>>> खाड़ी की जंग से पस्त अर्थव्यवस्था के बहाने कुछ विचार
चार महीने पहले तक हम अर्थव्यवस्था की मजबूती की खुशफहमी में थे कि होरमुज़ की जंग ने सपना तोड़ दिया। डॉलर के मुकाबले रुपया गिर रहा था पर उसे हम अपने निर्यात के लिये अच्छा मान रहे थे। लेकिन जंग के कारण जब कच्चा तेल सौ डॉलर पार हुआ तो अर्थशास्त्रियों की चोटी खड़ी हो गई।
होरमुज़ की जंग और डॉलर के मुकाबले रुपये की तेजी से गिरती कीमत ने अखबार अर्थशास्त्रियों के आकलन से भर डाले — चालू खाता घाटा, तेल आयात, ब्याज दरें, विदेशी पूंजी। मुझे लगा कि यह सब सही है। पर अर्थशास्त्रियों के लेख शायद कहानी पूरी नहीं कहते।
मुद्रा केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं, सामाजिक विश्वास-पत्र भी है। दुनिया यह देखती है कि यह समाज कितना भरोसेमंद, अनुशासित और उत्पादक है। भारत के बारे में वह सब दांव पर है। कठिन समय आ गया है।
भारत को महान बनाना केवल GDP बढ़ाने का प्रश्न नहीं है। यह रुपये की ताकत का भी प्रश्न है। और रुपया केवल रिज़र्व बैंक की तिजोरी में नहीं रहता; वह समाज की आदतों, निर्णयों और सार्वजनिक व्यवहार में भी रहता है।
जब एक इंजीनियर पुल बनाते समय मानक तोड़ता है, जब एक बाबू फाइल टालता है, जब अदालत वर्षों तक निर्णय नहीं देती, जब सार्वजनिक संपत्ति को “सरकारी माल” मान कर छेड़ा जाता है, तब उसका असर केवल सुविधा पर नहीं पड़ता। धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था की कार्यक्षमता घटती है। लागत बढ़ती है। समय नष्ट होता है। ऊर्जा निरर्थक घर्षण में खर्च होती है। इसकी ओर कितने लोगों का ध्यान जा रहा है?
एक आदमी का पान थूकना रुपये को नहीं गिराता। पर करोड़ों लोगों की यह मानसिकता कि “यह सार्वजनिक जगह मेरी जिम्मेदारी नहीं” — किसी भी राष्ट्र को भीतर से हल्का बनाती है। यह थेथरई राष्ट्रीय चरित्र बन गई है। जब भी कोई गहरा संकट आता है, यह थेथरई उभर आती है। दृश्य में सब कुछ दिखता है, पर लोग उसकी ओर गौर नहीं करते।
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वह घर शीशे का नहीं बना था। ईंट और गारे से चुनी हुई बेसाख्ता ऊपर की ओर जातीं दीवारें थी ,जिनपे सफ़ेद चुना पुता हुआ था।बरसात उन्हें मटमैला कर देता था और दीवाली की सुबह उन्हें पुनः चूने से नहलाकर उजला कर देती, ऊपर खपरैल का छप्पर था।
ब्रह्मा ने नायक की आँखे भी वैसी नहीं गढ़ी थी कि अपारदर्शी दीवारों के भीतर झाँक ले….नायक के घर से निकलने के पाँच मिनट बाद वह सफेद गढ़ दिखना शुरू होता।
वह दूर से ही उन्हें आशाओं में डूबकर देखता और सोचता काश वो मेरे आने की आहट से निकल आती। उन दीवारों से गुजरते हुए ज्यों-ज्यों साइकिल के पैडल दबाता तो गढ़ के राजकुमारी के बाहर निकल आने की उम्मीद को क्षीण होते पाता।
यह मामूली बात नहीं थी , पर अनकहे ही राजकुमारी को नायक के मंसूबे का अहसास हो चला था और वह निकलने भी लगी थी। 4:10 पर नायक और 4:15 पर वो , दोनों साथ ही चलते बस उतने ही कदम का फ़ासला बनाये रखते जितना नेहरूवादी समाजवाद और गांधीवादी समाजवाद में था।
जब दोनों में संवाद क़ायम हुआ तो एक दिन नायक ने गुनगुनाया….”मेरे सामने वाली खिड़की में, एक चाँद का टुकड़ा रहता है...
