श्रमिक देश की रीढ़ हैं।
उनका पसीना राष्ट्र की प्रगति की स्याही है।
आज प्रण लें -हम मजदूर को दया नहीं,सम्मान देंगे।
मजदूरी को मजबूरी नहीं,गरिमा मानेंगे।
और हर उस हाथ को सलाम करेंगे जो मेहनत से दुनिया को बेहतर बनाता है।
आज के दिन हमें सिर्फ “Happy Labour Day” लिखकर औपचारिकता पूरी नहीं करनी चाहिए।
हमें यह भी पूछना चाहिए —
क्या हम सच में श्रमिकों का सम्मान करते हैं?
क्या उन्हें उचित मजदूरी, सुरक्षा और सम्मान मिल रहा है?
क्या विकास की दौड़ में उनका जीवन पीछे तो नहीं छूट रहा?
विडंबना देखिए…
जिसके हाथों ने शहर खड़ा किया,
अक्सर उसी के पास रहने को पक्का घर नहीं होता।
जो दूसरों के सपनों को आकार देता है,
उसके अपने सपने रोज़ मजदूरी के साथ तौल दिए जाते हैं।
श्रम सिर्फ काम नहीं है —
यह सम्मान है, यह संघर्ष है, यह जीवन की सच्ची गरिमा है।
सुबह जब शहर जागता है, तब कोई मजदूर पहले से जागा हुआ होता है।
कोई ईंट ढो रहा होता है, कोई सड़क बना रहा होता है, कोई खेत में पसीना बहा रहा होता है, कोई फैक्ट्री की मशीनों के बीच अपने सपनों को दबाकर काम कर रहा होता है।
शायद इसलिए जनता पूछ रही है —
हम वोट देते हैं प्रतिनिधि चुनने के लिए,
या भविष्य के दल-बदल विशेषज्ञ तैयार करने के लिए ?
#ragahvchadha#politics#राज_करने_की_नीति
आज समझ आ गया —
राजनीति में दुश्मनी स्थायी नहीं होती,
सिर्फ़ अवसर स्थायी होता है।
जनता पाँच साल तक भरोसा निभाती है,
और नेता पाँच मिनट में “नई सोच” अपना लेते हैं।
लोकतंत्र में अब बहस कम और
मैनेजमेंट ज्यादा दिखने लगा है।
सबसे बड़ा सवाल ये नहीं कि कौन पार्टी में गया,
सवाल ये है कि —
👉 क्या विचारधारा किराये पर थी?
👉 क्या विपक्ष सिर्फ़ वेटिंग रूम था?
👉 या फिर पहले से ही स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी थी?
आम आदमी पार्टी से राज्यसभा पहुँचे सात सांसदों का अचानक बीजेपी प्रेम देख कर लगता है,
राजनीति अब संघर्ष नहीं रही…
सीधा करियर अपग्रेड प्लेटफॉर्म बन चुकी है।
वोट जनता देती है एक विचार के लिए,
लेकिन नेता शपथ लेते हैं —
“जहाँ सत्ता, वहीं हमारी निष्ठा।”
कल तक जो संसद में बीजेपी को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते थे,
आज वही नेता कमल के साथ फोटो खिंचवाते हुए राष्ट्रहित का नया अध्याय पढ़ा रहे हैं।
जनता सोच रही है —
ये दिल का परिवर्तन है या दिल्ली का प्रबंधन ?
विकास का विरोध नहीं है, लेकिन बिना पारदर्शिता और जनसहमति के विकास लोकतंत्र नहीं, निर्णय थोपना बन जाता है। देश को ऐसी नीतियाँ चाहिए जो किसान भी बचाए, जंगल भी बचाए और भविष्य भी सुरक्षित करे। 🙏🏻 @moefcc
आज फिर विकास और पर्यावरण आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।
विकास का विरोध नहीं है
मैं सरकार से पूछना चाहता हूँ — क्या हम जल संकट का समाधान खोज रहे हैं, या आने वाली पीढ़ियों के लिए नया पर्यावरण संकट तैयार कर रहे हैं?
#KenBetwaLink#Environment#Bharat#DevelopmentWithJustice
👉 जिन गाँवों और लोगों का विस्थापन होगा, उनके पुनर्वास की स्पष्ट और सम्मानजनक योजना क्या है ?
👉 क्या स्थानीय लोगों, किसानों और पर्यावरण विशेषज्ञों से ईमानदारी से संवाद किया गया ?
👉 क्या छोटे-छोटे जल संरक्षण मॉडल, तालाब, वर्षा जल संचयन और स्थानीय समाधान पहले पूरी तरह आज़माए गए ?
सरकार कहती है कि इससे पानी, सिंचाई और बिजली मिलेगी — लेकिन कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनका जवाब देश की जनता जानना चाहती है:
👉 क्या केन नदी में वास्तव में इतना अतिरिक्त पानी है कि उसे दूसरी नदी में भेजा जा सके ?
इस परियोजना से पन्ना टाइगर रिज़र्व का बड़ा हिस्सा डूब क्षेत्र में आ सकता है। सवाल यह है कि जब हम वर्षों से बाघ संरक्षण और पर्यावरण बचाने की बात कर रहे हैं, तो फिर उसी प्रकृति को क्यों नुकसान पहुँचाया जा रहा है ?
केन–बेतवा नदी लिंक परियोजना को बुंदेलखंड के जल संकट का समाधान बताया जा रहा है, लेकिन ज़मीन पर हो रहे विरोध प्रदर्शन कई गंभीर सवाल उठा रहे हैं। विकास ज़रूरी है, लेकिन क्या विकास का मतलब जंगलों, वन्यजीवों और स्थानीय लोगों की कीमत पर होना चाहिए ?
भारतीय रेलवे दिवाली और छठ पूजा सीजन के लिए देश भर में लगभग 12,000 विशेष ट्रेनें चला रही है।ये ट्रेनें विभिन्न मार्गों पर चलती हैं, जिनमें दिल्ली-गया, सहरसा-अमृतसर, छपरा-दिल्ली और मुजफ्फरपुर-हैदराबाद जैसे प्रमुख कनेक्शन शामिल हैं।
और फिर भी यह हाल है रेलवे का ।
@RailMinIndia