"Sochta hoon tujhe aur sochte sochte kho jata hoon; teri tishnagi iss qadar hai mujh mein jo chahoon vo ho jata hoon.. kabhi dhoondta hoon khud ko tujh mein, kabhi tujh ko khud mein; ishq is Qadar haavi hai mujh pe, Main main nahi rehta tu ho jaata hoon!" #byme#maahi#shair
Tragedies like this often occur due to a "window of vulnerability" or Cold Chain Failure. If the vaccine isn't stored at 2°C-8°C constantly, it loses potency.
4 ways to prevent this from happening to you
1️⃣ The 15-Minute Flush: Immediately wash the wound with soap and RUNNING water for 15 mins. This is the single most effective way to kill the virus at the entry point.
2️⃣ Demand the RIG: For broken skin (Category III), you need RIG (Rabies Immunoglobulin) inside the wound, not just the vaccine in your arm. RIG provides instant antibodies while the vaccine takes 7-14 days to work.
3️⃣ Choose the Right Hospital: Avoid small, local clinics that might have frequent power cuts or poor refrigeration. Go to a major government hospital where cold chain protocols (backup generators/medical fridges) are strictly monitored.
4️⃣ Zero Delay: If the bite is near the face/neck, the virus reaches the brain faster. Start the treatment within hours, not days.
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मैं तुम्हें लिख रहा हूं, आओ पढ़ो,कि गीता हो जाए
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मैं लिखूँगा तुम्हें, पढ़ोगी क्या,
मेरे शब्दों में खुद को ढूँढोगी क्या…
आओ पढ़ो कि शब्द शंकर हो जाएँ,
आओ पढ़ो कि भाव भागवत हो जाएँ…
आओ पढ़ो कि सांसें मंत्र हो जाएँ,
आओ पढ़ो कि धड़कनें आरती हो जाएँ…
आओ पढ़ो कि स्पर्श स्तुति हो जाए,
आओ पढ़ो कि नज़रें निवेदन हो जाएँ..
मैं जो लिखूँ, वो सिर्फ़ इज़हार न हो,
वो तुम्हारी आत्मा का विस्तार हो जाए…
पर डर है कहीं शब्द कम न पड़ जाएँ,
कहीं तुम मेरी खामोशी पढ़ न पाओ…
आओ पढ़ो कि रातें दीपक हो जाएँ,
आओ पढ़ो कि अँधेरे ज्योतिर हो जाएँ…
आओ पढ़ो कि विरह, व्रत हो जाए,
आओ पढ़ो कि मिलन तप हो जाए…
मेरी स्याही में जो जलता है, वो प्रेम है,
कोई क्षणिक चाह नहीं, एक नेम हो जाए…
आओ पढ़ो कि धड़कनें श्लोक हो जाएँ,
आओ पढ़ो कि होंठ तुम्हारा नाम जप जाएँ…
मैं तुम्हें ऐसे लिखूँ जैसे कोई ध्यान लिखता है,
हर पंक्ति में अपना संपूर्ण समर्पण रखता है…
आओ पढ़ो कि दूरी दर्शन हो जाए,
आओ पढ़ो कि चुप्पी वचन हो जाए…
मैं लिखूँ तुम्हें ऐसे, जैसे कोई ऋषि तप करे,
तुम पढ़ो मुझे ऐसे, जैसे गंगा मन में उतर जाए…
आओ पढ़ो कि कागज़ कैलाश हो जाए,
आओ पढ़ो कि प्रेम ही परमेश्वर हो जाए…
आओ पढ़ो कि प्रेम, मार्ग हो जाए,
आओ पढ़ो कि तुम, मेरा भाग हो जाएँ…
अगर तुम पढ़ो तो मैं पूर्ण हो जाऊँ,
अगर तुम ठहरो तो मैं मूल हो जाऊँ…
कहीं तुम पढ़कर मुस्कुरा दो,
कहीं मैं लिखकर रो पड़ूँ…
मैं लिखूँगा तुम्हें, पढ़ोगी क्या,
मेरे लिखे में खुद को जीओगी क्या…?
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- Rahul Rahi 🤗🌷
अब तसल्ली की कोई सूरत नहीं है
हमने चाहा ही नहीं, ये भी ग़लत नहीं है
तू जो पास है तो भी तन्हा हूँ मैं
तेरे जाने की भी अब हसरत नहीं है
हमने रिश्तों को यूँ ही ओढ़ा था
दिल के ज़ख़्मों की कोई कीमत नहीं है
वो जो हँसती है, बहुत बेवजह
शायद रोने की उसे फुर्सत नहीं है
मैंने खुद को ही गँवा दिया उसमें
अब किसी और की मुझमें हिम्मत नहीं है
ये जो जीने का दावा करते हैं लोग
इनके मरने में भी कोई शिद्दत नहीं है…
- मलाल 🍁
तेरी ख़ामोशी को आँखों से लगाए हुए हैं,
रू-ब-रू हम तिरी तस्वीर के आए हुए हैं !!
वो जो देखे से भी देखे नहीं जाते वही ख़्वाब,
मेरे देखे हुए हैं तेरे दिखाए हुए हैं !!