अफ़सोस ये है कि वो हमसे, कुछ उखड़ा-उखड़ा रहता है।”
उधर से जवाब नहीं आया।
अगली रोज़ फिर फ़ासला जब मुकम्मल दूरी तक सिमटा तो नायक ने कहा तुम प्रेम को समझो।
राजकुमारी ने बेसाख्ता ब्रेक मार के फ़ासले मिटा दिए और नायक से पूछ बैठी कैसा प्रेम ? धड़कन के सुनील शेट्टी वाला प्रेम या विवाह के शाहिद कपूर वाला प्रेम ?
क्वेश्चन आउट ऑफ़ सिलेबस था , नायक गड़बड़ा गया और थूक घोंटते हुए बोला …. ग़दर के सन्नी देवल सा प्रेम….
लड़की बेसाख़्ता हंस पड़ी….
गड़बड़ी की आशंका सी हुई और लड़का असमंजस में पड़ा उसी ओर देखने लगा। वह और बेसाख्ता हँसी…. पास चल रहे जोकर ने कहा ,“गुरु हँसी तो फँसी” ।
राजकुमारी ने कहा ,”मेरा बाप अमरीश पुरी है ….उसपे तीन-तीन मर्डर के केस है ….एक तो मेरे सगे चाचा के ही। सन्नी देओल को इंटरवल से पहले मुक्ति मिल जाएगी”
और फिर बेलौस हँसते-हँसते साइकिल के पैडल जोर से दबा दिए।
फ़ासला बढ़ने लगा था।
नायक ने पलटकर जोकर की ओर देखा …वह साला मुस्कुरा रहा था।
मैं कोई नहीं हूँ , मेरी मौत किसी दैनिक अख़बार के क्षेत्रीय पृष्ठ के अंतिम कॉलम में छपे उतना भी नहीं हूँ। शायद किसी सड़क दुर्घटना में मारा जाऊँ तो कोई स्ट्रिंगर खबर छपवा दे कि बनर्जी चौराहे पर लारी से टकरा कर अज्ञात की मौत।
मैं डिप्रेशन में नहीं हूँ। नहीं मैं कोई नये ज़माने का डार्क लेखक जो बार बार मौत जपता हो। ये सब मैं सिर्फ़ इसीलिए बता रहा हूँ की मौत मेरी जीवन की दूसरी सबसे बड़ी घटना होगी। इसके पहले की सबसे बड़ी घटना मेरी पैदाइश थी।
मैं एक बेहद मामूली शख़्स हूँ। जो चींटियों को देखता है तो सोचता है कि बरसात होगी। और जब बरसात की बूँदे गिरती हैं तो उसमें चींटियों के चलने की संगीत सुनता हूँ।
खेतों में पैर धँसा मिट्टी की नमी देखता हूँ। लहलहाते गन्ने को जीभर के देखता हूँ। इसके पहले जिया जुड़ाये , उलझे हुए सब्ज पतों को पलट कीटनाशक की सोचता हूँ।
शहर जाता हूँ तो रासायनिक खाद्य से होने वाली बीमारियों के विषय पर चिंतित लोगों से मिलता हूँ। उस वक्त मुझे चिंता पकड़ती है की पैक्स अध्यक्ष को फ़ोन कर अपने ज़रूरत का डीएपी यूरिया अलग रखवा देने को कह दूँ।
मैं दुनिया में आग लगाने की हसरत भी पाले हूँ। पर मैं क़ानून से बहुत डरता हूँ। वो नहीं जो दंड संहिता की धारा में लिखा है।बल्कि उससे जो बड़ा बाबू की लाठी पर लिखी है।
