"ब्राह्मणों से झाड़ू पोछा लगवाएंगे!
हज़ारों सालों से हमको नीच बनाकर रखा,
अब हम तय करेंगे, नीच कौन बनेगा!"
ये भाषण सत्यशोधक समाज के स्टेज पर लगाया गया है!
तालियाँ भी बज रही हैं इस भाषण पर!
सरेआम एक समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है, क्या ये जातिवाद नहीं?
तो क्या GC प्रोटेक्शन एक्ट की ज़रूरत नहीं, ताकि ऐसे hate speech पर लगाम लग सके??
ज्ञानेश कुमार: जब वे कांग्रेस की पसंद थे… तब कोई खतरा नहीं था।
एक समय था जब कांग्रेस की नजर में ज्ञानेश कुमार सबसे भरोसेमंद और सक्षम अधिकारियों में से एक थे।
केरल कैडर के IAS अधिकारी।
एर्नाकुलम के कलेक्टर।
दिल्ली में केरल के रेजिडेंट कमिश्नर।
उस समय किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। कोई घबराहट नहीं थी।
2007 से 2012 तक…
उन्होंने UPA सरकार में तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी के संयुक्त सचिव के रूप में काम किया।
उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालीं। तब भी कोई खतरे की घंटी नहीं बजी।
इसके बाद वे गृह मंत्रालय गए… और तब भी सब शांत रहा।
लेकिन जैसे ही वे चुनाव आयोग पहुंचे…
अचानक वही अधिकारी “लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा” बन गए!
जिस अधिकारी का करियर एंटनी के कार्यालय में रहते हुए शानदार माना जाता था, वही अचानक संदिग्ध हो गया।
आखिर ऐसा क्या बदल गया?
व्यक्ति नहीं बदला।
सिर्फ सत्ता से कांग्रेस की दूरी बदल गई।
कांग्रेस की नजर में ईमानदारी कमाई नहीं जाती… वह जारी की जाती है।
और जैसे ही चुनाव हारते हैं, उसकी वैधता की तारीख खत्म हो जाती है।
यही कांग्रेस का असली चेहरा है!
अगर आपको भी यह दोहरा मापदंड परेशान करता है…
तो इस पोस्ट को रिपोस्ट करें और इसे आगे पहुंचाएं।
You are an idiot of the first order
Nothing is taxed more than the Hindu religion in this country, the temples, the pilgrimages, the festivals , the smaller religious ceremonies and even the stuff used in Hawan
Just goes on to prove that you filmi bhaands can never be trusted
Unfollowed
CJP कभी भी अभिजीत दीपके के बेडरूम में नहीं बना था।
CJP के पीछे की असली ताकत 'ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन' (Human Rights Foundation) है...
...और यह पूरा खेल ओस्लो फ्रीडम फोरम (Oslo Freedom Forum) में रचा गया था, जिसका आयोजन ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन ने किया था।
और अंदाजा लगाइए कि भारत से वहां कौन-कौन से बड़े प्रतिभागी (attendees) पहुंचे थे?
सौरभ दास और सुप्रिया शर्मा।
और वहां की प्रमुख वक्ताओं (featured speakers) में से एक थीं हेलेन स्वैनसन — वही पत्रकार जिन्होंने मोदी जी के ओस्लो दौरे के समय (18 से 20 मई के दौरान) उनके सामने हंगामा (heckling) किया था।
इसकी पटकथा काफी समय पहले ही तैयार कर ली गई थी।
और इस पूरे तंत्र (ecosystem) को सौरभ दास और ठाकुर फाउंडेशन (Thakur Foundation) के ज़रिए भारत में लाया गया।
ठाकुर फाउंडेशन ने सौरभ दास को शुरुआती स्टार्टअप फंड के तौर पर लगभग 11 लाख रुपये दिए थे।
उन्होंने एक किताब भी लिखी है — दरअसल वे एक किताब लिख रहे हैं जिसके लिए उन्हें अग्रिम राशि (advance) मिली है। ठीक वैसे ही जैसे न्यूट गिंगरिच (Newt Gingrich) ने तब किया था जब वे अमेरिका में 'फॉक्स न्यूज़' (Fox News) लाने की कोशिश कर रहे थे। सौरभ दास के लिए भी वही तरीका अपनाया जा रहा है।
तो, ये सारी चीजें बहुत पहले से ही तय थीं।
दीपके को 'ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन' और 'जॉर्ज सोरोस फाउंडेशन' द्वारा अमेरिका में पूरे एक साल तक ट्रेनिंग दी गई थी।
दूसरे साल उनके बोस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने का कोई रिकॉर्ड नहीं है।
अब एक भारी भरकम डोनेशन की बातें सामने आ रही हैं, ताकि वहां से उनकी डिग्री पक्की की जा सके।
सुप्रिया शर्मा 'ओस्लो फ्रीडम फोरम' में दूसरी प्रमुख वक्ता थीं। और उन्होंने उमर खालिद पर खुलकर बात की — कि कैसे भारत में अन्य धर्मों का उत्पीड़न हो रहा है और हिंदू लोग हिटलर और मुसोलिनी जैसे हैं।
यही उनकी सोच और विचारधारा थी, और उनके मुताबिक मोदी तानाशाह हैं...
