विशुद्ध प्रेम - एक संन्यासी की डायरी (१)
संन्यास लेने के बाद समझ आया-
प्रेम का विपरीत
विरक्ति नहीं है।
स्वार्थ है।
जहाँ स्वार्थ समाप्त होता है,
वहीं प्रेम अपना पहला कदम रखता है।
और जहाँ प्रेम पूर्ण होता है,
वहाँ "मैं" धीरे-धीरे विलीन होने लगता है।
|| ॐ नमो नारायण ||
#अतरंगी_ख़्याल
इंडियन एक्सप्रेस का यह बोल्ड विज्ञापन इनके कई ब्रेकिंग न्यूज़ से भी अधिक असरदार है।
दुखद है। लेकिन किसी मीडिया हाउस को सामने आकर न्यूज़ चैनल को सीधे ऐसा बोलना था। आईना दिखाना था कि उन्होंने कैसे ज़हर फैलाया है। समाज को तोड़ा है एक्सप्रेस ने हिम्मत दिखाई।
▶️ शरीर का विज्ञान
आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में जठराग्नि अपेक्षाकृत मंद रहती है। वातावरण की आर्द्रता, जल की गुणवत्ता और ऋतु परिवर्तन पाचन पर प्रभाव डालते हैं।
इसी कारण चतुर्मास में भोजन-संयम की परंपरा विकसित हुई।
श्रावण में पत्तेदार सब्जियों से संयम, भाद्रपद में दही का त्याग, आश्विन में दूध का सीमित सेवन और कार्तिक में तामसिक भोजन से दूरी-इन सबका उद्देश्य शरीर को दंड देना नहीं, बल्कि उसे ऋतु के अनुरूप बनाना है।
संयम का अर्थ अभाव नहीं, संतुलन है।
@Atrngiikhyaal आज का मनुष्य केवल प्रशंसा सुनना चाहता है। कोई उसकी भूल बता दे तो उसे अपमान लग जाता है। लेकिन साधना का पहला चरण ही है-अपने अज्ञान को पहचानना। ✨ स्वाधीनता..
प्रकरण १७ : विद्योत्तमा - स्वाभिमान और महाकवि की प्रेरणा
श्रृंखला के इस सप्तदश प्रकरण में हम संस्कृत साहित्य की उस प्रसिद्ध परंपरा में प्रवेश करते हैं, जहाँ एक विदुषी के स्वाभिमान, सत्य के प्रति अडिग आग्रह और कठोर वचन ने भारतीय साहित्य की दिशा बदल दी। यह कथा इतिहास की अपेक्षा लोकपरंपरा में अधिक प्रसिद्ध है, किंतु उसका सांस्कृतिक प्रभाव अत्यंत व्यापक रहा है। कहा जाता है कि एक विदुषी के धिक्कार ने एक साधारण युवक को तपस्या के मार्ग पर भेजा और वही आगे चलकर संस्कृत का अमर महाकवि कालिदास बना। वे थीं-विदुषी विद्योत्तमा।
१. साहित्यिक एवं पारंपरिक संदर्भ
विद्योत्तमा का उल्लेख कालिदास से जुड़ी प्राचीन जनश्रुतियों और परवर्ती संस्कृत आख्यानों में मिलता है। उन्हें अत्यंत विदुषी, तर्कशास्त्र और दर्शन में निपुण राजकुमारी के रूप में स्मरण किया जाता है। उनके व्यक्तित्व से यह स्पष्ट होता है कि उस समय स्त्रियाँ भी शास्त्रार्थ और बौद्धिक विमर्श में अग्रणी स्थान रखती थीं।
२. शास्त्रार्थ और छल
विद्योत्तमा ने प्रण किया था कि वे उसी पुरुष से विवाह करेंगी जो उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित कर सके। अनेक प्रतिष्ठित विद्वान उनके सामने आए, परंतु सभी पराजित हुए। अपमानित पंडितों ने प्रतिशोधवश एक अल्पबुद्धि युवक को विद्वान बनाकर राजसभा में प्रस्तुत किया।
सभा में संकेतों द्वारा संवाद हुआ। युवक संकेतों का अर्थ नहीं समझ रहा था, पर साथ आए पंडित हर संकेत की गूढ़ दार्शनिक व्याख्या कर देते। अंततः विद्योत्तमा ने उसे विजयी मान लिया और विवाह संपन्न हुआ।