इसीलिए मैं यह सब छोड़कर कंक्रीट के जंगलों में ... बंद खिड़की से बरसात देखता हूँ । शीशे पर फिसल रही बूँदे मेरी आत्मा पर रेंग रही चीटियों सी लगती है। ऐसी चीटियाँ जो लाल है। एकदम से उन लड़कियों की तरह जिन से बात करने से मैं अब हिचकता हूँ। मैं एक मामूली शख़्स हूँ, मेरे जैसी ही लगभग सारी दुनिया है।
>>> सूर्यकुंड से बंजार संगम
<नर्मदा दंड परिक्रमा >
मंडला में नर्मदा के दक्षिण तट से प्रेमसागर ने नर्मदा दंड परिक्रमा प्रारम्भ की। शुरुआत सूर्यकुंड से हुई—दक्षिणमुखी हनुमान जी को प्रणाम कर।
सवेरे लगभग दस बजे निकलना हुआ। आज उनके पास कमंडल नहीं था। आगे दो लीटर का कमंडल खरीदना है। सामान फिलहाल अंकित जी के यहाँ रखा है—वे लेकर आ जायेंगे। धीरे-धीरे लोग जुड़ते जायेंगे, ऐसा उनका विश्वास है। नर्मदा माई व्यवस्था करती रहेंगी। प्रेमसागर के जिम्मे बस दंड भरना है।
दंड यात्रा का अर्थ है—बार-बार सड़क पर लेटना, उठना, और आगे बढ़ना। एक किलोमीटर में लगभग 1670 कदम, या 560 दंडवत। बैजनाथधाम की दंड कांवड़ यात्रा का अनुभव उनके पास पहले से है। लेकिन यह यात्रा उससे कहीं बड़ी है। पूरी नर्मदा परिक्रमा दंडवत—लगभग सोलह लाख बार शरीर को धरती पर टिकाना और उठाना।
सोलह लाख—संख्या सुनने में ही भारी लगती है।
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प्रभु का जन्मोत्सव? ना प्रभु का जन्म हो सकता ना मृत्यु। प्रभु तो अपने भक्तों को आनंद देने को इस लोक में प्रगट हुए थे। आज ही का समय तो था चैत्रनवमी। मगर कब - किस सदी में ये कह नहीं सकते। कोई भी नहीं सकता। समय जिसका दास हो, उसके समय का आकलन कौन कर सकता?
ज्ञात लिखित इतिहास में प्राचीनतम महात्मा बुद्ध का है, वो भी राम के बारे में ऐसे बताते हैं। जैसे वो उनसे सदियों पहले हुए राजा हो।
प्रभु जब प्रगट हुए उसका वर्णन करते हुए गोस्वामी जी ने लिखा है।
भए प्रगट कृपाला परम दयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मनहारी अदभुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी
नेत्रों को आनंद देने वाला मेघ की तरह श्याम शरीर, चारों भुजाओं में शस्त्र धारण किए हुए, गले में पाँव तक लंबी माला, विशाल नेत्र, शोभा के समुद्र श्रीराम प्रगट हुए।
आगे गोस्वामी जी कहते हैं :
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसु लीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
माँ ने कहा - तात! यह रूप छोड़कर अत्यंत प्रिय बाल-लीला करो। मेरे लिए यह सुख परम अनुपम है। यह वचन सुनकर देवताओं के स्वामी सुजान राम ने बालक होकर रोना शुरू किया।
प्रभु का पूर्णावतार क्यों हुआ? क्या रावण का वध उनके जीवन का उद्देश्य था? मुझे नहीं लगता!
