एक गुंडा चिल्ला चिल्ला के कह रहा है कि मैंने हाफ मर्डर किया है, मैंने एक दलित का सर फोड़ा है, पुलिस कुछ नहीं उखड़ सकती मेरा।
पुलिस कह रही है कि नहीं तूने नहीं किया कोई क्राइम। तुझे नहीं पता बट तूने नहीं फोड़ा किसी का सर। तेरा कुछ कर नहीं सकते हम ये बात मत बोल पब्लिक में।
दिल्ली में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जी से सवाल पूछने की कोशिश करने पर पत्रकारों शाहीन और नफीसा को पुलिस द्वारा कथित रूप से मारते-पीटते थाने ले जाने, गाली-गलौज करने, धमकाने और उनके साथ दुर्व्यवहार किए जाने का आरोप यह बताता है कि World Press Freedom Index में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर क्यों है।
सबसे चिंताजनक यह है कि उनका कहना है कि उनके मुस्लिम होने की जानकारी मिलने के बाद उनके साथ दुर्व्यवहार और बढ़ गया यह भाजपा की मुस्लिम विरोधी मानसिकता और प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सवाल पूछना अपराध नहीं है। पत्रकार की पहचान देखकर उसके साथ भेदभाव करना लोकतंत्र और संविधान दोनों के खिलाफ है।
यह बेहद गंभीर और चिंताजनक है!
निशु, घबराने की ज़रूरत नहीं है। मैं तुम्हारे साथ हूँ।
साफ है कि तुम्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि तुम अपने समुदाय और छात्रों के हक़ की आवाज़ उठाती हो।
अमित शाह की दिल्ली पुलिस एक तरफ़ छात्रों के साथ अमानवीय बर्बरता करती है। दूसरी तरफ़ एक दलित लड़की के पिता का सिर फोड़ने वाला अपराधी खुलेआम घूम रहा है।
@narendramodi जी, @AmitShah जी - ऐसे अपराधी को आपका और आपकी पार्टी के लोगों का संरक्षण क्यों है? अब भी कार्रवाई होगी या किसी को बचाते रहेंगे?
निशु, तुम्हारी लड़ाई अकेली नहीं है। हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक न्याय नहीं मिल जाता।
जय भीम। जय संविधान।
. @DelhiPolice your incompetence is being exposed by this goon.
Your incompetence makes the existence of such men easy.
It is your incompetence to which citizens owe their fear.
23 जून को जंतर-मंतर की घटना पर पुलिस कहती है कि संजय कुमार की चोटें सामान्य थीं और खोपड़ी में दरार की बात निराधार है। लेकिन आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज के बयान में वह खुद “7 टांके”, “मरने की स्थिति” और “307 बनता था” जैसी बातें कह रहा हैं।
वह यह भी दावा कर रहा हैं कि संजय कुमार की बेटी निशु, थाने के बाहर खड़े होकर कह रही थी कि “अगर मेरे बाप को इंसाफ नहीं मिला तो हम जहर खाकर मर जाएंगे।” साथ ही उनका दावा है कि वे जेल तक नहीं गए और “कपिल मिश्रा अपने बड़े भाई हैं”, “चिराग पासवान अपने बड़े भाई हैं” तथा “सबका सपोर्ट है।"
तो सवाल है कि अगर घायल की हालत इतनी गंभीर थी और 7 टांके लगे थे, तो पुलिस की MLC में चोटें सामान्य कैसे बताई गईं? अगर धारा 307 का मामला बनता था, तो आरोपी जेल क्यों नहीं गया?
“कपिल मिश्रा के फोन के बाद छोड़ने का दावा सच है या झूठ? क्या पुलिस इसकी निष्पक्ष जांच करेगी? जब राजनीतिक संरक्षण का इतना स्पष्ट दावा सामने आ रहा है, तो पुलिस यह क्यों नहीं स्पष्ट कर रही कि इस मामले में किसी अनुचित प्रभाव या हस्तक्षेप की कोई भूमिका थी या नहीं?”
