धार्मिक/मजहबी/रिलीजियस जहालत और मूर्खता और कट्टरता से मुझे घिन आती है
चाहे वो किसी भी ओर वाले हों।
ऐसे लोगों का मकसद सिर्फ एक होता है अपने सिवा सबको खत्म करना और सबको गलत बताना।
जो खुद समझौता न कर सिर्फ दूसरे से समझौता कराते हैं।
ये घिनौने लोग हैं
औरतों के दुश्मन।
माँ बहन की गाली देने वाला ये विषैला बूढ़ा सर्प @Sanjay_Dixit भी आज कल के बच्चों को संस्कार सिखा रहा है, उनकी गाली गलोज़ पर ज्ञान दे रहा है। और बजरंग दल के लोगो को लड़कियों को सबक सिखाने के लिए भड़का रहा है। वो बजरंग दल जो राम का मंदिर लूटे जाने पर भी किसी बिल में घुसे थे, उनको ये लड़की को मारने के लिए बुला रहा है। क्योंकि ख़ुद इसकी औक़ात नहीं है।
इस आदमी ने राम मंदिर को लूटे जाने पर बजरंग दल को ललकारा था?
Ruchika didi best advice for you :-
Ridhima ki trh Rahul Gandhi ko 5-6 gali de do,
Aapko BJP ki trf se MLA ki ticket mil jaegi.
Abuse Rahul Gandhi you will get rewarded by BJP
सत्ता को घुटने पर ले आए राहुल?
राहुल गांधी जापानी मार्शल आर्ट जिउ-जित्सु और अकीडो में पारंगत हैं। इसमें ताकत का नहीं, तकनीक और गति का इस्तेमाल होता है। जब दुश्मन कमजोर होता है तो उसे गिराकर उसपर काबू किया जाता है। राहुल गांधी ने राजनीति में भी यही किया।
जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन के बाद सरकार बेबस दिखाई दी। लाठी और पैलेट गन चलने के बाद मामला और ज़्यादा बिगड़ गया। सरकार इससे निपटने की बजाय इससे निकलने की कोशिश करती रही। लेकिन राहुल गांधी ने इस मौके को जाने नहीं दिया।
पहले दिन से ही ये तय कर लिया कि लाठीचार्ज और पैलेट गन के मुद्दे पर संसद में आक्रामक रुख अपनाया जाएगा। लेकिन जैसे ही कांग्रेस के नेता मुद्दा उठाते दोनों सदनों की कार्यवाही स्थगित हो जाती। पहला पूरा हफ्ता हंगामे में धुल गया। कांग्रेस अड़ी रही। सदन को चला पाने में सरकार बुरी तरह फेल हुई।
कांग्रेस का साफ कहना था कि जब तक लाठीचार्ज और पैलेट गन की बात नहीं करने दी जाएगी वो सदन नहीं चलने देंगे। अब सरकार फंस चुकी थी। इसके बाद सत्ता ने घुटने टेकने शुरू किए। बैठकर मामला सुलझाया गया। सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस को ये भरोसा दिया गया कि जब बिल पर चर्चा होगी तो वो अपनी बात रख सकते हैं।
कांग्रेस ने यही किया। कार्यवाही का दूसरा हफ़्ता पूरी तरह से विपक्ष के नाम रहा। चर्चा भले ही बिल पर हो रही थी लेकिन विपक्ष ने इसे पूरी तरह से लाठीचार्ज और पैलेट गन के मुद्दे पर डायवर्ट किया। इसमें सफलता भी मिली।
सरकार से लेकर RSS तक पर हमले हुए। सत्ता पक्ष सिर्फ सुनता रहा। राहुल, प्रियंका, खरगे, अखिलेश, डिंपल, संजय सिंह सबने वही कहा, जो वो पहले दिन से कहना चाहते थे। इत्मीनान से सरकार को घेरा गया। उधर सत्ता पक्ष पेपर लीक पर ही भाषण देता रहा, जिसका कोई मतलब नहीं था।
मानसून सत्र में अब तक कांग्रेस इस क़दर हावी रही कि गृह मंत्री और प्रधानमंत्री पूरे दो हफ़्ते की कार्यवाही से गायब रहे। इसे कांग्रेस अपनी बड़ी जीत मान रही है।
मुझे भी सैंतालीस साल तक सदन के सदस्य के तौर पर सेवा करने का मौका मिला है। मैंने लोकसभा के LoP राहुल गांधी की हर एक बात सुनी और उनकी बॉडी लैंग्वेज देखी। मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि उन्होंने जो कहा उसमें एक भी आपत्तिजनक शब्द नहीं था।
बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर को खुद BJP से नाराज़ होना चाहिए कि उन्हें काउंसिल ऑफ़ मिनिस्टर्स से हटाकर नड्डा जी को लाया गया, जो कहीं ज़्यादा काबिल और काबिल हैं।