प्रभु आए क्योंकि उन्हें समूचे मानवता को काल बाह्य पूर्णपुरुष का जीवन-दर्शन देना था। वह पुरुष जो पुत्र भी पूर्ण रहा , भ्राता भी पूर्ण रहा, मित्र भी पूर्ण रहा , पति भी पूर्ण रहा , प्रेमी भी पूर्ण रहा, योद्धा भी पूर्ण रहा , राजा भी पूर्ण रहा , और शत्रु भी पूर्ण रहा।
फिर ऐसा हुआ कि कोई दूसरा पुरुष ऐसा ना हुआ। जो इस मर्यादा से आगे निकल सके । सब कुछ सुंदर व शाश्वत।
लोग आठवें विष्णु - कृष्ण को सबसे बड़ा नीतिज्ञ मानते हैं। मैं समझता हूँ की राम सा नीतिज्ञ कोई नहीं था।राम समस्या के समाधान से अधिक समस्या को पनपने ही ना दो का सिद्धांत देते हैं।
राम ने युद्ध किया,पर उनके युद्धों में बैरीभाव नहीं था ,एक दायित्व था। उन्होंने वनवास भोगा,पर उसमें कोई शिकायत नहीं थी । उन्होंने पत्नी को त्यागा, पर उनके त्याग में घृणा नहीं राजधर्म था।
हर बार जब कोई पुत्र अपने पिता का आदर करता है, कोई भाई अपने भाई से नहीं जलता,कोई पुरुष अपने स्त्री के मान हेतु अपना सर्वस्व त्यागने को तत्पर रहता है। राम वहीं प्रकट होते हैं।
वेदों के सेवक और स्वामी , सातवें विष्णु प्रभु राम को उनके प्राकट्य दिवस पर इस दास का प्रणाम🙏🏼 आप सभी को रामनवमी की शुभकामनाएँ।
कितने तेजी से सबकुछ छूटता जाता है , यूँ जैसे कि पहिया नही समय नाच रहा हो। बचपन का चक्का, मेले का चल छैंया-छैंया वाला फ़ोन , गैस से उड़ने वाला गुब्बारा, वो दोस्त जिसने आपकी गलतियों पर चुपचाप मार खाई थी और वो लड़की जिसने पहली बार अपनी हथेली पर आपका नाम लिखा था।
ऐसा नही है कि ये छूटना या छोड़ जाना कुछ दिलाता नही है। खुदमुख्तारियों के रेस में , काठ का चक्का कब चार-चक्के में बदल जाता है और छैंया-छैंया वाला फ़ोन स्मार्ट हो जाता है ,पता नही चलता। पर अब दोस्ती में चुपचाप मार खा लेने वाले दोस्त नही मिलते हैं। अब दोस्त के चेहरें में साले डिप्लोमैट मिलते हैं ,जिनके दिलों में भी दिमाग उगा होता है।
अब नही मिलती हैं वो लड़कियां भी जो नई कलम से अपनी सफेद हथेली पर पहला नाम आपका लिखती हों, गर मिल भी जाएं तो चंद रोज बाद न्यूरोलोजिस्ट्स लिख रहा होता है आपके लिए हजार-हज़ार MG की गोलियाँ।
सत्तर साल के जीडी को क्या करना चाहिए
“जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।”
भारत में राजनीति अब ज़्यादातर संख्या की भाषा बोलती है। तुष्टिकरण, अपीज़मेंट, पहचान के नारे—सब उसी गणित के औज़ार हैं। कहीं “ब्राह्मण भारत छोड़ो” जैसे नारे सुनाई देते हैं, तो कहीं सांस्कृतिक आक्रोश की तीखी आवाज़ें। जहाँ उम्मीद होनी चाहिए, वहाँ मायूसी है। शिक्षा लचर है; न्यायपालिका—ख़ासकर निचली अदालतें—भरोसे से नीचे उतर चुकी हैं; और सार्वजनिक विमर्श बहस नहीं, चीख बन गया है। सोशल मीडिया विचार नहीं, खेमाबंदी पैदा करता है।
ऐसे समय में मेरे जैसा—सत्तर साल का—आदमी क्या करे?
यह उम्र उछाल की नहीं होती। न सत्ता की आकांक्षा बचती है, न क्रांति का जोश। यह वह उम्र है जब आदमी बस यह देखना चाहता है कि जिस समाज में उसने जीवन जिया—काम किया, टैक्स दिया, परिवार पाला—वह किस दिशा में जा रहा है। आज की जम्हूरियत में यह देखना और भी बेचैन करता है, क्योंकि यहाँ आदमी की गिनती होती है, पर उसकी सुनवाई नहीं।
इस उम्र में पहली समझ यह बनती है कि संख्या से लड़ना व्यर्थ है।
भीड़ को उपदेश देकर नहीं बदला जा सकता—न व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड रोककर, न टीवी एंकरों को कोसकर। संख्या अपना काम करती है। वह सत्ता बनाती है, गिराती है, और फिर अगली संख्या की तैयारी में लग जाती है। अगर सत्तर साल का जीडी अब भी यह माने कि वह “जनता को समझा देगा”, तो वह खुद को धोखा दे रहा है।
[...]
