यह अँगूठी सखि! निरख एकान्त की
जड़ चलो हीरा उपस्थिति का
सुहागन जड़ चलो!
दामिनी भुज की
संयम की..
अँगुली छिगुनी
पहिन कर बैठे जरा
नीलम भरे जल खेत में..
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माखनलाल चतुर्वेदी
पत्थर उसे न जान पिघलता भी देख उसे
ख़ुद अपने तर्ज़ुबात में जलता देख उसे,
वो सिर्फ़ जिस्म ही नहीं एहसास भी तो है
रातों में चाँद बन के निकलता भी देख उसे..।।
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क़तील शिफ़ाई
@iawoolford ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने की रुत रोज़ आती नहीं
हुस्न और इश्क़ दोनो को रुसवा करे
वो जवानी जो खूँ में नहाती नहीं
आज धरती बनी है दुल्हन साथियों
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों
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कैफ़ी आज़मी | #जन्मदिवस
जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिए।
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिए।
जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को,
किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिए।
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अदम गोंडवी
अगले चुनाव में
मैं घास के पक्ष में
मतदान करूंगा
कोई चुने या न चुने
एक छोटी सी पत्ती का बैनर उठाए हुए
वह तो हमेशा मैदान में है।
कभी भी
कहीं से भी उग आने की
एक जिद है वह
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केदारनाथ सिंह
#UPElection
सबकुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सच है दुनियावालों के हम हैं अनाड़ी
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शैलेन्द्र
( मशहूर फ़नकार शंकरदास केसरीलाल उर्फ़ शैलेंद्र जी की पुण्यतिथि पर सादर नमन )