आखिर पुलिस के रिकॉर्ड और आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज के बयान में इतना बड़ा अंतर क्यों है? हमें इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और अपने पीड़ित परिवार को न्याय दिला कर रहेंगे। जय भीम, जय भारत।।
@AkashVermaCBIC@Benarasiyaa@dmballia Cycle thik h sir , lekin wo chalayegi kaise raod to sahi h nhi , road saf dikh rha h , pahle road sahi ho jaye to sahi rhega 🙌
1. दिल्ली के जंतर मंतर पर संविधान में एस.सी., एस.टी. व ओ.बी.सी. समाज को दिये गये आरक्षण के विरुद्ध अभी हाल ही में जमा हुये कुछ लोगों द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू करने की उठाई गई यह नई माँग कतई भी उचित व देशहित में नहीं है। उन्हें आरक्षण के सम्बंध में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिये जिससे समतामूलक समाज, विकसित व सम्मानित देश बनाने के संवैधानिक कार्यों को आघात पहुँचे।
2. वैसे भी देश में सदियों से जातिवाद की अमानवीयता का शिकार रहे एस.सी., एस.टी. व ओबीसी समाज के लोगों हेतु संविधान में की गई आरक्षण की व्यवस्था के बारे में परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर का यह कहना था कि ’जातिवाद का परित्याग ही सबसे बड़ी देशभक्ति है’। अतः लोग सही देशभक्ति का परिचय ज्यादा दें तो यही उचित होगा।
3. जहाँ तक आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात है, तो केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा भी ग़रीबी उन्मूलन के एक नहीं बल्कि अनेकों कार्यक्रमों पर काफी सरकारी धन हर वर्ष ख़र्च किया जाता है, किन्तु उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार आदि के कारण इसका सही लाभ अगर देश के लोगों को नहीं मिलता है तो यह तो सरकारी व्यवस्था का सीधा-सीधा दोष है।
4. इसके अलावा, आर्थिक आधार पर आरक्षण की नई व्यवस्था भी देश में लागू है, जिसका भी सही लाभ अपरकास्ट समाज के ग़रीब परिवारों को नहीं मिल पा रहा है बल्कि इसमें छलावा अधिक है।
5. वास्तव में ख़ासकर यही वह भ्रष्ट व जातिवादी सरकारी व्यवस्था है जिसने आरक्षण के संवैधानिक रचनात्मक प्रावधान को कभी सही से ज़मीन पर लागू ही नहीं होने दिया है, जिस कारण एससी, एसटी व ओबीसी समाज के लोग, आज़ादी के इतने लम्बे अरसे के बाद आज तक भी, ग़रीबी, जातिवादी द्वेष, शोषण, अत्याचार व जातिवाद के ज़हर का दंश हर दिन हर स्तर पर लगातार झेलते रहते हैं।
6. अतः सभी सरकारें भी आरक्षण विरोधी तत्वों को शरण व संरक्षण बिल्कुल भी ना दें तो यह व्यापक देश व जनहित में होगा। लोगों से भी अपील है कि वे आरक्षण जैसे अहम् एवं संवेदनशील मुद्दे पर सस्ती राजनीति ना करें और ना ही होने दें।
7. हालाँकि उसी ही दिन पार्लियामेन्ट थाना के बाहर एक पीड़ित व्यक्ति के मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री राहुल गाँधी कई घन्टों तक धरने पर बैठे रहे, जिसका पार्टी को कोई ऐतराज़ नहीं है।
ऽ लेकिन उसके बग़ल में जंतर-मंतर पर दलित व शोषितों के जातीय आधार पर दिये जाने वाले आरक्षण को ख़त्म करवाने के लिए धरना-प्रदर्शन भी चल रहा था, वहाँ पर वे व उनका कोई भी कांग्रेसी साथी उन्हें समझाने तक के लिये भी नहीं गये, जिससे इन वर्गों के प्रति इनकी आरक्षण विरोधी मानसिकता अभी भी साफ झलकती है।
अभिनव पांडे को पीड़ा है कि 60 साल से आरक्षण क्यों लागू है। झूठ भी फैला रहे हैं कि बाबासाहेब ने इसे केवल 10 साल के लिए लागू किया था। किस शाखा से पढ़े हो, जनाब?
आज मार्केट में जितने भी ब्राह्मण सेक्युलर पत्रकार घूम रहे हैं, वे हमेशा से RSS की पूंछ पकड़ने वाले एजेंट ही रहे हैं।
अब देखो इस मूर्ख को ..