सत्तर साल का जीडी अब न आंदोलन खड़ा करेगा, न संस्थाएँ बदलेगा।
लेकिन वह छोटे-छोटे विमर्श-द्वीप बना सकता है—ब्लॉग, स्थानीय बातचीत, परिवार में चर्चा, पत्नी और पोती के साथ संवाद। लोकतंत्र का बीज वहीं पड़ता है, जहाँ कोई व्यक्ति बिना डर, बिना लाभ, बिना तालियों की चाह के सोचता और बतियाता है।
इस उम्र में सबसे ज़रूरी काम है—अपने भीतर के अधिनायकवाद को मरने देना। यह मान लेना कि “मेरी पीढ़ी ज़्यादा समझदार थी” भी एक तरह का अहंकार है। सुनना सीखना होगा—युवा की उलझनें, उनकी ग़लतियाँ, और कभी-कभी उनकी मूर्खताएँ भी।
[...]
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अभी कुछ दिनों से यादवों के दल ने भी जोर पकड़ा है ! जनेऊ लेने के बाद भी राजपूतों ने यदुवंशी क्षत्रिय को मान्यता नहीं दी। इसके विपरीत समय-समय पर यदुवंशियों के क्षत्रियत्व को वे व्यंग्यविद्रूप के बाणों से उभारते रहें। एक बार यदुवंशियों ने खुली चुनौती दे दी। बात तुल पकड़ने लगी थी। दोनों ओर से लोग लगे हुए थे।
यदुवंशियों को कायस्थटोली के मुखिया तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद मल्लिक ने विश्वास दिलाया कि मामले -मुकदमे की पूरी पैरवी करेंगे। जमींदारी कचहरी के वकील बसंतो बाबू कह रहे थे ,”यादवों को सरकार ने राजपूत मान लिया है। इसका मुकदमा तो धूमधाम में चलेगा ! ख़ुद वकील साहब कह रहे थे।"
राजपूतों को ब्राह्मण टोली के पंडितों ने समझाया—"जब-जब धर्म की हानि हुई है, राजपूतों ने ही उनकी रक्षा की है। घोर कलिकाल उपस्थित है; राजपूत आपनी वीरता से धर्म को बचा लें।" ... लेकिन बात बढ़ी नहीं। न जाने कैसे यह धर्मयुद्ध रुक गया।
ब्राह्मण टोली के बूढ़े ज्योतिषी जी आज भी कहते हैं— "यह राजपूतों के चुप रहने का फल है कि आज चारों और हर जाति के लोग गले में जनेक लटकाए फिर रहे हैं !—भूमफोड़ क्षत्री तो कभी नहीं सुना था ! ... शिव हो ! शिव हो !"