हां, सुप्रिया शर्मा ने 'लव जिहाद' पर एक किताब भी सह-लिखी (co-authored) है और बताया है कि यह एक काल्पनिक (fictional) कहानी है।
वे भारत में भारी मात्रा में पैसा झोंक रहे हैं, इसीलिए FCRA इतना महत्वपूर्ण है और यही वजह है कि अन्य राजनीतिक दल इसका विरोध कर रहे हैं।
अधिकांश आंदोलनों की शुरुआत वामपंथी (Left) विचारधाराओं से हुई है, जहाँ छात्रों का माइंडवॉश करके आंदोलन खड़े किए जाते हैं।
यह नेपाल में हुआ, बांग्लादेश में हुआ और बहुत पहले क्यूबा में भी ऐसा ही हुआ था।
इस देश की Gen Z और Gen Alpha से मेरी यही अपील है — सरकार से जितने चाहें सवाल पूछें, उनसे वे काम करवाएं जो आप चाहते हैं, खासकर शिक्षा के क्षेत्र में।
लेकिन कृपया करके CJP, AAP, ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन और ओस्लो फोरम जैसी विचारधाराओं के बहकावे में न आएं।
वे भारत को अस्थिर कर देंगे और इसे वापस अंधकार युग (Dark Ages) में धकेल देंगे।
ये कांग्रेस सांसद इमरान मसूद है।
जिस कैप्टन स्मिथ ने सैकड़ों की जान बचाई और जिसकी बहादुरी के लिए अमेरिका, इज़राइल और UAE के शीर्ष नेतृत्व ने सम्मान जताया, जिसने हम हिंदुओं का मान बढ़ाया… उसके लिए कांग्रेस की भाषा सुनिए…
Guru Gobind Singh Ji writes in Ugardanthi, asking Devi to bless Him with the strength to:
ਗਾਊ ਘਾਤ ਕਾ ਦੋਖ ਜਗ ਸਿਉਂ ਮਿਟਾਊ । (May I) eliminate the great sin of cow butchering in the world.
— Ugardanthi, Chakka 5
बाबर, हुमायूं और अकबर की लुटेरी फौज ने भारत में हिन्दू जनमानस की संपत्ति को दशकों तक जबर्दस्त लूटा।
जरा जाने की इसमें से कुछ पैसा कहां जाता था... जरा विचार करे कि लूट की मात्रा क्या रही होगी। 🙏
“भारत माता की जय के नारे मत लगाइए,
ये अनुशासनहीनता है
अगर नारा ही लगाना है तो और भी नारे हैं,
आप लोग कांग्रेस की जय हो के नारे लगाइए
जो जो भारत माता की जय बोलेगा उस पर कार्रवाई करेंगे"
: आराधना मिश्रा
यूपी कांग्रेस की नई अध्यक्ष का पुराना वीडियो फिर से वायरल
Good of @neha_laldas to look at the infractions of little known @niostwit because nobody seems to have ever looked at it. It caters to barely 3 lakh students, but the mindset of curriculum makers shows through. I doubt if the Minister and bureaucracy in UOI even know that such an institute exists, let alone to expect them to know what is being taught. With more students opting for open schooling these days, this trash must be wiped clean. @BJP4India@EduMinOfIndia@narendramodi@JoshiPralhad