अनुराग ठाकुर फ्रस्ट्रेशन के दौर से गुज़र रहे हैं। इसलिए, वह राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा पर कुछ गालियां देते हैं, इस उम्मीद में कि ऐसा करने से उन्हें BJP में कुछ ब्राउनी पॉइंट्स मिल सकते हैं। लेकिन यह याद रखना, जब तक नड्डा जी सत्ता में हैं, तुम मंत्री नहीं बन पाओगे।
- @pramodtiwari700 जी
एक दौर था कि पत्रकारों की ठसक होती थी, बड़े नेता ख़ुद उनसे मिलना - बात करना चाहते थे।
आज के समय पत्रकार कोशिश करते हैं कि उन्हें किसी बड़े नेता के अगल बगल सर झुकाकर - हाथ जोड़कर चलने का मौका मिल जाए।
कल ऐसी ही एक पत्रकार ने अमित शाह के साथ चलते हुए वीडियो बनवाकर ख़ुद उसे पोस्ट किया जैसे ये कोई बहुत बड़े सम्मान की बात हो।
दरअसल ये लोग नेता से कोई सवाल नहीं पूछ सकते, टिक- टैक या बाइट नहीं ले सकते, नेता जो बोलता है उसे चुपचाप सुन लेते हैं बाद में सोशल मीडिया या पॉडकास्ट पर उसकी चर्चा ऐसे करते हैं जैसे अमित शाह ने उनको ये जानकारी एक्सक्लूसिवली दी है।
Calls the LoP “Rahul”, then gets offended when his own political bias is questioned. Cute.
Would you walk up to the PM and say “Narendra, answer my question”? Or to the Home Minister: “Amit, listen…”?
Don’t demand respect you’re unwilling to give.
बड़ी उम्मीद से कूद कर नून पार्टी में गया था। सोचा था मियां होने का एडवांटेज मिलेगा। लेकिन गली क्रिकेट में नाली से गेंद निकालने वाले खिलाड़ी से अधिक उज़की हैसियत बन नहीं पाई। रणछोड़ बन गया।
"न्यूयॉर्क टाइम्स" ने आज द्वाराकपिल कोमिरेड्डी की यह शानदार टिप्पणी प्रकाशित की है। इसका हिन्दी अनुवाद जरूरी और पढ़ने लायक है
"तीन दशकों से अधिक समय से, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भय, विस्मय और भक्ति पर आधारित एक राजनीतिक रहस्य का निर्माण किया है, जिससे लोकतांत्रिक दुनिया में सबसे दुर्दांत व्यक्तित्व पूजाओं में से एक का उदय हुआ है।वह छवि अब टूट गई है।
मेडिकल स्कूल प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्न लीक होने को लेकर छात्रों द्वारा शुरू में छिटपुट विरोध प्रदर्शन हुआ, जो कुछ हफ्तों में प्रधानमंत्री के 12 साल के शासनकाल में उनके खिलाफ सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विद्रोह में बदल गया।
छात्रों, हाल ही में स्नातक हुए लोगों, बेरोजगार श्रमिकों, किसानों और कुछ चुनिंदा हस्तियों के एक व्यापक गठबंधन ने इस आंदोलन का समर्थन किया। सार्वजनिक उपहास के अभूतपूर्व प्रदर्शन में, उन्होंने नई दिल्ली में संसद की ओर मार्च करने से पहले सड़कों पर और सोशल मीडिया पर दो पीढ़ियों के सबसे शक्तिशाली भारतीय नेता का मजाक उड़ाया । लाठियों और आंसू गैस से लैस पुलिस अधिकारी प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़े। लेकिन पिछले सप्ताहांत, श्री मोदी, मजबूर होकर, अंततः अपने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा स्वीकार करने के लिए राजी हो गए। एक ऐसे व्यक्ति ने यह अप्रत्याशित कदम उठाया , जिसकी राजनीतिक विशेषता हमेशा से ही झुकने की अनिच्छा रही है।
इस गर्मी में हुआ विद्रोह केवल परीक्षा परिणामों के लीक होने से कहीं अधिक था। यह भारतीय लोकतंत्र की स्वयं को सुधारने की क्षमता की परीक्षा थी।
यह आंदोलन युवा भारतीयों की एक पीढ़ी की जमा की हुई निराशा का विस्फोट था, जो प्रधानमंत्री द्वारा प्रचारित समृद्ध "नए भारत" के मिथक के साथ अपनी दयनीय वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। देश ने अपराजित समझे जाने वाले एक नेता को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे यह संकेत मिलता है कि श्री मोदी द्वारा लोकतांत्रिक संस्थाओं को खोखला करने और सत्ता को अपने इर्द-गिर्द केंद्रित करने के एक दशक के प्रयासों के बावजूद, भारतीय लोकतंत्र के अंतिम संरक्षक शायद अभी भी इसके नागरिक ही हैं।
