Part. 12
अपने अन्तरंग-ध्यान में पन्थ, पार्टी, देश, धर्म, डिग्री, नेतापद, साहबपद, स्वामीपद, या महन्तपद की कोई बाधा मत मानों। ध्यान करो। यदि तुम मण्डलेश्वर भी हो तो भी ध्यान करो। अपने पद को ध्यान में बाधा मत समझो। जिस पद से ध्यान में बाधा आती है, उस अल्प-पद का क्या प्रयोजन? बालक हो या बालिका, नर हो या नारी, ब्रह्मचारी हो या गृहस्थ, वानप्रस्थी हो या संन्यासी, ध्यान करो। अपने को खोजो। वह मिल जायेगा। घर में रहते हो तो घर में, वन में रहते हो तो वन में, शहर में रहते हो तो शहर में, ग्राम में रहते हो तो ग्राम में, अथवा जहाँ कहीं भी रहते हो वहाँ आत्मा का ध्यान करो। चाहे तुम रोगी हो या डॉक्टर, आरोपी हो या वकील, दरिद्री भिखारी हो या धनवान सेठ, सब ध्यान करो। गुणवान हो, गुणहीन हो, पुण्यात्मा हो, पुण्यहीन हो, ध्यान करो, आत्मशान्ति पाओगे। तुम्हारी इन्द्रियों की पंच विषयों की खोज से ले कर, कला, काव्य, नर्तन एवं जीवन्मुक्ति की खोज ध्यान में ही है।
जब ध्यान करते-करते तुम्हारी छिपी हुई अन्तर-शक्ति का भण्डार खुल
जायेगा, तब शीघ्र ही उच्चतर ध्यान होने लगेगा। तदनन्तर तुम्हारा 'रूप' खुल जायेगा। तुम्हारे अन्दर कैसी-कैसी दिव्य ज्योतियाँ हैं, इसका ज्ञान होगा। इन ज्योतियों के होने पर ही तुम्हारा माँसमय शरीर रूपवान बनता है, इनके आकर्षण से ही तुम्हें परस्पर प्रेम की अनुभूति होती है। ध्यान करते-करते दिव्य जगमगाती ज्योति के उदय होने पर तुम्हारी संसार की पहली इच्छा 'रूप' की प्राप्ति होगी; वह प्यारा रूप तुम्हें प्राप्त होगा। जिस ज्योति के सामने मन्मथ का रूप भी फीका है, ऐसी ज्योति पति-पत्नी को एक दूसरे में चमकाती हुई दिखेगी। रूप खुलते ही संसार में तुम्हें अपनी एक प्रिय चीज़ मिल जायेगी। संसार तेजोमय दीखना शुरू होगा।
रूप खुलते ही उसके मित्र, 'शब्द' का भी उदय होगा। शब्द के उदय होते ही तुम मधुर, दिव्य संगीत सुनोगे। मस्तक में अनन्त गुणों का भण्डाररूप नाद उदित होगा। उस शब्द के सुनने से सुखप्रद निद्रा आयेगी। ऐसी निद्रा को देवता ही भोगते हैं। उस संगीत शब्द को सुन कर तुम नृत्य करोगे। तुम्हारी पहले की उदासीनता, निरुत्साह, मानसिक ताप और मनमाने सोच-विचार की बीमारी भी चली जायेगी। उस शब्द से तुम्हें अपना संसार हराभरा दिखायी देगा। अरे संसार के यात्रियो ! शब्द के उदय होते ही तुम्हें रेडियो का संगीत फीका, चारों ओर की ख़बरें फीकी और आपस के वार्तालाप भी फीके लगेंगे। तुम रेडियो-ट्रांजिस्टर और टेलीविज़न के ख़र्च से बच जाओगे।
इतना ही नहीं, वह शब्द एक दिव्य 'रस' का स्वाद करायेगा। वह रस शब्द से निकलनेवाला, तुम्हारे अन्दर तालू से प्राप्त होनेवाला, सुन्दर रस है। मधुरातिमधुर है। एक-एक बिन्दु कई कोटि रुपये के मोल का है। संसारियों के प्यार करने योग्य है। इस रस को पा कर तुम्हारे अन्दर के सब रोग मिट जायेंगे और तुम स्वयं रसवान बन जाओगे। तदनन्तर तुम्हें रूखा-सूखा, कच्चा-पक्का, सब चीज़ों के खाने-पीने में सब रस मिलेगा। ताप मिटेगा। चाह घटेगी। मैं-मेरी मिटेगी। स्वयं अमृतरसरूप बन जाओगे। तदनन्तर पति- पत्नी में, बाल-बच्चों में तुमको प्रेमरस प्राप्त होगा। रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति - रस पाते ही रसमय होते ही, तुम्हें अपने में आनन्द की अनुभूति होगी। वह देवरस, वही प्रेमरस, वही योगरस, और वही संसार में तुम्हारी खोज का रस है। उस रस के बिना तुम्हारा जीवन नीरस है, शुष्क है, भूसामात्र है। अरे! जो संसार अभी रसहीन है, वह रसमय होगा और उसके साथ तुम्हारा अपना संसार सुखमय बनेगा।