"𝗖𝗵𝗿𝗶𝘀𝘁𝗶𝗮𝗻 𝗠𝗶𝘀𝘀𝗶𝗼𝗻𝗮𝗿𝗶𝗲𝘀 𝗼𝗽𝗽𝗼𝘀𝗲𝗱 𝗰𝗮𝘀𝘁𝗲 𝘀𝘆𝘀𝘁𝗲𝗺. 𝗖𝗼𝗻𝘃𝗲𝗿𝘀𝗶𝗼𝗻 𝘁𝗼 𝗖𝗵𝗿𝗶𝘀𝘁𝗶𝗮𝗻𝗶𝘁𝘆 𝗯𝗿𝗼𝘂𝗴𝗵𝘁 𝗾𝘂𝗮𝗹𝗶𝘁𝗮𝘁𝗶𝘃𝗲 𝗰𝗵𝗮𝗻𝗴𝗲𝘀 𝘁𝗼 𝗧𝗿𝗶𝗯𝗮𝗹𝘀. 𝗧𝗵𝗲 𝗲𝗱𝘂𝗰𝗮𝘁𝗶𝗼𝗻 𝘄𝗮𝘀 𝗵𝗶𝗴𝗵𝗲𝗿 𝗯𝗲𝗰𝗮𝘂𝘀𝗲 𝗼𝗳 𝗰𝗼𝗻𝘃𝗲𝗿𝘀𝗶𝗼𝗻. 𝗖𝗵𝗿𝗶𝘀𝘁𝗶𝗮𝗻 𝗺𝗶𝘀𝘀𝗶𝗼𝗻𝗮𝗿𝗶𝗲𝘀 𝗽𝗿𝗼𝘃𝗶𝗱𝗲𝗱 𝗹𝗲𝗴𝗮𝗹 𝗵𝗲𝗹𝗽 𝘁𝗼 𝘁𝗿𝗶𝗯𝗮𝗹𝘀. 𝗖𝗵𝗿𝗶𝘀𝘁𝗶𝗮𝗻𝗶𝘁𝘆 𝗵𝗮𝘀 𝗯𝗲𝗲𝗻 𝗮 𝘀𝗼𝘂𝗿𝗰𝗲 𝗼𝗳 𝗹𝗼𝗻𝗴-𝗹𝗮𝘀𝘁𝗶𝗻𝗴 𝗰𝗵𝗮𝗻𝗴𝗲𝘀 𝗶𝗻 𝗜𝗻𝗱𝗶𝗮."
-Says NIOS Text Book for Senior Secondary (Page 63, Chapter 28 of Sociology course)
The NIOS text book is a slap in the face of great tribal leaders who have been fighting Christian missionaries from 19th century till data including 𝗕𝗶𝗿𝘀𝗮 𝗠𝘂𝗻𝗱𝗮, 𝗝𝗮𝘁𝗿𝗮 𝗕𝗵𝗮𝗴𝗮𝘁, 𝗛𝗮𝗶𝗽𝗼𝘂 𝗝𝗮𝗱𝗼𝗻𝗮𝗻𝗴, 𝗥𝗮𝗻𝗶 𝗚𝗮𝗶𝗱𝗶𝗻𝗹𝗶𝘂, 𝗞𝗮𝗿𝘁𝗶𝗸 𝗢𝗿𝗮𝗼𝗻, 𝗗𝗶𝗹𝗶𝗽 𝗦𝗶𝗻𝗴𝗵 𝗕𝗵𝘂𝗿𝗶𝗮, 𝗡𝗮𝗻𝗱 𝗞𝘂𝗺𝗮𝗿 𝗦𝗮𝗶, 𝗥𝗮𝗷𝗸𝗶𝘀𝗵𝗼𝗿𝗲 𝗛𝗮𝗻𝘀𝗱𝗮 and countless tribals.
The NIOS text book completely whitewashes the missionary atrocities on forced conversions like Goa Inquisition & hides how tribals since 19th century opposed the missionary activities tooth and nail.
The book portrays that christianity has been a savior for tribals and those who did not convert to Christianity were worse off.
The book does not even mention how christianity destroyed every single indigenous cultures and civilizations in Africa, South America, Europe and the treatment Christian missionaries meted out to slaves.
Any 16 year old Hindu kid reading this would reach only one conclusion- Conversion to Christianity is good, Christianity saved tribals and the Hindus who oppose conversion to Christianity are evil. Hindu kids will have no correct historical context.
Our text books aren't teaching skills.
They are brainwashing kids!!!
Oh really? Teesta Setalvad was about to be arrested. She ran to the Supreme Court. A two judge bench heard her the same day. Verdict was split. News reached Chief Justice. He stepped out of a dance concert and ordered a three judge bench. Bench sat at 10 pm and stayed her arrest.
