क्या कहें यार हमें यारों ने क्या-क्या समझा
क़तरा समझा तो किसी ने हमें दरिया समझा
सब समझते रहे हमें वैसा जैसा जिसे भाया
किंतु जो हम थे वही तो न ज़माना समझा।
-गोपालदास 'नीरज'
होने थे जितने खेल मुक़द्दर के हो गये
हम टूटी नाव ले के समुंदर के हो गये।
खुशबू हमारे हाथ को छूकर गुजर गई..
हम फूल सबको बाट कर पत्थर के हो गए..
~इरफान जाफरी 🌸💚