अब गाँव में तीन प्रमुख दल हैं, कायस्थ, राजपूत और यादव ।ब्राह्मण लोग गाँव में बहुत कम हैं ।
कायस्थटोली के मुखिया विश्वनाथप्रसाद मलिक, राज परबंगा के तहसीलदार हैं।तहसीलदारी उनके खानदान में तीन पुश्त से चली आ रही है। इसी के बलपर तहसीलदार साहब आज एक हज़ार बीघे के जमीन के एक बड़े काश्तकार हैं। कायस्थ टोली को गाँव के अन्य जाति के लोग मालिक टोला कहते हैं। राजपूत टोली के लोग कहते हैं- कैथटोली।
ठाकुर रामकृपालसिंघ राजपूतटोली के मुखिया हैं। इनके दादा महारानी चंपावती की स्टेट के सिपाही थे और विश्वनाथ प्रसाद के दादा तहसीलदार। कहते हैं कि जब महारानी चंपावती और राज पारबंगा में दीवानी मुकदमा चल रहा था तो विश्वनाथ प्रसाद के दादा राज पारबंगा स्टेट की ओर मिल गए थे। स्टेटवालों को महारानी के सारे गुप्त कागजात हाथ लग गए और महारानी मुकदमे में हार गई।
काशी जाने से पहले महारानी ने रामकृपालसिंघ के नाम अपनी बची हुई तीन सौ बीघे जमीन की लिखा-पढ़ी कर दी थी। रामकृपालसिंघ कहते हैं कि उनके दादा ने महारानी को एक बार डकैतों के हाथ से अकेले ही बचाया था, इसी के इनाम में महारानी ने दानपत्र लिख दिया था। … कायस्थटोली के लोग राजपूतटोली को ‘सिपैहियाटोली’ कहते हैं।
-मैला आँचल में रेणु
पत्थर के ईंख पेरने वाले कोल्हू का समाजशास्त्र
टुन्नू पंडित बताते जा रहे थे - “मिर्जापुर के आगे विंध्याचल की पहाड़ी से निकलता था पत्थर और वहीं बनते थे बड़े, आठ फुट के कोल्हू। इतनी बड़ी चीज जो वहां बनती थी, पूरे इलाके में - गोरखपुर देवरिया तक दिखती है। बीच में कहीं कोई पहाड़ नहीं जहां वे बन सकें।"
विंध्य की पहाड़ियों में बना ईख का कोल्हू कैसे गांव गांव पंहुचता था, जब कोई सड़क नहीं थी, कोई रेल या बस या ट्रक नहीं थे। बेलनाकार कोल्हू को लुढका कर आगे बढ़ाना ही एक मात्र जरीया था।
"हर गांव का सहयोग होता था जीजा जी। जिस गांव की सीमा पर कोई कोल्हू आया नहीं कि नौजवान तैयार रहते थे। वे धकेल धकेल कर अपना गांव पार करा देते थे। कोई मेहनताना नहीं, कोई शुल्क नहीं। जिस गांव में वह कोल्हू रुक गया, उस गांव की नाक कट जाती थी। उस गांव के लड़कों की शादी नहीं होती थी। यही कहा जाता था कि उहां सब हिंजड़े हैं!"
चार–पाँच टन का वह कोल्हू कोयला या डीज़ल से नहीं चलता था।
उसे न ठेके की ज़रूरत थी, न मज़ूरी की। वह समाज के जुड़ाव, गांव गिरांव की लाज, इज्जत और प्रतिष्ठा से चलता था!
उस समय के समाज की कल्पना की जाये जब मर्दानगी का मतलब हिंसा, आगजनी, आतंक नहीं; बल्कि सामूहिक श्रम निभाने की क्षमता था। आज हम जिसे “इन्फ्रास्ट्रक्चर” कहते हैं, तब वह चरित्र का इम्तिहान था।
इंफ्रास्ट्रक्चर के लिये हम सरकार को कोस सकते हैं; चरित्र की ताकत तो समाज के अंदर से आती थी।
बिना खर्च किये, बिना काग़ज़, बिना सरकारी आदेश — कोल्हू अपने गंतव्य गाँव तक पहुँचता था, यह जानना ही अपने आप में आधुनिक सोच को चुनौती देता है।
हम आश्चर्य से सुन रहे थे—और समझ रहे थे कि यह सिर्फ़ बीते समय की बात नहीं है।
टुन्नू पण्डित बोले जा रहे थे… आगे भी बहुत कुछ सुनाने को है टुन्नू जी के पास।
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चित्र - कोल्हू का प्रस्तरखंड चौरी में है। टुन्नू पण्डित ने दिया। दूसरा, गांव में धकेला जाता चैट जीपीटी ने बनाया।
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बुधाग्रे न गुणान् ब्रूयात् साधु वेत्ति यत: स्वयम्
मूर्खाग्रेपि च न ब्रूयाद्धुधप्रोक्तं न वेत्ति स:।।
अपने गुण बुद्धिमान मनुष्य को न बतायें, वह उन्हें अपने आप जान लेगा! और अपने गुण बुद्धिहीन (मूर्ख) मनुष्य को तो कतई न बतायें, वह उन्हें समझ नही सकेगा!