श्री मोदी भ्रष्टाचार मुक्त, प्रगतिशील और अवसरपूर्ण देश के वादे पर सत्ता में आए, जहां लाखों नौकरियां सृजित की जाएंगी। उन्होंने कहा कि गरीब भारतीय नागरिकों को 15 लाख रुपये मिल सकेंगे, यदि भ्रष्ट नागरिकों द्वारा विदेशी बैंकों में कथित रूप से जमा किया गया पैसा वापस लाया जाता है।
इसके बजाय, उन्होंने एक आत्ममुग्ध, अक्षम और नफरती हिंदू-प्रधान शासन स्थापित किया है, जिसमें अति-अमीर वर्ग एक मजबूत कुलीनतंत्र बन गया है जो विशाल संसाधनों को नियंत्रित करता है और वास्तव में अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व जमाए हुए है। बेरोजगारी व्यापक है, विशेषकर युवाओं में । सरकार मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ क्रूरता का इस्तेमाल करती है ताकि आत्म-दया से ग्रस्त हिंदू बहुसंख्यक वर्ग का ध्यान प्रधानमंत्री की उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने में विफलता से भटकाया जा सके, और भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अपरिहार्य संस्थाएं , जैसे संसद, न्यायपालिका और प्रेस, श्री मोदी के इशारों पर नाचती हैं।
प्रधानमंत्री का महिमामंडन करना सरकारी तंत्र की सर्वोच्च प्राथमिकता बन गया है। भारत के सबसे बड़े स्टेडियम का नाम उनके नाम पर रखा गया है, सबसे गरीब लोगों को राशन उनकी तस्वीर वाले थैलों में दिया जाता है, अधिकारी छात्रों को उनका जन्मदिन मनाने के लिए बाध्य करते हैं और नागरिकों के लिए उनके रेडियो प्रसारण सुनने हेतु जनसभाएं आयोजित की जाती हैं। आम जनता में निराशा का भाव छा गया, जो मोदी की निरंकुश सरकार द्वारा उपेक्षित और अप्रभावी राजनीतिक विपक्ष द्वारा विफल किए जाने के बाद इस विश्वास में डूब गई थी कि उन्हें चुनाव में हराया नहीं जा सकता।
अब 75 वर्ष के हो चुके श्री मोदी शायद अंततः यह स्वीकार कर लें कि वे दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी का नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त रूप से प्रासंगिक नहीं हैं और धीरे-धीरे राजनीति से दूर हो जाएं। लेकिन, घायल और कमजोर होने के कारण, वे पहले से कहीं अधिक खतरनाक और अप्रत्याशित हो सकते हैं और अपनी धूमिल सत्ता को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर सकते हैं। ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि पिछले सप्ताहांत विरोध प्रदर्शन समाप्त होने के बाद पुलिस ने सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों को दिए गए आश्वासनों का उल्लंघन करते हुए छात्रों को हिरासत में लिया या गिरफ्तार किया ।
दोनों ही स्थिति में, वह व्यक्ति जिसने कभी खुद को "ईश्वर का साधन" और दिव्य शक्ति से संपन्न होने का दावा किया था, वह असाधारण रूप से विनम्र हो गया है।
@nytimes
पूरे देश में अब स्कूल के छात्रों को आंदोलन शुरू हो गया है। उनकाी मांगें है की सरकारी स्कूल में टीचर्स हो, पंखे हों, टॉयलेट हों। और सब जगह वही नारा गूँज रहा है: “हम अपना अधिकार माँगते, नहीं किसी से भीख माँगते”
अमन चोपड़ा ने आदरणीय शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का अपमान करने की कोशिश की। देखिए और सोचिये,उनका क्या हश्र किया गया। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि असली दृश्य काट दिया गया है। बहुत बेइज्जती है भाई।
सवाल देश के गृहमंत्री से पूछे जाने चाहिए लेकिन इतनी हिम्मत कहां से लायें- उनसे तो सवाल पूछते हैं की “अमित शाह जी ये लुंगी (धोती) जो आपने पहनी हैं वह कौन सा स्टाइल है, बंगाल का या असम का “.
जंतर मंतर पर 20 जुलाई को जो कुछ भी हुआ जरा मोदी जी और शाह से उस पर सवाल पूछ कर दिखाए ये गोदी मीडिया के दलाल पत्रकार तब जानें.