अरे भाइयो! वहाँ 'गन्ध' भी है। जहाँ रूप-रस-शब्द ये तीन हैं, वहीं उनका चौथा भाई गन्ध है। मनुष्य के अन्दर जो सुन्दर गन्ध है, उसके प्रकट होते ही सारा संसार सुगन्धित होगा। सारे घर में वह गन्ध फैल जायेगी। तुम परस्पर एक दूसरे में इस दिव्य गन्ध को सूँघोगे तो चित्त शान्त हो जायेगा। शरीर की जड़ता व प्रमाद चला जायेगा ! अंग प्रत्यंग में स्फूर्ति आयेगी। फिर संसार में कुछ कमी रहने से भी तुमको पूर्णता की अनुभूति होगी। तुमको स्वजनों, बाल-बच्चों और गुरुजनों के प्रति दिव्य प्रेम स्फुरित होगा। उस समय तुम ऐसा गीत गाओगे कि संसार में ही प्रेमभरी पूर्ण समता है।
हे मनुष्य, तुम्हारी पाँचवीं खोज स्पर्श की है। तुम उसकी खातिर बहुत तपे। तुमने स्पर्श में सुख, शान्ति और आनन्द को चाहा। शृंगार की हुई पत्नी में तुमने उसे खोजा, लेकिन वहाँ केवल तप्त गर्मी ही मिली। तुम पत्नी को स्पर्श करते हो पूर्ण आनन्द के लिए, परन्तु पाते हो पूर्ण क्षोभ ! तुम्हें कभी आनन्द नहीं मिला। परन्तु जब मनुष्य की अन्तर-शक्ति खुलती है, तब महाशक्ति कुण्डलिनी का प्रेमप्रवाह सर्व अंगों में और बहत्तर हज़ार नाड़ियों में व्याप्त हो जाता है।
Parta. 11
तू संसार में रूप को चारों ओर ढूँढ़ता है, पर नहीं मिलता और थक जाता है। तू सिनेमा-नाटक में आनन्द ढूँढ़ता है, देश-विदेश में उसके लिए घूमता है, पर नहीं मिलता। आख़िर होता क्या है-रूप ढूँढ़ते-ढूँढ़ते तू स्वयं अपना रूप गवाँ देता है; कुरूप बनता है; और जब आनन्द ढूँढ़ता है, तब कष्ट और श्रम मिलता है। अब बता, तेरी इस खोज में कितनी यथार्थता है?
और भी बता ! तूने तरह-तरह के अन्नों में रस को ढूँढ़ा-चाय में ढूँढ़ा, कॉफी में ढूँढ़ा, कोका-कोला में ढूँढ़ा, खीर में ढूँढ़ा। उसके लिए होटल गया, क्लब गया, पर वास्तव में तुझे क्या मिला? उसे खोजने में तू स्वयं बेरस हो गया। तेरा मुख सूख गया, पैसे समाप्त हो गये। रस के बजाय रोग तेरे पास आये और जीवन चला गया। तूने अनेक प्रकार के रसयुक्त अन्न पकाते-पकाते, उनको खाते-खाते अपने ही रस को नष्ट कर दिया। जो रस पहले था, वह भी चला गया। हृदय में जो सच्चा, आनन्दमय, विमल, अनमोल रस था, उसे नहीं पाया।
गन्ध की खोज भी तेरी ऐसी ही निकली। नये-नये इत्रों में, सुगन्धित पुष्पों में और पैरिस के 'पात्रा' सेन्ट में भी तूने रमण के लिए गन्ध ढूँढ़ी और लगायी। सुगन्ध ढूँढ़ते-ढूँढ़ते बुढ़ापा आया। अन्त में दुर्गन्ध ही प्राप्त हुई। अरे जीवात्मा! ज़रा ध्यान करके देख, भृकुटी और नाक के संगम स्थान पर अनुपम सुगन्ध है। भाई ! वहाँ दुर्गन्ध भी सुगन्ध बन जाती है। वहाँ जीवात्मा परमानन्दमय बनता है।
