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14 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे मेरे साथ आज पुलिस द्वारा धक्का-मुक्की और बलपूर्वक रोकने की कोशिश की गई। मेरे साथ मौजूद साथियों के साथ भी पुलिस द्वारा मारपीट की गई।
कई दिनों से भूखा होने के बावजूद मैं अपने अधिकार और जनता की आवाज़ के लिए खड़ा हूँ। हमें इस तरह रोककर हमारी आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता।
#devendranathmahto
#JharkhandProtest
#JharkhandStudentProtest
"हिन्दुस्तान का साहित्यिक जीवन बड़ा हौसला तोड़नेवाला है | जनता का कोई सहयोग नहीं मिलता| आप चाहे दिल निकाल कर रख दें, मगर आपको पाठक नहीं मिलते|. ..बुद्धिजीवी यूरोपीय साहित्य पढ़ते हैं| घटिया साहित्य की बिक्री बहुत अच्छी है| मगर न जाने क्या बात है कि मेरी किताबें तारीफ तो बहुत पाती हैं, मगर बिकती नहीं|"
-- Dhanpat Rai Shrivastava, better known by his pen name Munshi Premchand, was born today in 1880 at Varanasi.
मेरे गृह जनपद बलिया अन्तर्गत रसड़ा विधानसभा क्षेत्र से लोकप्रिय विधायक श्री उमाशंकर सिंह जी के असमय निधन का समाचार अत्यंत दुःखद एवं स्तब्ध करने वाला है।
उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में जनसेवा और क्षेत्र के विकास के लिए जो योगदान दिया, उसे सदैव सम्मान के साथ स्मरण किया जाएगा। उनका निधन सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकाकुल परिजनों, समर्थकों और शुभचिंतकों को इस असीम दुःख को सहन करने की शक्ति दें।
ॐ शांति। विनम्र श्रद्धांजलि।
बलिया की रसड़ा विधानसभा से बसपा के विधायक श्री उमाशंकर सिंह जी का निधन, अत्यंत दुखद !
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।
शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी संवेदनाएं।
भावभीनी श्रद्धांजलि !
CJP Protest में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज का मुद्दा सदन में उठा. सपा प्रमुख और सांसद Akhilesh Yadav ने कहा कि छात्रों को पीटा जा रहा है और महिलाओं के साथ गाली-गलौज की जा रही है.
स्पीकर Om Birla से आपत्ति जताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें बोलने का समय नहीं दिया जा रहा है. इसके बाद अखिलेश यादव और ओम बिरला के बीच बहस हो गई.
देखिए वीडियो...
जब अखिलेश वाजिब बात कर रहे हैं तो ओम बिड़ला की हंसी को देखिए। इस हंसी में रीढ़ की हड्डी का टेढ़ापन है, संघ की चाकरी के निशान है, भाजपा की क्रूर,नफरती युवा विरोधी सोच है।
अब मुझे पूरा विश्वास है कि इनकी बेटियों के सेलेक्शन में भारी धांधली हुई है नहीं तो कम से कम बच्चों के मुद्दे पर यह थोड़ी संवेदनशीलता दिखाता। ऐसे में जब युवा छात्र घायल हैं लोकसभा अध्यक्ष खीं खीं खीं कर रहा है।
अखिलेश यादव जो कह रहे हैं उसमें बनावटी कुछ नहीं है वह स्वाभाविक गुस्सा है इसी गुस्से की जरूरत है।
मैं अपने पूरे जीवन में एक विकट, घोर अहिंसावादी आदमी रहा हूँ। बचपन से लेकर आज तक मैं किसी को एक थप्पड़ तक नहीं मार सका। शायद ये भगवान ने मुझे ऐसा बनाया है।
जीवन में बहुत मुश्किल वक्त देखे हैं। कई आंदोलनों का हिस्सा रहा हूँ। पुलिस की नाराज़गी भी देखी है, दबाव भी देखा है, लेकिन मैंने कभी धैर्य नहीं खोया। हमेशा समझदारी से काम लिया।
आज आप सबसे हाथ जोड़कर मेरी विनती है कि हमें भी उसी अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए देश की इस सबसे बड़ी समस्या-पेपर लीक के खिलाफ लड़ना है।
और जब लड़ाई एक अहंकारी सरकार से हो, तब अपने सिद्धांतों पर टिके रहना और भी कठिन होता है। लेकिन फिर भी हमें अपने सिद्धांत नहीं छोड़ने हैं।
एक दिन सरकार को भी समझ आएगा कि ये लड़ाई किसी पार्टी के खिलाफ नहीं, देश के युवाओं के भविष्य के लिए है। ये लड़ाई देशहित की है।
मैंने बहुत सारे आंदोलन देखे हैं जो सिर्फ़ limelight में आने या फिर दमन का शिकार होकर वहीं खत्म हो गए। उनसे कुछ हासिल नहीं हुआ।
हमारा मकसद चर्चा में आना नहीं है। हमारा मकसद पेपर लीक खत्म कराना है। मकसद देश के युवाओं का भविष्य बचाना है।
देश की जनता का वोट जब पड़ता है, तो एक जगह सत्ता में बदल जाता है और दूसरी जगह विपक्ष में।
एक पक्ष को सत्ता और दूसरे पक्ष को विपक्ष की ज़िम्मेदारी।
चुनाव जीतने के बाद सरकार केवल अपने मतदाताओं की नहीं बल्कि पूरे देश की सरकार होती है, उन लोगों की भी, जिन्होंने उसे वोट नहीं दिया।
उसी तरह नेता प्रतिपक्ष का पद भी किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में असहमति और जनता की अनसुनी आवाज़ का संवैधानिक प्रतिनिधित्व है।
इसलिए प्रधानमंत्री के पद की गरिमा के साथ नेता प्रतिपक्ष के पद का सम्मान भी उतना ही ज़रूरी है।
यदि नेता प्रतिपक्ष जनता के ऐसे मुद्दे बता रहे हैं, जिन्हें सरकार लगातार नज़रअंदाज़ करती आ रही है, तो उन्हें दबाना या हिरासत में लेना समाधान नहीं है। उनकी बात सुनना, समस्याओं का हल निकालना सरकार की लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी है।
कल दिल्ली में हुई घटनाओं से मन दुखी भी है और गर्व से भरा भी।
हमारे युवाओं और Gen-Z ने साबित कर दिया है कि वे दूसरे देशों के मुकाबले कितने अलग हैं। लाठी और आंसू गैस के बीच संयम, आक्रोश के साथ अहिंसक बर्ताव और दुख में साहस तथा संकल्प - यह भारत के डीएनए की ताकत है। ये बच्चे किसी बहकावे में नहीं आए हैं, वे हमारे अपने बच्चे हैं और देश के भविष्य की बागडोर संभालने वाले हैं। पुरानी पीढ़ी तो सिर्फ कुछ सालों के लिए केयरटेकर भर है।
हमें अब पारंपरिक राजनीति से ऊपर उठकर 'करुणामय शासन' (Compassionate Governance) की आवश्यकता है। करुणा दया या सहानुभूति नहीं, बल्कि दूसरों की पीड़ा को अपनी तकलीफ की तरह महसूस करके संवाद बनाना और निष्पक्ष समाधान निकालना है।
जब मैं दुनिया भर में करुणा के वैश्वीकरण (Globalisation of Compassion) के लिए कार्यरत हूँ, तो अपने देश की सरकार और समाज से भी यही अपेक्षा करता हूँ कि वे इन बच्चों के साथ तुरंत करुणामय संवाद और समाधान का मार्ग अपनाएं।