३. सत्य का उद्घाटन
विवाह के पश्चात् विद्योत्तमा को ज्ञात हुआ कि उनके साथ छल किया गया है। उन्हें सबसे अधिक पीड़ा इस बात की हुई कि ज्ञान का उपहास बनाया गया।
उन्होंने युवक से स्पष्ट कहा-
"जब तक वास्तविक विद्या प्राप्त न कर लो, इस महल में लौटकर मत आना।"
लोकपरंपरा में यह भी प्रसिद्ध है कि उनके मुख से निकला-
"अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः।"
यही वाक्य युवक के जीवन का निर्णायक मोड़ बना। वह तपस्या और अध्ययन के लिए निकल पड़ा। वर्षों बाद वही कालिदास के रूप में लौटा। परंपरा यह भी कहती है कि उन्होंने अपनी तीन महान कृतियों का आरम्भ "अस्ति", "कश्चित्" और "वाग्" शब्दों से कर अपनी कृतज्ञता प्रकट की।
४. विद्योत्तमा की महानता
विद्योत्तमा केवल एक विदुषी नहीं थीं; वे ज्ञान की गरिमा की प्रतीक थीं। उन्होंने छल के साथ समझौता नहीं किया और न ही अज्ञान को प्रतिष्ठा का स्थान दिया। उनका कठोर निर्णय किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि अज्ञान और पाखंड के विरुद्ध था।
यही कारण है कि भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में वे उस शक्ति के रूप में स्मरण की जाती हैं, जिसने एक सुप्त प्रतिभा को जागृत करने का कार्य किया।
दार्शनिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व
विद्योत्तमा का आचरण-उसका तात्त्विक महत्त्व
•शास्त्रार्थ का प्रण- ज्ञान को वंश, रूप और वैभव से ऊपर रखना।
• छल का विरोध- बौद्धिक ईमानदारी की प्रतिष्ठा।
• कठोर प्रेरणा- आत्मबोध द्वारा प्रतिभा का जागरण।
• कालिदास से जुड़ी परंपरा- गुरु-शक्ति और पुरुषार्थ के महत्व का प्रतीक।
🌿 संन्यासी अतरंगी चिंतन : धिक्कार भी कृपा हो सकता है
आज का मनुष्य केवल प्रशंसा सुनना चाहता है। कोई उसकी भूल बता दे तो उसे अपमान लग जाता है। लेकिन साधना का पहला चरण ही है-अपने अज्ञान को पहचानना।
कालिदास के जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन तब आया जब उन्हें अपनी सीमाओं का बोध हुआ। विद्योत्तमा ने उन्हें सांत्वना नहीं दी, बल्कि कठोर सत्य के सामने खड़ा कर दिया। कभी-कभी गुरु की डाँट, जीवन की सबसे बड़ी कृपा होती है।
संन्यासी जानता है कि जीवन में मिलने वाला हर धक्का विनाश नहीं होता। कई बार वही धक्का भीतर सोई हुई चेतना को जगा देता है। संसार जिसे अपमान कहता है, साधक उसे अवसर बना लेता है।
विद्योत्तमा हमें सिखाती हैं कि प्रतिभा केवल जन्म से नहीं आती; वह पुरुषार्थ, तप और सत्य को स्वीकार करने के साहस से जन्म लेती है। यदि भीतर सीखने की विनम्रता हो, तो एक कठोर वचन भी महाकाव्य रचवा सकता है।
|| इति सप्तदशः प्रकरणः ||
|| ॐ नमो नारायण ||
@adityar53209713@souravreporter2 आपकी बात सही है कि डेलिगेटेड लेजिस्लेशन प्रशासनिक दक्षता के लिए अनिवार्य है। लेकिन नीतिगत परिणामों की नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी अंततः उन मंत्रियों की ही होनी चाहिए जिन्हें जनता ने चुनकर भेजा है....