सुप्रभात
आप सबका दिन शुभ हो
राजकुमार सेठ उर्फ बाबा प्रधान
कोहरा न हो, बाजार कुनमुनाता सा खुल रहा हो और आप जिस दुकान के लिये अपनी लिस्ट ले कर साइकिल से निकले हों, वह अभी खुली न हो तो तय मानिये कि या तो आपको खीझ होगी या नई कहानी मिलेगी।
मैं सवेरे आठ बजे ही घर से निकल लिया था। साइकिल बिजली वाली थी - लगे हाथ उसका नामकरण भी कर दिया जाये; बिजली - तो बिजली पर सवार जल्दी ही पंहुच गया महराजगंज बाजार में।
दवाई की दुकान वाला अभी आया नहीं था। वह मुझे एमआरपी पर 8-10 परसेंट छूट देता था। अब? मैं आगे बढ़ गया।
चाय बनाने वाला चाय बना रहा था और ग्राहक भी काफी बैठे थे। उसकी बेंच पर जगह भी बची थी मेरे बैठने लायक। पर घर से तीन चार कप धकेल कर चला था तो वहां भी नहीं रुका।
एक नुक्कड़ की मैडीकल दुकान दिखी। आज तक उसपर कभी गया नहीं था पर अब रुक गया - और मुझे बहुत जानदार आदमी मिले दुकानदार के रूप में। उन्होने मेरी अपेक्षा से ज्यादा भलमनसाहत से सस्ती दी दवा।
एक नहीं थी, तो मेरे भरोसे दुकान छोड़, गल्ले से एक नोट ले कर गली की मैडीकल दुकान पर गये और ले आये। बताया कि पचहत्तर की है, पर दुकान वाले भाई ने उन्हें 65 में दी है तो मैं 65 ही दे दूं।
मैने मोबाइल से पैसा दिया तो नाम झलका - राजकुमार सेठ। मैने पूछा - आप ही राजकुमार हैं?
“जी। राजकुमार सेठ नाम है मेरा। पर आसपास लोग बाबा प्रधान के नाम से जानते हैं। यहां महराजगंज का दस साल प्रधान रह चुका हूं।” - बाबा प्रधान ने कहा।
बाबा प्रधान! मुझे याद आया एक दुकानदार से मैने महराजगंज के प्राचीन विवरण के बारे में पूछा था तो उन्होने कहा था - आप तो बाबा प्रधान से मिलिये, वे ही आपको बतायेंगे इस गंज के बारे में। अच्छे और मिलनसार आदमी हैं।
यह संयोग बना कि आज बाबा प्रधान यूं ही मिल गये! वे 64 साल के हैं। छ दशक की उनकी अपनी यादें हैं और अपने पहले की दो पीढ़ी से सुना भी उनको पता होगा ही। दो गांवों - कंसापुर और हुसैन पुर के मेल से बना यह महराजगंज अच्छा खासा इतिहास रखता होगा। वह सब बताने वाले सज्जन हाथ लग गये।
बाबा प्रधान जी का मैने फोन नम्बर ले लिया है। चलते चलते उनकी दो चार फोटो भी क्लिक कीं। कुलही और मफलर ओढ़े थे वे। यह सोच कर कि शक्ल ठीक से आये, इसलिये मफलर भी खोल दिया बाबा प्रधान जी ने।
चलते चलते चाय पिलाने की पेशकश भी की - शायद वे मुझसे कुछ और भी बातचीत के मूड में रहे हों; पर पत्नीजी ने जल्दी घर लौटने को कहा था, तो उनसे विदा ले कर चला आया।
अब सोचता हूं कि एक दो दिन में सवेरे एक थर्मस चाय ले कर उनकी दुकान पर जाऊंगा और उनसे कहूंगा - आज से साठ सत्तर साल पहले के महराजगंज की चर्चा करें वे।
क्या ख्याल है? कोई सशक्त लेखमाला निकल पायेगी उससे? ब्लॉग पोस्ट निकलेगी या कोई मेमॉयर! दस पंद्रह मिनट की मुलाकात से मुझे लगता है बाबा प्रधान में लेखन मसाला दे सकने की बहुत सम्भावनायें हैं। इस इलाके में शायद सब से नायाब सम्भावनाओं के स्रोत होंगे वे!