आँख ऐसे है कि जैसे अभी आता है कोई,
हाथ ऐसे हैं कि बस फूल उठाए हुए हैं !!
~ शाहीन अब्बास
अब उस दिल-ए-तबाह की हालत ना पूछिए
बेनाम आरज़ुओं की लज़्ज़त ना पूछिए।
इक अजनबी था रूह का अरमान बन गया
इक हादसा था प्यार का उनवान बन गया।
मंज़िल का रास्ता मुझे दिखला गया कोई।
~ कलीम उसमानी
N/N https://t.co/IHwBR6Xx3e
पहले वो मुझको देखकर बरहम-सी हो गई,
फिर अपने ही हसीन ख़यालों में खो गई।
बेचारगी में मेरी उसे रहम आ गया,
शायद मेरे तड़पने का अंदाज़ भा गया।
साँसों से भी क़रीब मेरे आ गया कोई।
2/N
ज़िन्दग़ी की राह में टकरा गया कोई
इक रोशनी अँधेरे में दिखला गया कोई।
वो हादसा वो पहली मुलाक़ात क्या कहूँ,
कितनी अजब थी सूरत-ए-हालात क्या कहूँ।
वो क़हर, वो ग़ज़ब, वो जफ़ा मुझको याद है,
वो उसकी बेरुख़ी की अदा मुझको याद है।
मिटता नहीं है ज़ेहन से यूँ छा गया कोई।
1/N
बड़ी मुश्किल से छुपाया है कोई देख न ले
आँख में अश्क जो आया है कोई देख न ले
ये जो महफ़िल में मिरे नाम से मौजूद हूँ मैं
मैं नहीं हूँ मिरा धोका है कोई देख न ले
सात पर्दों में छुपा कर उसे रक्खा है मगर
दिल को अब भी यही धड़का है कोई देख न ले
डर रहा हूँ कि सर-ए-शाम तिरी आँखों में
मैं ने जो वक़्त गुज़ारा है कोई देख न ले
हाथ नरमी से छुड़ाती हुई ख़ल्वत ने कहा
ये जो ख़ल्वत है तमाशा है कोई देख न ले
तेरा मेरा कोई रिश्ता तो नहीं है लेकिन
मैं ने जो ख़्वाब में देखा है कोई देख न ले
साथ चलना है तो ग़ैरों की तरह साथ न चल
शहर का शहर शनासा* है कोई देख न ले
- ज़ावेद सबा
*जान पहचान वाला
खामोशी जहर, अंधेरा अजाब लगने लगा,
अकेलापन मुझे कबसे खराब लगने लगा,
हम इंतजार में थे कब जवाब देगा हमें,
अब इंतजार ही उसका जवाब लगने लगा ।
बालमोहन पांडेय जी
कोई उम्मीद बाकी थी ही नहीं,
इसलिए कुछ सफाई दी ही नहीं,
मैं उसे छोड़ कर चला आया
वो मुझे छोड़कर गई ही नहीं,
आज वो ऐसे जानती है मुझे,
जैसे वो मुझको जानती ही नहीं।
अश्वनी मित्तल जी
वो दिन भी थे कि इन आँखों में इतनी हैरत थी
तमाम बाज़ीगरों को मिरी ज़रूरत थी
वो बात सोच के मैं जिस को मुद्दतों जीता
बिछड़ते वक़्त बताने की क्या ज़रूरत थी
पता नहीं ये तमन्ना-ए-क़ुर्ब कब जागी
मुझे तो सिर्फ़ उसे सोचने की आदत थी
ख़मोशियों ने परेशाँ किया तो होगा मगर
पुकारने की यही सिर्फ़ एक सूरत थी
गए भी जान से और कोई मुतमइन न हुआ
कि फिर दिफ़ाअ' न करने की हम पे तोहमत थी
कहीं पे चूक रहे हैं ये आइने शायद
नहीं तो अक्स में अब तक मिरी शबाहत थी
- शारिक कैफ़ी
रह कर भी तुझ से दूर तिरे आस-पास हूँ
हिज्राँ में जल रही हूँ मैं जैसे कपास हूँ
क़ब्ज़ा किया है किस ने ये मेरे शुऊ'र पर
इक उम्र हो गई है मुझे बद-हवास हूँ
दुनिया न देख पाएगी तेरा कोई भी ऐब
मुझ को पहन के देख मैं तेरा लिबास हूँ
जिस से मिरा सुकून भी देखा नहीं गया
दा'वा वो कर रहा है तिरा ग़म-शनास हूँ
मैं मुस्कुरा के बात तो करती हूँ ऐ 'सिया'
अब किस को मैं बताऊँ की कितनी उदास हूँ
- सिया सचदेव 🌻
मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल
तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल
तू नई सुबह के सूरज की है उजली सी किरन
मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल
अपनी ख़ुशियाँ मिरे आलाम से मंसूब न कर
मुझ से मत माँग मिरा नाम मिरे साथ न चल
तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह
देख ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मिरे साथ न चल
मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा 'शकील'
टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल
- शकील आज़मी 🌻