जैसे कलिंग विजय ने
अशोक को धम्म की ओर लौटाया,
वैसे ही लौटाया प्रिये! तुम्हारे अस्तित्व ने मुझे मेरी ओर,
मेरे समीप सांप्रदायिक-शौहार्द
भाईचारा-पंथनिरपेक्ष
सब कठिन शब्दार्थ है+
क्या ख़बर,किस हाल में जीते रहे हैं हम,
तेरी यादों के साए तले मरते रहे हैं हम।
न शिकवा, न शिकायत, न कोई इल्ज़ाम तुझ पर,
बस अपनी ही ख़ामियों को गिनते रहे हैं हम।
'अफ़रीन' इश्क़ ने हमसे यही कीमत माँगी,
मर न सके, मर-मर के जीते रहे हैं हम।
~आफरीन कर्मा
#gazal
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तुम नहीं हो सुंदरता से परिचित,
नहीं जान पाते देह से परे
एक 'आत्मा' का मूल्य।
तुम्हारी दृष्टि दर्पण तक सीमित,
नहीं पहचान पाते रूप से परे का अस्तित्व।
इस तरह हर बार चूक जाओगे तुम,
दैहिक-सौंदर्य के पीछे भागते-भागते।
और किसी रोज,
तुम्हारे सामने एक सुंदर हृदय होगा+
किसी ने पूछ ही डाला कि मुस्कुराते क्यों नहीं अब तुम,
मैंने आँखों से ही हर किस्सा बयान कर दिया आखिर।
'आफ़रीन' अब किसी से उम्मीद-ए-वफ़ा बाकी नहीं रखती,
हर एक रिश्ते को तक़दीर के हवाले कर दिया आखिर।
~ तिनका हूँ
#ज़र्रा_मात्र_हूँ
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मैंने चाहा था तुझको आख़िरी हद तक इबादत में,
मगर तूने मोहब्बत को तमाशा कर दिया आखिर।
मेरे जज़्बात की कद्र किसी ने भी नहीं की, फिर भी
मैं अपने दर्द को खुद ही सहारा कर लिया आखिर।+
मोहब्बत तुमसे नफ़रत है, ये कहना भी जरूरी था,
तुझे दिल से निकालने का बहाना कर लिया आखिर।
अब इतनी भी नहीं हिम्मत कि फिर से दिल लगाऊँ मैं,
मैंने खुद को अकेलेपन के हवाले कर दिया आखिर।+