इसका लॉजिक ये है, दवाई बंद कर दो तो बीमारी भी खत्म हो जाएगी। 😅😅😅
अरे जातिवाद की बीमारी की वैक्सीन है आरक्षण, और तुम जैसे जातिवादी उसके विषाणु। जब तक तुम जैसे वायरस रहेंगे, जाति और जातिवादी रहेंगे ये वैक्सीन भी काम करती रहेगी।
प्रमुख मेडिकल ब्लंडर (मेडिकल नेग्लिजेंस) के मामले जिनमे डॉक्टर ने अपनी अयोग्यता से मरीज़ की जान ले ली या उसे और बीमार कर दिया आप इनके नाम पढ़े और बताए ये किस जाति वर्ग के थे:
१-डॉ. सुकुमार मुखर्जी (AMRI Hospital, कोलकाता)- अनुराधा साहा के इलाज में गलत दवा/अत्यधिक स्टेरॉयड देने और लापरवाही के आरोप लगे। यह भारत का सबसे चर्चित मेडिकल नेग्लिजेंस केस बना और सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित परिवार को रिकॉर्ड मुआवज़ा दिलाया।
२-डॉ. राजीव लोचन (आशीर्वाद नर्सिंग होम, अलीगढ़)- 2012 में ऑपरेशन के दौरान बीमार दाहिनी किडनी की जगह स्वस्थ बाईं किडनी निकाल दी गई। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए ₹2 करोड़ का मुआवज़ा देने का आदेश दिया।
३-डॉ. लक्ष्मण बालकृष्ण जोशी- मरीज की सही जांच और देखभाल न करने के आरोप वाला ऐतिहासिक मामला। सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों के “ड्यूटी ऑफ केयर” के सिद्धांत को स्पष्ट किया।
इसके अलावा :
४- डॉ. एम. एल. शर्मा -MCI द्वारा 1 वर्ष का निलंबन।
५- डॉ. गौरव बंसल -MCI द्वारा 1 वर्ष का निलंबन।
६- डॉ. अलका गोयल -MCI द्वारा 3 माह का निलंबन।
७- डॉ. मनोज ढींगरा -MCI द्वारा 1 वर्ष का निलंबन।
और भी लंबी लिस्ट है, इसमें 90 % ज़्यादा मेरिटधारी जाति के है, फिर भी ये ग़लत इलाज़ करने पर जेल गए, लाइसेंस कैंसिल हुए। इससे पता लगता है आरक्षण के नाम पर जो डॉक्टर की योग्यता पर सवाल उठा रहे वो सब फर्जी और धूर्त है।
एक ही जाति को मंदिर में जन्मजात आरक्षण देकर सारे मंदिर लूट लिए। हर रोज़ कहीं राम मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर, बद्रीनाथ, केदारनाथ, मथुरा …से करोड़ो की लूट की खबरे आ रही है। इसमें लूटने वाले 95% एक ही जाति के है। वहाँ राष्ट्र और धर्म और संस्कृति और लोगो की आस्था को बेच खाने वाले लोगो से देश को नुक़सान नहीं हुआ, लेकिन किसी दलित को आरक्षण की वजह से किसी ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई तो उससे देश को ख़तरा हो गया ?
उसके लिए किसी वैद्य को बुला लिया करो डॉ साहब, या फिर दिन भर मेडिकल साइंस को गाली देने वाले बाबा रामदेव को दिखा दिया करो भगवान का इलाज करने के लिए। वैसे भी उनके समय में तो वैद्य और आयुर्वेद ही थे, वो अनुष्ठान के लिए सही रहेगा।
इससे दुनिया भर में मज़ाक बनता है, डॉक्टर का भी और भगवान का भी। आप बोल रहे ये प्रतीक़ात्मक है ये, बिल्कुल सही कहा आपने पर आप ये नहीं समझ पा रहे किसका प्रतीक है, ये असल में धार्मिक पाखंड के सामने मेडिकल साइंस के डॉक्टर मानसिक गुलाम है इस बात का प्रतीक बनाया गया है। उनको पता है वैद्य से वो प्रभाव नहीं पड़ेगा, जब एक पढ़े लिखे सम्मानित व्यक्ति को पाखंड करवायेंगे तो ज़्यादा लोग कनेक्ट करेंगे, प्रभाव पड़ेगा।