Happy बकरा ईद
बकरीद दलित, पिछड़े और आदिवासियों का त्योहार है,
क्योंकि भेड़, ब��री और कुर्बानी के दूसरे जानवरों का 90 फीसदी पशुपालन कार्य भारत में
दलित, पिछड़े और आदिवासी समाज के लोग ही करते हैँ,
बकरे भारतीय पशुपालकों के ATM होते हैँ,
जिन्हें पशुपालक कभी भी बेचकर कैश करा लेते हैँ,
ऊपर ऊपर से एक अनुमान के मुताबिक बकरा ईद पर भारत में एक लाख करोड़ के आसपास भेड़ और बकरों की बिक्री होती है,
जिसमें से 85 फीसदी रकम दलित, पिछड़ों और आदिवासी समाज के पशु पालकों के घर में जाती है,
और बकरा ईद में बाजार और डिमांड तेज होने से दाम भी ज्यादा मिलता है,
तो हुआ ना ये भारत के दलित, पिछड़ों और आदिवासियों का त्योहार
तो इसलिए सबको Happy बकरा ईद,
भीख तो PM Care फंड भी था…
जिसका हिसाब अभी तक नहीं दिया गया.. भीख तो बीजेपी पार्टी फंड भी था, भीख तो इलेक्टोरल बॉन्ड्स भी थे… ओह सॉरी, वो तो एक्सटॉर्शन था… टैक्सपेयर्स के पैसों से तो तुम जैसे चाटुकार पत्रकार बीजेपी का प्रोपेगेंडा चला रहे हो… टैक्सपेयर्स के पैसों को तुम जैसे सरकारी एजेंट बर्बाद कर रहे हैं।
हमारी कंपनी एक नॉट-फॉर-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन है, जो जनता के पैसों से चलती है और जनता के लिए काम करती है। इसे भीख नहीं सेवा कहते हैं। तुम नहीं समझोगे।
और हाँ, ये स्विट्ज़रलैंड नहीं है। आँख फाड़ के देख, कश्मीर है।
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"Aunty exposed Hindutva hypocrisy." 🔥
"Why Hindus can't compete with Muslims?"❌
Bcoz Muslims don't practice untouchability with other Muslims. Caste may exist among Muslims, but it has no religious sanction.
In Hinduism, caste decides social status.
“वंदे मातरम्” को राष���ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और आयोजनों में इसकी समस्त पंक्तियों को अनिवार्य करना केंद्र सरकार का न केवल एक पक्षपाती और ज़बरदस्ती थोपा गया फैसला है, बल्कि यह संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला और अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनने का निंदनीय प्रयास है। मुसलमान किसी को वंदे मातरम् पढ़ने या उसकी धुन बजाने से नहीं रोकते, मगर क्योंकि उसकी कुछ पंक्ति���ाँ बहुदेववादी आस्था पर आधारित हैं और मातृभूमि को ईश्वर के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जो एकेश्वरवादी धर्म की आस्था से टकराती हैं, इसलिए मुसलमान, जो केवल एक अल्लाह की वंदना करता है, उसको इसे पढ़ने पर विवश करना संविधान की धारा 25 और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का खुला उल्लंघन है।
आज इस गीत को अनिवार्य कर देना और नागरिकों पर थोपने का प्रयास वास्तव में देशप्रेम नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडे और जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने की सोची-समझी चाल है। मातृभूमि से प्रेम का आधार नारे नहीं, बल्कि चरित्र और बलिदान हैं, जिनका उज्ज्वल उदाहरण मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद का अभूतपूर्व संघर्ष है। इस प्रकार के फ़ैसले देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमज़ोर करने के साथ-साथ संविधान का भी उल्लंघन हैं।
याद रखिए! मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है। हम सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, मगर अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना कभी स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिए वंदे मातरम् को अनिवार्य कर देना संविधान की आत्मा, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खुला हमला है।
#ArshadMadani
#vandematram
सर, आपके प्रति पूरी आदर जताते हुए यहां मै आपसे थोड़ा सा असहमत हूं.. हिजरत का मतलब भागना नहीं होता..ये उस शब्द का सामान्यीकरण करना है.
यह शब्द पैगंबर मुहम���मद और उनके अनुयायियों के उत्पीड़न से बचने के लिए मक्का से मदीना जाने की ऐतिहासिक घटना को संदर्भित करता है..
आप हम जैसे बहुतों के लिए रोल मॉडल हैं..
आपसे शब्दों के सामान्यीकरण की उम्मीद नहीं थी.🙏
इतिहास और आस्था से जुड़ी घटनाओं के लिए शब्दों का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है। पैग़ंबर मुहम्मद (PBUH) के मक्का से मदीना जाने को 'भागना' कहना न केवल भाषाई रूप से गलत है, बल्कि यह उस महान ऐतिहासिक घटना 'हिजरत' (Hijrat) का अपमान भी है। वह अल्लाह के आदेश पर एक सोची-समझी यात्रा थी, न कि किसी डर से पलायन। राजनीति के लिए धार्मिक उदाहरण देते समय गरिमा का ध्यान रखना चाहिए।
किसी भी धर्म के इतिहास को बयां करते समय सही शब्दावली का उपयोग करना अनिवार्य है। जिसे आप 'भागना' कह रहे हैं, उसे 'हिजरत' कहा जाता है, जहाँ से इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत होती है। यह सत्य और न्याय की स्थापना के लिए किया गया एक रणनीतिक प्रवास था। 'अजनबी' और 'भगोड़ा' जैसे शब्दों का प्रयोग इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने जैसा है।
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स्मार्ट बनो, अफवाहों से बचो
अगर आपका जन्म 1 अक्टूबर 2023 से पहले है, तो बिना बर्थ सर्टिफिकेट के भी आसानी से पासपोर्ट बन सकता है। Passport Seva की ऑफिशियल वेबसाइट पर Document Advisor चेक कर लो।
क्या ये जान���ारी काम की लगी?
इस थ्रेड को Like + Retweet करो और उन दोस्तों को Tag करो जो पासपोर्ट बनवा रहे हैं!
त्रिपुरा के एक छोटे से गाँव में जहाँ 40-50 मुस्लिम परिवार रहते हैं वहाँ की इकलौती मस्जिद को बरबरियत से तोड़ दिया गया।
मकान जलाया गया, दुकान जलाया गया, मस्जिद का एक एक समान जलाया गया
अब @cricketaakash को अधिकारिक तौर पर किसी दक्षिणपंथी संगठन में शामिल हो जाना चाहिए। इस नफ़रती कुंठित जीव को आपत्ति है कि भारतीय सेलेब्रिटीज़ ने ऑल आइज़ ऑन राफाह चलाया था। इस नफ़रती कुंठित जीव को पता होना चाहिए कि बांग्लादेश में हालिया घटनाक्रम में जितने हिन्दू मरे हैं, उसके पांच गुणा भारतीय भारत में भारत के लोगों द्वारा बांग्लादेशी बताकर मार दिए गए हैं। लेकिन इस बेग़ैरत बेशर्म, कुंठित, सांप्रदायिक जीव का हलक सूख जाएगा, अगर ये उन हत्याओं की निंदा कर देगा।