फिर शब्द की खातिर भी तूने बहुत किया। 'सभी मुझे अच्छे शब्दों से पुकारें' ऐसी आशा रखी। शब्द की खातिर न जानें कितने जनों को तूने रिझाया, कितने जनों को फुसलाया। समाचारपत्र में देखा कि अपने विषय में क्या लिखा है? अपनी कितनी प्रशंसा की गयी है? पैसा दे कर गुप्त रूप से एक पुस्तक लिखवायी किसी ने खरीदी नहीं तो मुफ़्त में बाँटी। प्रशंसा के शब्द सुनने को कितना पागल बना! पति ने क्या कहा? पत्नी क्या कहती है? बाबा या किसी और ने क्या कहा? सभा में अपने विषय में क्या कहा गया ? अच्छे शब्द सुन कर तू खुश तो हुआ पर असली आनन्द नहीं मिला और न ही तन में मस्ती आयी। मुख पर तेज की किरण भी नहीं चमकी। शब्द की खातिर तूने अच्छा संगीत सुना, राग-रागिनियाँ सीखीं, फिर भी अन्तर की प्रेम- कली नहीं खिली। जिस शब्द को सुन कर सन्तजन कहते हैं, सोऽहम् शब्दाचि ठायी पहुडत झालो, "सोऽहम् शब्द में मैंने विश्रान्ति पायी", वह शब्द नहीं सुना। आख़िर वह शब्द खोया। अरे जीवात्मा! तू कहाँ जा रहा है? सब सुना, लेकिन गुरुमुखी एक ऐसा शब्द नहीं सुना, जिस शब्द से अमर रस का पीना होता है, जिस शब्द से सारे संसार में नये चैतन्य की चमक चमकने लगती है।
अब स्पर्शसुख को देख, उसके लिए तू पूर्ण पागल बना। गद्दी में देखा, नहीं मिला। कपड़े में देखा, नहीं पाया। फूलों की शय्या में देखा, उसमें भी नहीं मिला। मख़मल के वस्त्रों में खोजा, पर नहीं पाया। जहाँ स्पर्श है ही नहीं, वहाँ भी ढूँढ़ा। स्पर्श को ढूँढ़ते ढूँढ़ते तेरे जैसी ही एक मानव आकृति को पा कर उसमें स्पर्शसुख खोजा, लेकिन वहाँ भी वह नहीं मिला। उसका स्पर्श भी सुखद नहीं हुआ। स्पर्शसुख को प्राप्त करने के लिए अनेक प्रयत्न करते-करते तेरी स्पर्शेन्द्रिय जड़ हो गयी, लगभग पूरी आयु उसी में लग गयी, लेकिन कुछ नहीं मिला। हे कर्महीन ! यदि तेरी अन्तर-शक्ति जाग जाती तो परमानन्दमयी पराशक्ति तेरे सर्वांग में क्रियारूप से व्याप्त हो जाती, अरे! तू स्वयं ही स्पर्श का सुखद समुद्र बन जाता।
मुक्तानन्द कहता है-अरे जनो! तुम इन्द्रियों के जिन प्रिय विषयों को संसार में ढूँढ़ते रहे हो, उनके लिए ही ध्यान करो। वे सब तुम्हारे अन्दर हैं, तुम्हें मिल जायेंगे। तुम्हारा संसार पूरा रसमय बन जायेगा, तुम्हारा जीना स्वर्गमय हो जायेगा। परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा अन्तर-शक्ति जग जाने पर तुम्हारा ध्यान होने लगेगा। अपनी शक्ति पर प्रेम रखो और अपने आत्मभाव का आदर करो। अपने अन्दर ध्यान करो। अन्दर की जिस शक्ति के बल पर तुम 'तुम' कहलाते हो, उसका ध्यान करो। उस शक्ति का ध्यान करो जिसके कारण तुम पति-पत्नी रूप में एक दूसरे से प्रेम करके आत्मसमर्पण करते हो। तुम दोनों में, तुम्हारे ही रूप में, वह पारमेश्वरी अनुग्राहिका शक्ति रहती है। मुक्तानन्द की आराध्या पारमेश्वरी शक्ति भी वही है।
तुम किसी भी पन्थ के क्यों न हो, आत्म-ध्यान करने की किसी भी पन्थ में मनाही नहीं है, अतः ध्यान करो। हे नर-नारियो ! तुम किसी जाति के क्यों न हो, अपने अन्तर की पराशक्ति का ध्यान करो। किसी देश के क्यों न हो, अपनी आत्मशक्ति का ध्यान करो। अरी भोली जनता! तुम किसी भी पार्टी की क्यों न हो, तुम्हारा अपना ध्यान-साधन पार्टी में विघ्न नहीं होगा।
आधि' (मानसिक तनाव), 'व्याधि' (शारीरिक रोग) और 'उपाधि' (अहंकार व पद का मोह)...