In late 80s my uncle was walking past Shivaji Park. That's the first time he saw a VHP meeting and people were wearing Garv Se Kaho Hum Hindu Hai headbands. Someone gave him one and he innocently wore it.
The moment he reached home in their all Christian society, his Christian "friends" started making fun of him.
Before that day he wasn't even aware of his Hindu identity, but he realised his Christian friends were, with their minds full of hate.
After that day my entire family became politically aware proud Hindus.
BL Santhosh is right, RSS role in making Hindu a mainstream sentiment has been unparalleled. Koti Pranam to the countless RSS volunteers for this service 🙏
फ़्रांस उन देशों में शामिल है जिन्होंने सबसे पहले फ़िलिस्तीन को मान्यता दी थी
आज फ़िलिस्तीन ने भी पलट कर फ़्रांस का एहसान चुका दिया
पूरा देश जला कर फ़िलिस्तीन का झंडा फहरा दिया गया 🇵🇸
एक हिंदू गद्दार की कहानी।
नाम है जगत सेठ, Banker of the World.
जगत सेठ की कहानी केवल एक अमीर साहूकार की कहानी नहीं है—यह धन, सत्ता, दरबार की राजनीति और ईस्ट इंडिया कंपनी के उभार के आपसी संबंध की कहानी है।
राजस्थान से बंगाल तक:
जगत सेठ परिवार की जड़ें राजस्थान के मारवाड़ी-जैन व्यापारी समुदाय से जुड़ी थीं। परिवार बंगाल-बिहार में व्यापार और साहूकारी/बैंकिंग के जरिए तेजी से प्रभावशाली हुआ।
मुर्शिदाबाद में आने के बाद उनका कारोबार नवाब के दरबार और सरकारी राजस्व व्यवस्था से गहराई से जुड़ गया।
18वीं सदी में फतेहचंद के समय परिवार अपनी चरम शक्ति पर पहुँचा। वह हिंदू राजाओं को नहीं, नवाबों को कर्ज दिया करता था। मुगल बादशाह ने उन्हें “जगत सेठ” यानी “दुनिया का बैंकर” की उपाधि दी, जो बाद में परिवार की पहचान बन गई।
(औरंगजेब के मरने के बाद मराठों की ताकत बढ़ रही थी लेकिन हथियारों , असलहों और अन्य संसाधनों की कमी के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। अगर जगत सेठ ने उनकी मदद की होती तो आज भारत का इतिहास कुछ और होता। मुगल खत्म हो गए होते और अंग्रेज भारत में स्थापित नहीं हो पाते।)
जगत सेठ नवाब की सरकार के वित्त मंत्री की तरह काम करता था।
राजस्व की वसूली और हस्तांतरण में भूमिका निभाते थे मुद्रा ढलाई और बुलियन के कारोबार से जुड़े थे,
नवाब, जमींदार, व्यापारी और यूरोपीय कंपनियों तक को वित्त उपलब्ध कराते थे। (लेकिन हिंदू राजाओं को नहीं।)
अर्थात उस समय के बंगाल में जगत सेठ का प्रभाव आज के किसी बहुत बड़े बैंकिंग-फाइनेंस नेटवर्क जैसा समझा जा सकता है।
1756 में सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। जगत सेठ परिवार के प्रमुख मेहताब चंद और स्वरूप चंद का सिराज से संबंध खराब हो गया।
फिर 1757 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिराजुद्दौला के खिलाफ साजिश रची। मीर जाफर सहित कई प्रभावशाली लोगों के साथ जगत सेठ परिवार भी उस राजनीतिक गठजोड़ में शामिल हुआ और कंपनी को वित्तीय सहयोग मिला।
23 जून 1757 को प्लासी की लड़ाई हुई और सिराजुद्दौला हार गए।
इसीलिए इतिहास में जगत सेठ का नाम प्लासी की साजिश से बहुत मजबूती से जुड़ा है। हालांकि यह कहना कि “अकेले जगत सेठ ने सिराज को हरवा दिया” इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा—मीर जाफर, अन्य दरबारी गुट, कंपनी की सैन्य शक्ति और उस समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण थीं।
4. सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण मोड़
जगत सेठों ने जिस राजनीतिक बदलाव में भूमिका निभाई, उसका फायदा अंततः उन्हीं के खिलाफ गया।
प्लासी के बाद मीर जाफर नवाब बने और कुछ समय तक जगत सेठों का प्रभाव बना रहा। लेकिन बाद में मीर कासिम और जगत सेठ परिवार के बीच संघर्ष हुआ।
गद्दार मीर कासिम जाफर ने जगत सेठ से भी गद्दारी की।
1763 में मीर कासिम के आदेश पर मेहताब चंद और स्वरूप चंद की हत्या कर दी गई। स्रोतों के अनुसार उनके शव मुंगेर किले से नीचे फेंके गए।
मीर जाफर ने जगत सेठ के खजाने पर कब्जा कर लिया।
ब्रिटिश सत्ता मजबूत होने के साथ 1770 के दशक में सरकारी राजस्व और खजाने का केंद्र कलकत्ता की ओर स्थानांतरित हुआ। अंग्रेजों ने मीर जाफर से सारा खजाना छीन लिया।
यानी जिस व्यवस्था में जगत सेठ नवाब के वित्तीय साम्राज्य के केंद्र में थे, वही व्यवस्था ब्रिटिशों के अधीन बदल गई।
6. अंतिम परिणाम
अगली पीढ़ियों को “जगत सेठ” की उपाधि मिलती रही, लेकिन परिवार की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति लगातार घटती गई। 19वीं सदी तक उनका पुराना वैभव काफी कम हो चुका था और 1912 में इस वंश की अंतिम कड़ी के बाद यह उपाधि भी समाप्त हो गई।
सबसे दिलचस्प सबक:
जगत सेठों ने अपनी वित्तीय शक्ति से बंगाल की राजनीति को प्रभावित किया; लेकिन जिस शक्ति-संतुलन को बदलने में उन्होंने भूमिका निभाई, उसी ब्रिटिश सत्ता के मजबूत होने के बाद उनकी अपनी शक्ति खत्म हो गई।
मुर्शिदाबाद में आज भी House of Jagat Seth उनके उस विशाल अतीत की याद दिलाता है।
सरदार पटेल लगातार गांधी द्वारा किये जा रहे ब्रह्मचर्य के प्रयोगों की आलोचना कर रहे थे, वो भी सीधे गांधी के मुँह पर
ज़ाहिर है, इसके बाद गांधी उनको प्रधानमंत्री बनते कैसे देख सकते थे
#गांधी_जयंती
अगर मुसलमान हिंदुओं का विनाश भी करना चाहें, तब भी हिंदुओं को अपने दिल में मुसलमानों के प्रति क्रोध नहीं रखना चाहिए।
अगर मुसलमान हम सभी को मारना भी चाहें, तो भी हमें निडरता से मृत्यु का सामना करना चाहिए।
यदि वे हिंदुओं की हत्या करके अपना शासन स्थापित करते हैं, तो हम अपने प्राणों की आहुति देकर एक नई दुनिया का सूत्रपात (आरंभ) कर रहे होंगे। किसी को भी मृत्यु से डरना नहीं चाहिए।
प्रत्येक मनुष्य के लिए जन्म और मृत्यु निश्चित है।
फिर हम शोक मनाएं या प्रसन्न क्यों हों? यदि हम मुस्कान के साथ मृत्यु को गले लगाते हैं, तो हम एक नए जीवन में प्रवेश करेंगे, और एक नए भारत का निर्माण करेंगे।"
— श्री महात्मा गांधी जी
(6 अप्रैल 1947 को नई दिल्ली की एक प्रार्थना सभा में दिया गया भाषण)
संदर्भ (Reference & Source)
पुस्तक: द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी (The Collected Works of Mahatma Gandhi - CWMG)
खंड (Volume): 87 (Vol. 87)
पृष्ठ संख्या (Pages): 218–219
दिनांक: 6 अप्रैल 1947 (देश के विभाजन और आजादी से कुछ महीने पहले)
दो-चार साल और जिंदा रह गए होते तो बाबा जी की इच्छा जरुर पूरी हो जाती। फिर भी उनके चेले उनकी इच्छा को पूरा करने की पूरी पूरी कोशिश कर रहे हैं।
गांधी के जमाने में यदि सोशल मीडिया होता गांधी बदल जाते ❗
🔹 ना देश का बंटवारा करते
🔹 ना पाक को पैसा देने के लिए अनशन करते
🔹 बकरी नहीं गाय पालते
🔹 अब्दुल छोड़ रामू के कंधे पर हाथ रखते
🔹 वंदे मातरम का विरोध करने वाले मुसलमान का समर्थन नहीं करते
🔹गोडसे गांधी को गोली नहीं मारते