अच्छा मुद्दा था। नौजवान उद्वेलित थे। सरकार को घेरा जा सकता था। पर सुकुमार लोग, पंखा झलने के लिये नौकर और गर्मी से बचने के लिये एसी कार का प्रदर्शन करते दिखे; ऊपर से मुद्दा डफली-आजादी मंडली को थमा कर पूरे सीन का कचरा कर दिया।
सरकारी पक्ष भीषण गर्मी में कोचिया या हिंगुआ के पौधों की तरह हरियरा उठा।
यह कुछ वैसा हुआ कि जब तक प्रचार में राहुल गांधी जी की एंट्री नहीं होती भाजपाई मुर्झाये रहते हैं। उनके आते ही जान आ जाती है और बाजी पलट देते हैं केसरिया वाले।
मायूस किया कॉक्रोचियों ने।
>>> रेनू का अस्पताल में इलाज
रेनू मुझसे बाईस साल छोटी हैं, पर कुटुम्ब में मैं तीन पीढ़ियों में सबसे बड़ा होने के कारण वह मेरी चाची लगने के बावजूद मुझे भईया कहती हैं और मैं प्रणाम और नमस्कार के सम्बोधनों में झूलता रहता हूं।
रेनू का छोटा बेटा मेरी पोती के बराबर की उम्र का है!
पारिवारिक सम्बन्ध आदर और स्नेह दोनों से सिंचित हैं।
रेनू के गॉल ब्लैडर में पथरी है। उसका साइज भी छोटा नहीं। रत्नेश (मेरे चाचा, जो उम्र में मुझसे कम हैं) रेनू को लेकर अस्पताल में हैं। मैं सोच रहा था कि रेनू अपनी बीमारी को लेकर बहुत व्यग्र और परेशान होंगी। पर उनकी फोन पर हँसी और आशावादी आवाज ने मेरी शंका दूर कर दी। अस्पताल के कमरे में बैठी व्यक्ति की आवाज में मुझे बीमारी नहीं, सहजता सुनाई दी।
रेनू से मुझे भी विषमता में प्रसन्न रहने का सूत्र मिला।
ऐसा नहीं कि रत्नेश और रेनू कोई उच्च मध्यवर्ग की आराम की जिंदगी जी रहे हों। दोनों को अपना जीवन स्तर बनाये रखने के लिये मेहनत करनी होती है। उनका बड़ा बेटा आईआईटी में पढ़ रहा है। वह अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर अच्छा कर रहा है; पर उसका खर्च वहन करना रत्नेश और रेनू के लिये चुनौती तो होगा ही। और तीन साल बाद छोटा बेटा भी कॉलेज जाने की उम्र में आ जायेगा।
उनकी जिंदगी जद्दोजहद की है। लेकिन यह सब होते हुए भी रेनू जब भी हमसे मिलती हैं या फोन पर बात करती हैं, उनकी सरलता और हँसमुख आवाज सुकून देती है। आदर्श चरित्र हमें अपने आसपास ही मिल जाते हैं; बस हम उन्हें नोटिस नहीं करते।
रेनू की लेप्रोस्कोपी होनी थी, पर जुकाम और बुखार के कारण तीन-चार दिन के लिये टल गई। अब अस्पताल में पहले डॉक्टर उसका इलाज कर रहे हैं। लेप्रोस्कोपी अगले सोमवार के लिये निर्धारित है।
रत्नेश ने रेनू की रिपोर्ट मुझे देखने के लिये भेजीं। जितना मैं समझ पाया, तत्काल समस्या पथरी की है और उसका समाधान भी सामने है। बाकी स्वास्थ्य के बारे में कुछ सलाह देने का अवसर मिला तो मैंने उसे हाथ से जाने नहीं दिया। उम्र और अनुभव के आधार पर जो कहा जा सकता था, वह कह दिया।
नित्य 40-50 मिनट तेज चलना, भोजन में 65-70 ग्राम प्रोटीन जोड़ना, टीवी के रिमोट को तिलांजलि देना और वजन 6-7 किलो कम करना — यह भाषण देने का मेरे पास एक शानदार अवसर था और मैंने उसे जाने नहीं दिया। रेनू से सामाजिक हाईरार्की में भले ही मैं एक पीढ़ी बाद का हूं, पर उम्र के हिसाब से तो इतना अधिकार बनता ही था।
आशा करता हूं कि रेनू और रत्नेश ने मेरे भाषण को अन्यथा नहीं लिया होगा।
पर रिपोर्टों से अधिक मुझे रेनू का स्वभाव प्रभावित कर गया। अस्पताल का कमरा, जांचें, ऑपरेशन की प्रतीक्षा — इन सबके बीच भी उनकी हँसी और सहजता बनी हुई थी। कुछ लोग अपने आसपास के वातावरण को हल्का कर देते हैं। रेनू उन्हीं लोगों में हैं।
अस्पताल में दिन काटना कठिन होता है। पर रेनू अपने स्वभाव से इस स्थिति को सहजता से ले रही हैं, यह देख अच्छा लगा।
रिपोर्टों में पथरी मिली; बातचीत में धैर्य मिला।
या शायद यूँ कहूँ कि उस अस्पताल के कमरे में बीमारी से अधिक प्रसन्नता उपस्थित थी।
→→कुछ लोग स्वस्थ होने के कारण प्रसन्न नहीं होते; वे प्रसन्न रहने के कारण कठिन समय को भी सहज बना देते हैं। रेनू उनमें से हैं।
शुभकामनायें।
@GYANDUTT जिंदगी जिंदादिली का नाम है। रेनू जी को पूर्ण स्वस्थ होने की कामना करता हूं। हम सभी के आस-पास ऐसे चरित्र रहते हैं परन्तु आप जैसी चित्रण की जादूगरी के अभाव में हम उन्हें दूसरों तक नहीं पहुंचा सकते। 😀🙏