ये तीनों ही मनुष्य को जीवनभर भटकाते हैं पार्थ!
जब तक इन तीनों का त्याग कर व्यक्ति 'राधा नाम' की शरण में नहीं जाता,
तब तक परम शांति मिलना असंभव है..!
जय श्री राम
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॥ राधा नाम शरणम् ॥
कोई हमारा बुरा करे ये उसका कर्म है पार्थ,
हम किसी का बुरा ना करें ये हमारा धर्म है पार्थ..!
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मुश्किलों से डरकर कभी रुकना नहीं,
गिरो तो उठना, मगर झुकना नहीं।
वक्त बदलेगा, ये भरोसा रखना,
मेहनत की राह में कभी थकना नहीं।
जयतु सनातन हर हर महादेव जय श्री राम 🙏
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Part 6
आमुख
मैं सिद्धमार्ग का एक अनुयायी हूँ। सिद्धकृपा से जी रहा हूँ। मेरा जीना, मेरा खाना, मेरा स्नान, मेरा ध्यान, मेरा मन्त्र, मेरा प्राण, मेरी प्राप्ति, मेरा मोक्ष-धर्म और अधिक क्या कहूँ, मेरी विश्रान्ति सिद्धकृपा है।
परात्पर श्री गुरु, पूर्ण सिद्धयोगेश्वर, सिद्धलोक के वासी भगवान नित्यानन्द, मुक्तानन्द के परम-आराध्य देवता और उसकी अन्तर आत्मा हैं। उनके कृपाप्रसाद से मैं जी रहा हूँ। उनकी कृपाशक्ति 'पारमेश्वरी अनुग्राहिका शक्ति' मेरे सर्वांग में व्याप्त हो कर मेरे हृदय में अपना घर बना कर रही है।
संसार की जनता में कोई भी ऐसा न समझे कि शुष्क, रसहीन भोग अपने लिए हैं और योग एवं ध्यान, ये सब विरक्त साधुजनों के लिए हैं। संसारीजन अपने सभी व्यवहारों के साथ-साथ सिद्धयोग का पूर्ण अभ्यास सहज में कर सकते हैं। संसार में सिद्धविद्या के उपासक बहुत हैं। पूर्वकाल में अनेकानेक गृहस्थाश्रमी जन सिद्धविद्या के पुजारी थे, जो संसार में ही रह कर संसार और परमार्थ, दोनों का पूरा आचरण करके आदर्श नर-नारी बने।
यह मार्ग सभी के लिए खुला है। प्रत्येक पुरुष और नारी में एक दिव्यात्मशक्ति है जिसके बारे में शिव संहिता में ऐसा कहा गया है :
मूलाधारस्थ वह्नयात्मतेजो मध्ये व्यवस्थिता । जीवशक्तिः कुण्डलाख्या प्राणाकाराथ तेजसी ॥ महाकुण्डलिनी प्रोक्ता परब्रह्मस्वरूपिणी ॥ शब्दब्रह्ममयी देवी एकानेकाक्षराकृतिः ।
शक्ति कुण्डलिनी नाम विसतन्तुनिभा शुभा ॥
अर्थात्, यह शक्ति परब्रह्मस्वरूपिणी महादेवी है। इसे लोग कुण्डलिनी के नाम से पुकारते हैं, जो मूलाधार कमल के गर्भ में मृणाल नलिका के समान निहित है। वह कुण्डल आकार में रहती है। वह स्वर्ण कान्तियुक्त, तेजोमय है। वह परशिव की परम निर्भय शक्ति है। वही नर या नारी में जीवरूपिणी शक्ति है। वह प्राणरूप है। इससे अकार से ले कर क्षकार तक सभी वर्णों का उदय होता है। मानव अपनी उस अन्तरंग शक्ति को जान कर संसार में हुए उसका उपयोग कर सके इसी उद्देश्य से मैं शक्ति का वर्णन कर रहा हूँ। कुण्डलिनी प्रणवस्वरूपा है। उस पारमेश्वरी कुण्डलिनी शक्ति के जग जाने पर जो संसार रूखा-सूखा, रसहीन, असन्तोषयुक्त दिखता है वही रसवान, हराभरा, पूर्ण सन्तोषरूपी बन जाता है।
जो आह्लादिनी विश्वविकासिनी, पारमेश्वरी शक्ति है जो चिति भगवती है वही कुल-कुण्डलिनी है। वह कुण्डलाकार में मूलाधार में स्थित हो कर हमारे सर्वांग के व्यवहारों को नियमबद्ध करती है। वह श्री गुरुकृपा द्वारा जाग कर सर्वांगसहित मानव के इस संसार को उसके अदृष्टानुरूप विकसित करके संसार के जनों में एक दूसरे के प्रति परम मैत्रीपूर्ण 'परस्पर देवो भव' की भावना का उदय करते हुए, संसार को स्वर्गमय बनाती है। संसार में जो कुछ भी अपूर्ण है, उसे पूर्ण करती है।