बाबा प्रधान के साथ चाय, या चाय के कई दौर ड्यू रहे!
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आज थोड़ी फुर्सत है और थोड़ा मन शांत तो एक बात जो बहुत दिनों से मन में थी, वो लिख रहे।
हमारे बचपन के समय में बच्चों के पास कैरियर बनाने के लिये सीमित ऑप्शन थे।
डाक्टर, इंजीनियरिंग, बैंकिंग , फोर्सेज, मर्चेंट नेवी पायलट, सरकारी नौकरियां, सेल्स, मेडिकल स्टोर वगैरा वगैरह।
ईजी मनी नहीं थी।
फिल्म या टीवी के क्षेत्र में भी नए जाने वालों की हालत खराब हो जाती थी, तब ब्रेक मिलता था।
आज एक तो स्मार्टफोन के इस दौर में स्टूडेंट्स लाइफ ईजी है।
गणित के सवाल चैट जीपीटी हल कर देगा, सामान्य ज्ञान गूगल बता देगा।
फिजिक्स कैमिस्ट्री बायो सब नेट पर मौजूद है।
कैरियर ऑप्शन भी बहुत हैं और तरह तरह के हैं।
ईजी मनी के लिए रील यूट्यूब इंस्टा आ गए।
फ़िल्मों सीरियलों वेबसीरीज में ब्रेक मिलना भी आसान है।
लेकिन लेकिन लेकिन
एक बात जो स्टूडेंट्स को भूलनी नहीं चाहिये।
दुनिया आज भी वही डाक्टर ,इंजीनियर, बैंकर , सेल्समैन, बिजनेस मैन, राजनेता चला रहे हैं जो ईजी मनी वाले सेक्टर में नहीं हैं।
उनकी कला कौशल और पूंजी स्थाई है।
एक यूट्यूबर, एक रील मेकर, एक स्टैंड अप कॉमेडियन एक इंस्टा इन्फ्लूएंसर मर गया, पागल हो गया, कहीं गायब हो गया तो लोगों की सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
उनके पास कोई संस्था या संस्थान नहीं है।
किसी दिन अचानक ये सोशल साइट बंद हो गईं और उत्तर कोरिया की तरह मूवी बैन हो गया तो ये सब क्या करेंगे?
एक डॉक्टर, इंजीनियर , एक बैंकर , एक दुकानदार, एक बिजनेसमैन और यहां तक कि एक दर्जी प्लंबर या इलेक्ट्रिशियन की कद्र तब भी रहेगी।
इसलिये स्थाई रोजगार की तरफ देखें और मन से पढ़ाई करें। टेक्निकल, मेडिकल, कॉमर्स, प्रोफ़ेशनल कोर्ट की, कुछ अच्छा हाथ का हुनर सीखें।
यही सब स्थाई। बाकी सब अस्थाई।
मेरी बात गलत लगे तो मुझे पागल बोल के निकल लें।
बिहार को गरीब राज्य मत कहिये, बिहार चुनाव में प्रत्याशियों के खर्च को देखिए, सभा- आयोजनों को देखिए, आसमान में उड़ते हेलिकॉप्टर को देखिए...
बिहार को गरीब कहना बंद कीजिए! गरीब बिहार का सिस्टम है! गरीब कहलाना ही बिहार की राजनीति है!
शुभ रात्रि!
Pic-1 -ये एक क्लब फूट (CTEV) का बच्चा हैं,जिसका पैर जन्म से ही टेढ़ा हैं। इसका ईलाज संभव हैं, जितनी जल्दी आप ईलाज शुरू करवाते है उतनी जल्दी ठीक हो जाएगा।
Pic 2- ईलाज की एक प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ये जूता बच्चे को पहनाया जाता हैं। ये समझने की भूल न करे कि सिर्फ़ जूता पहना देने भर से पैर सीधा हो जाएगा।
आपके जानने वालों में भी ऐसा बच्चा हो सकता हैं उन्हें सही सलाह दे।