Prashant Kishor बिहार की राजनीति में आ चुके हैं, विधायक बनने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं !
अगर Prashant Kishor पटना के बांकीपुर क्षेत्र से हारते हैं, उनकी सबसे बड़ी हार यही होगी।
क्योंकि सबसे पढ़ा-लिखा एरिया है, स्वर्ण समाज की संख्या ज्यादा है। यहां पर आरोप भी नहीं लगा सकते हैं कि ₹10000 में वोट बेच दिया, क्योंकि यहां सब ₹10000 रोज खर्च करने वाले, लुटाने वाले लोग हैं ,,
अब Prashant Kishor की अग्नि परीक्षा है। अगर यहां हार गए, तब बिहार के किसी कोने में जीतना संभव नहीं है।
BJP 35 साल से बांकीपुर क्षेत्र जीतता आ रहा है। जीतने का मार्जिन हमेशा वही रहता है, 40000 से 60000 वोट। BJP इस समय सबसे खराब दौर से गुजर रहा है ,,
अगर ऐसे समय में बांकीपुर क्षेत्र में BJP फिर जीत जाता है, तब समझ लेना BJP कुछ भी करे, लोग BJP को ही वोट देंगे ,,
जिस तरह से BJP का मुख्यमंत्री बिहार में काम कर रहा है, बिहार के लोग परेशान हैं। एनकाउंटर हो, टैक्स हो, हिंदू-हिंदू करने वाली पार्टी चंदा चोरी पर कुछ नहीं बोल रही है।
अब देखना है, ऐसे माहौल में लोग BJP को वोट करते हैं या Prashant Kishor की तरफ जाते हैं।
Prashant Kishor के लिए गोल्डन अपॉर्च्युनिटी है। थाली में परोस कर जीत दिया हुआ है, अब लेना कैसे है, उनको संभालना है।
लेकिन BJP बांकीपुर क्षेत्र को छोड़ने वाला नहीं है। Nitin Navin BJP के प्रेसिडेंट बन चुके हैं, ऐसे में वह क्षेत्र BJP हारना नहीं चाहेगा।
पहली बार बांकीपुर में फाइट नजर आ रही है।
अगर Prashant Kishor बिहार विधानसभा में जीतकर जाते हैं, वहां का माहौल अलग हो जाएगा। एक सही से मुद्दा उठाने वाला विधानसभा में मौजूद रहेगा, जो बहुत लोगों पर भारी रहेगा ,,
और Prashant Kishor के जीत जाने से बिहार जिस तीसरे पार्टी को ढूंढ रहा था, वह मिल जाएगा। RJD, JDU, BJP से छुटकारा पा सकता है।
आपको क्या लगता है, Prashant Kishor कुछ करके विधायक बनकर विधानसभा में जाना चाहिए..?
क्योकी तेजस्वी यादव बिहार में चुनाव से 6 महीने पहले आते हैं बाकी उनको मतलब नहीं है पार्ट टाइम राजनीति कर रहे हैं !
@souravreporter2 दक्षिण भारत के राज्यों में भी नियम यही है कि नीतिगत फैसले मंत्रियों को खुद लेने होते हैं और अधिकारी (सचिव) केवल बैक-एंड सपोर्ट या मंत्रियों की मदद के लिए उपलब्ध रहते हैं, न कि बैठक में सीधे हिस्सा लेने के लिए।
@souravreporter2 कई बार मंत्री प्रशासनिक बारीकियों को न समझकर पूरी तरह सचिवों की बातों पर ही हां मिला देते हैं। सचिवों के बाहर रहने से नीतियों पर पूरी तरह राजनीतिक और जनहित के नजरिए से चर्चा हो पाएगी।
From playing in the lanes of Samastipur, Bihar, to getting a cap for the Indian team at the age of 15.
This is for history books, Jiya ho Bihar ke lala ♥️