यह पारमेश्वरी शक्ति जिस पुरुष में अनुग्रहरूप से प्रवेश करती है, उसका कायापलट हो जाता है। अपनी अन्तर-शक्ति की व्याप्ति का पूर्ण ज्ञान हो जाने पर ऐसे पुरुष का अपनी प्रिय पत्नी में पूर्ण प्रेम और स्वार्थरहित स्नेह-सम्बन्ध हो जाता है। पत्नी नारी नहीं, पारमेश्वरी कुण्डलिनी है ऐसे ज्ञान का उदय होता है। पति के प्रति पत्नी में चिति भाव प्रकट होने पर उसके हृदय में पूर्ण श्रद्धा, सेवाभाव और आत्यन्तिक स्नेह का उदय हो जाता है। इतना ही नहीं, इसके प्रभाव से पति मानव नहीं, परमेश्वरस्वरूप है ऐसा पूर्णज्ञान हो जाता है। वह गुरुकृपाशक्ति जिस माता में प्रविष्ट होती है उसका सारा संसार आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। इस शक्ति का प्रभाव माताओं में व्याप्त होने से उन्हें अपने लड़के-लड़कियों के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है और उनको विद्या, विनय, कला-कौशल से पूर्ण करने की क्षमता आ जाती है। इस शक्तिपात रूपी परम शक्ति का अनुग्रह होते ही उनमें अपने बच्चों को परम उन्नति के पथ पर ले जाने की योग्यता आ जाती है। यह ज्ञान न कल्पित है और न केवल मुक्तानन्द का ही श्रुतिवाक्य है। रुद्रहृदयोपनिषद् का एक सत्य, प्रमाण-मन्त्र है : रुद्रो नर उमा नारी तस्मै तस्यै नमो नमः, "रुद्र नर हैं, उमा नारी हैं; उनको नमस्कार है, नमस्कार है।
ऐसा ज्ञान उदित होता है कि जो आदि-सनातन सत्य, साक्षी परमेश्वर, जगत का मूल कारण, परमाराध्य, निर्गुण, निराकार एवं अज है, वही नर है। वही मेरे पतिदेव हैं। उस परमशिव की पराशक्ति कुण्डलिनी है जिसको चिति, उमा, दुर्गा, प्रतिभा,मालती कहते हैं। उस पारमेश्वरी से जगत कार्य चलता है।वह परशिव की प्रिय रानी, अर्धांगिनी है। वही राधा, सीता, मीरा हो कर सुकन्या, आमुखगृहिणी, सती, पतिव्रता, मातृ, योगिनी, जननी आदि संज्ञाओं को धारण करती है। वही नारी है। वही मेरी पत्नी है। उन दोनों को नमस्कार है।इस प्रकार संसार के मानवों को एक नया ज्ञान हो जाता है। ऐसी श्री गुरुकृपाशक्ति को पा कर संसार स्वर्गमय बन जाता है।
5K looks good on you Anika.🫶🏼🥰But behind that number are 5K people, countless little connections, and a journey worth celebrating. @soulfulanika
Congratulations on 5K Anika. Here’s to everything you’ve created so far and all the beautiful things still ahead. Keep shining.💐🌟
Thank you so much for your warm wishes and kind words. ❤️ This milestone is truly special, and your support makes the journey even more meaningful. Grateful for your encouragement and looking forward to many more milestones ahead! ✨🙏🏻
Thanks dear❤️ this touched a place in my heart that numbers never could🥹 5K may be a milestone, bt having someone like u who stands by me makes this journey truly special🫶🏼 Thank u for being a beautiful part of my journey & for always making me feel valued.