ट्विटर खोलाे तो पता चलता है कि बेटियों से वंश चलता है ट्रेंड कर रहा है।
“बेटियों से वंश चलता है” सुनने में यह वाक्य प्रगतिशील लगता है, लेकिन इसके भीतर भी वही पुराना पितृसत्तात्मक अहंकार छिपा हुआ है, जो स्त्री को मनुष्य नहीं, किसी वंश, कुल, रक्त और नाम की वाहक मानता है।
सवाल यह नहीं है कि वंश बेटों से चलता है या बेटियों से। असली सवाल यह है कि आखिर किसी मनुष्य का मूल्य “वंश चलाने” से ही क्यों तय किया जाए? बेटी कोई जैविक पुल नहीं है, जिस पर चढ़कर कोई परिवार अपनी अमरता की कल्पना करे। वह अपने सपनों, श्रम, प्रेम, बुद्धि, असहमतियों, विफलताओं, अपने अभिलाषाओं, अपनी यौन आकांक्षाओं, अपने स्वप्नदर्शी संसार और स्वतंत्र जीवन के अधिकार के साथ एक पूर्ण मनुष्य है।
समाज जब कहता है कि बेटियों से वंश चलता है तो वह अनजाने में उसी खेल के नियम स्वीकार कर लेता है, जिसमें सदियों से बेटों को प्राथमिकता मिली। बस खिलाड़ी बदल दिया जाता है, खेल नहीं। स्त्री को समान मानने वाली दृष्टि कहती है, हमें यह साबित करने की ज़रूरत नहीं कि बेटी भी बेटे जैसी है; हमें यह पूछना है कि बेटे को ही मापदंड किसने बना दिया? और यह क्यों ही कहा जाए कि बेटी ही बेटे जैसी है। यानी हमने कसौटी बेटे को मान रखा है।
बेटी का गौरव इस बात में नहीं है कि वह पिता का नाम आगे बढ़ाएगी, परिवार की नाक रखेगी, कुल की मर्यादा बचाएगी या बुढ़ापे का सहारा बनेगी। उसका गौरव इस बात में है कि वह अपनी शर्तों पर जीवन चुनेगी, चाहे विवाह करे या न करे, संतान चाहे या न चाहे, घर संभाले या ���त्ता, कविता लिखे या कंपनी चलाए, खेत जोते या अदालत में खड़ी हो। यह वह किसी मन चाहे व्यक्ति के साथ शादी करके रहे या बिना शादी के रहे, जैसा कि पुरुष बहुत धड़ल्ले से कर लेता है। वह किसी धर्म, किस जात या किस देश के व्यक्ति के साथ शादी करे। ये उसके अपने प्रश्न और ये उसकी अपनी चिंताएँ हैं। आप बेटियों से वंश चलवाते हैं इसलिए बेटियों को बुरके या घूंघट में बिठा देते हैं। उस मर्यादाओं और नाना प्रकार के डर के पहरे लगा देते हैं। बेटा किसी गंदगी में मुंह मारता फिरे, किसी भी चाल चलन में रहे, किसी के भी साथ रहे और कुछ भी करता फिरे उसकी चिंता न वंश के मामले में होती है और न मर्यादा के।
इसलिए “बेटियों से वंश चलता है” कहने से आगे बढ़ना होगा। कहना होगा : बेटियां वंश चलाने के लिए नहीं जन्म लेतीं; वे जीवन को अपनी तरह से जीने, बदलने और विस्तार देने के लिए जन्म लेती हैं। वे मन चाहा पढ़ने, नाचने, गाने, वैज्ञानिक बनने, अखबार का संपादक बनने, खेत संभालने, अपना घर खरीदने से लेकर अपनी असीम मनुष्यता के विस्तार में जीने की विस्तीर्ण आकांक्षाओं का निस्सीम नभ चाहिए। और मनुष्यता तभी चलेगी, जब बेटियों को प्रतीक नहीं, स्वतंत्र नागरिक माना जाएगा।
#बेटियों_से_वंश #बेटियाँ
"जब तुम्हीं मेरे नहीं रहे तो तुम्हारी चीजों का करना क्या है। मैंने तुम्हें प्रेम किया। रुपए-पैसे मकान-दुकान, संपत्ति का हिसाब-किताब करके इसकी तौहीन नहीं करूंगी।" उसकी मां ने शादी पर कंगन दिए थे वह भी वापस क��ने हैं मीलॉर्ड। मैं दिल से चाहती हूं वह ख़ुश रहे।
भारत के सुप्रीम कोर्ट में जब उस स्त्री ने ज���्टिस पारदीवाला के सामने यह कहा तो वह सन्न रह गए। भावुक होते हुए बोले मैं अपने फैसले में दर्ज कर रहा हूं कि यह तलाक़ का दुर्लभ मामला है जिसमें कोई सौदेबाजी नहीं थी, यहां से आगे बढ़ो और ख़ुश रहो। -(नवीनकुमार की फेसबुक पोस्ट से)
+++
यह मामला 19 सितंबर 2025 का है।
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच के सामने यह तलाक का केस आया था।
केस का पूरा नाम: Smt. X vs Shri Y (Transfer Petition (Civil) No. 1698 of 2023)
महिला (पत्नी) ने खुद कहा कि वह कोई गुजारा-भत्ता, स्त्रीधन वापसी या कोई संपत्ति नहीं चाहती।
जस्टिस पारदीवाला बहुत भावुक हो गए और मौखिक रूप से कहा (जो ऑर्डर में भी दर्ज हुआ):“This is a rarest of rare divorce case where the wife does not want anything – no maintenance, no alimony, no jewellery, nothing. She only wants to move on in life. We record our appreciation for the maturity shown by the lady.”
कोर्ट ने तलाक को मंजूरी दे दी और दोनों पक्षों को आगे बढ़ने और खुश रहने की शुभकामना दी।
यह बात 19-20 सितंबर 2025 को वायरल हुई और कई अखबारों व सोशल मीडिया पर छाई रही क्योंकि ऐसा भावनात्मक और गरिमापूर्ण तलाक का केस भारत के कोर्ट में बहुत कम देखने को मिलता है।
@khanrubyansar Thanku ma'am आप मेरी प्रेरणास्रोत रही, जन शताब्द�� ट्रेन में संयोग से आपसे मिलना और मुझे मार्गदर्शन प्रदान कर���ा मेरी RAS की तैयारी में महत्वपूर्ण रहा, मेरी रैंक आपके जितनी तो नहीं है लेकिन 98 रैंक के साथ सफलता प्राप्त की है ☺ thank you so much❤🙏🙏
.@UNESCO conferred the World Heritage tag to the Ramappa temple. The Ramappa temple probably is the only temple in India known by the name of sculptor who built it. The temple was built on the behalf of king Kakati Ganpathi Deva by his chief commander Rudra Samani. #AmritMahotsav