शक्ति क्रियाशील अवस्था में माया है और निष्क्रिय अवस्था में ब्रह्म जैसे समुद्र का जल कभी स्थिर होता है और कभी तरंग पूर्ण वैसे ही ब्रह्म और माया है समुद्र मानो ब्रह्म है और तरंग अवस्था में माया सृष्टि के लिए शिव और शक्ति दोनों की आवश्यकता है शक्ति की सहायता के बिना केवल शिव #
*विरला जानन्ति गुणान्*
*विरला: कुर्वन्ति निर्धने स्नेहम्।
*विरला: परकार्यरता:
*परदु:खेनापि दु:खिता विरला:
भावार्थ:-कोई कोई ही दूसरों के गुणों को जानते हैं, कोई कोई ही गरीबों से स्नेह रखते हैं, कोई कोई दूसरों की सहायता करते हैं और कोई कोई ही दूसरों के दुःख से दुखी होते हैं॥ #
विधा और अविधा किसे कहते हैं
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥
इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, ! उन सबको माया जानना। उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, एक अविद्या दुष्ट दोषयुक्त है #
जित देखूं तित श्यामा मोरी
जित देखूं तित राधा मोरी
नवल भामिनि नित्य किशोरी
रास विलासिनी राधा भोरी
पवन सूर्य में जल में थल में
चहुँ और निर्बल में सबल में
मन से श्यामा सब में दीखे
जगत बना सब श्यामा सरीखे
स्वास् स्वास् में मन विश्वास में
पल पल लगी उसी आस में #
मैं मृत्यु से नहीं लेकिन किसी के जीवन को व्यर्थ जाते देख जरूर ही दुखी होता हूँ वही वास्तविक मृत्यु है शरीर का अंत नहीं जीवन का व्यर्थ जाना ही वस्तुतः मृत्यु है ओशो #
परवरिश और संस्कार भी बहुत मायने रखते हैं सिर्फ पढ़ लिखकर कोई अच्छा इंसान नहीं बनता है समझदार वह नहीं जो पढ़ा लिखा हो समझदार तो वह है जिसे मालूम हो कि कब कैसे क्या किस लहजे में बात करनी #
कबीरा कुआ एक है पानी भरे अनेक बर्तन मेँ ही भेद है पानी सब मेँ एक पत्थर जेहन गुलाब नहीं होदे कोरे कागज किताब नहीं होदे जे कर लयी यारी बुलेया फिर यारा नाल हिसाब नहीं होदे #
"कर्मफल" !!!
जो पदार्थ बाह्य कर्त्ता, कर्म, क्रिया, आदि अनेक कारकों द्वारा निष्पन्न हुआ हो और बाजीगर की माया के समान, अविद्याजनित, महामोहकारक हो, एवं जीवात्मा के आश्रित सा प्रतीत होता हो और साररहित होने के कारण तत्काल ही लय - नष्ट हो जाता हो, उसका नाम फल है। #
*🕉️ नमो नारायण भगवान की करुणा कृपा से ही जीव अपने सहज स्वरूप को जान पाता है हम सबके अंदर मूल रूप से ज्ञान, शक्ति ,शांति ,आनंद प्रकाश ,प्रेम सौंदर्य और अनंत संभावनाएं छुपी है।* #