन बहुत कर रहा है कि ऋषिकेश जाऊँ,
और जीवन को देखने का नजरिया अधिक सकारात्मक बनता है।
मेरी आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के सान्निध्य में भी मुझे ईश्वर की अनुभूति होती है। जब मैं नदी, पहाड़, जंगल और आकाश को निहारता हूँ, तो मन में सहज ही विचार आता है कि
मुझे ईश्वर की अनुभूति होती है। जब मैं नदी, पहाड़, जंगल और आकाश को निहारता हूँ, तो मन में सहज ही विचार आता है कि इस अद्भुत सृष्टि के पीछे कोई महान शक्ति अवश्य है। माँ गंगा के तट पर बैठकर कुछ पल मौन रहना भी अपने आप में एक ध्यान है—जहाँ मन की बेचैनी कम होती है,
वहाँ गंगा की कलकल करती धारा, पहाड़ों की शांत उपस्थिति और खुला प्राकृतिक वातावरण मन को एक अलग ही आनंद और चेतना का अनुभव कराते हैं। ऐसा लगता है मानो प्रकृति मौन रहकर भी हमसे बहुत कुछ कह रही हो। 🙏🌊
मेरी आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के सान्निध्य में भी
देखना और प्रकृति की शांति में स्वयं को खो देना—यह अनुभव शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं है।
कभी-कभी जीवन में ऐसी जगहों पर जाने का मन करता है, जहाँ इंसान दुनिया की भागदौड़ से दूर होकर अपने ही अंतर्मन से मुलाकात कर सके। मेरे लिए ऋषिकेश ऐसी ही एक जगह है।
ये बेहया मुंबईया, मुंबई फिल्मी फ्रेटर्निटी, जो पैसे के लिए कुछ भी कर सकती है। उत्तराखंड में दिलेर मेहंदी के स्टेज शो की कंट्रोवर्सी के बारे में कसीदे पढ़ रहे हैं, कमेंट कर रहे हैं। पता नहीं इन्होंने पीआर बढ़ाने के लिए या दिलेर मेहंदी से कितने पैसे लिए होंगे।
मेरी स्पष्ट राय है—बीमारी की स्थिति में स्वास्थ्य को प्राथमिकता दीजिए, कार्यक्रम स्वीकार करते समय अपनी क्षमता का आकलन कीजिए और विवाद होने पर तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लीजिए।
अंतिम बात
दलेर मेहंदी एक लोकप्रिय गायक हैं और उनके संगीत ने वर्षों तक लोगों का मनोरंजन किया है। उनकी कला का सम्मान होना चाहिए। लेकिन सम्मान का अर्थ यह नहीं कि किसी भी प्रस्तुति पर सवाल न उठाए जाएँ।