“अगर आपके बच्चे होते, तो क्या आप उन्हें ऐसी ही सुविधा देते?”
- ये सवाल उस बच्ची का है, जो स्कूल में शिक्षकों की कमी, जर्जर भवन और सुविधाओं की किल्लत पर आवाज उठा रही है
मामला राजस्थान के अलवर का है, जहां स्कूली छात्र-छात्राएं धरने पर बैठी हैं। देश में GEN Z के बाद अब GEN Alpha अपना हक मांग रहे हैं।
अच्छी शिक्षा और स्कूल में सुविधाएं बच्चों का हक हैं, BJP सरकार में जिनके लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है।
ऐसी सरकार को शर्म आनी चाहिए!!
Bharatiya Kisan Union (Ekta Ugrahan) has announced that it will join the ongoing students' protest at Jantar Mantar in Delhi. The farmers' union will march to the national capital on July 27 and has said its members will remain in Delhi until the students' demands are accepted.
जिसकी ख़ुद की डिग्री फर्जी हो, वह युवाओं की डिग्रियों का क्या सम्मान करेगा?
इसलिए हमें अच्छी शिक्षा, अच्छे रोज़गार और बेहतर व्यवस्था के लिए आवाज़ उठानी होगी।
ये मधु किश्वर को तो लोग बेकार ही बदनाम कर रहे है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और उनके रंगलियों का असली पोल तो इस कपिल मिश्रा ने खोला है. वैसे आजकल ये कपिल मिश्रा दिल्ली की बीजेपी सरकार में बीजेपी के मंत्री हैं.
मेरी किताब "जाति जनगणना : जात से जमात की ओर" पर अपनी टिप्पणी करते हुए प्रख्यात शिक्षाविद् और युवाओं के बीच ख़ासे लोकप्रिय विचारक @masijeevi जी ने जो बातें कही हैं, उसने जाति जनगणना के तकनीकी पहलू से लेकर उसकी राजनीति की व्यापकता को उजागर किया।
साथ ही उसके पीछे के खेल को भी उन्होंने बहुत बारीकी से समझाया। मेरी किताब के बहाने एक नये संदर्भ और आयाम जोड़ने के लिए आभार, सत्ता प्रायोजित ट्रोलर के लिए बहुत सामग्री है, मगर एक गंभीर विमर्श के लिए बहुत से सूत्र हैं। पूरी बात ज़रूर सुनिएगा।
किताब इस लिंक पर मिलेगी-
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डॉ. विजेंद्र सिंह चौहान जी की पूरी बात इस लिंक पर मिलेगी-
https://t.co/zwGiaZVNff
देश के सबसे ज़रूरी सवाल #जाति_जनगणना पर अब खुलकर बात होने की ज़रूरत है क्योंकि साज़िशों का नया दौर आ रहा है. अपने पॉडकास्ट में दीपक ने मेरी किताब को याद किया. शुक्रिया.
शिक्षाजोति सावित्रीबाई फुले जयंती के दिन ही #प्रोफ़ेसर_की_डायरी दो साल पहले आई थी. आज उसी दिन जाति जनगणना पर अपनी नई किताब आप सभी को समर्पित करता हूँ.
जाति जनगणना के मायने क्या हैं? गिनने का दर्शन क्या है? जनगणना में जाति गिनने का इतिहास क्या है? क्या अशोक से लेकर अकबर के काल में इसके सबूत मिलते हैं? क्या अंग्रेजों ने जातियाँ गिनकर जातिवाद फैला दिया? जाति जनगणना ने क्या प्रभाव पैदा किया? मंडल आंदोलन से लेकर बहुजन आंदोलनों के बीच सामाजिक न्याय की लड़ाई का जनगणना से रिश्ता क्या है? आदिवासी, दलित और पिछड़ी जातियों की पहचान का जनगणना से क्या रिश्ता है? यह किताब ऐसे तमाम सवालों को लेकर बेचैनी का नतीजा है।
हालाँकि दूसरी वजह ज़्यादा ख़ास है। जाति जनगणना सुनकर अब आपको ऐसा भी लग सकता है कि जाति जनगणना की घोषणा हो चुकी हो, तब इस किताब की क्या ज़रूरत? देश का सबसे बड़ा मुद्दा अचानक बहस से ग़ायब क्यों हो गया? राजनीति से लेकर समाज और बौद्धिक तबके में भी एक अजीब सी चुप्पी छा गई है। मुझे ये चुप्पी चुभती है। इस चुप्पी को तोड़ने की एक कोशिश है यह किताब। आइए, तथ्य तर्क के साथ नई बहस शुरू करते हैं।
सवाल ये है कि जो कल तक जाति जनगणना के मुखर विरोधी थे, उन्होंने आपात स्थितियों में जाति जनगणना कराने का फ़ैसला क्यों लिया? कहीं ये कोई साज़िश तो नहीं? अगर जाति जनगणना होती भी है, तो आँकड़ों के साथ खिलवाड़ के कौन से खेल खेले जा सकते हैं? और सबसे अहम बात, जाति जनगणना के बाद क्या बदलेगा? कौन सी नई उपलब्धियों और चुनौतियाँ बहुजनों के सामने आयेंगी? ये सवाल आपके भी बनें, इसलिए यह किताब पढ़ें।
आज से #जाति_जनगणना की प्री-बुकिंग शुरू हो रही है। किताब विश्व पुस्तक मेले में आ जाएगी। आज ही अपनी प्रति बुक कराएँ। यक़ीन है इस बार आप सभी का प्रेम और ज़्यादा मिलेगा। आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा। एक बार फिर से अपने प्रकाशक @UnboundScript को शुक्रिया. संपादक मित्र आशीष और प्रकाशक अलिंद माहेश्वरी जी समेत पूरी टीम का आभार.
प्री-बुकिंग अमेज़न लिंक-
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'विद्रोही होगा हमारा कवि'
रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ सिर्फ़ एक कवि नहीं थे; बल्कि हमारे साझा स्वप्नों और संघर्षों की उस बेचैनी का नाम थे, जो सदियों से जाति, पूंजी, पितृसत्ता और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ सुलग रही है। उनकी कविता न तो नज़्म थी और न ग़ज़ल। वह लोक की बहुप्रतीक्षित ललकार थी। विद्रोही की कविताएँ ऐसी हैं, जिन्हें गाया नहीं, हक़ की लड़ाई में नारों की मानिंद आसमान में उछाल कर पीढ़ियों को हौसला दिया जाता है।
विद्रोही पर बहुत कम बात हुई। उससे भी कम लिखा गया। प्रगतिशील ख़ेमे के एक तबके ने ही ये हिम्मत की। कुछ जुनूनी हिम्मत करने वालों की कोशिशों के चलते कुछेक लेख और एकाध किताबें ही आ सकीं। अब एक और नायाब कोशिश आपके हाथ होगी। एक गंभीर अध्येता, सहज अध्ययनशील युवा लेखक और इस किताब के संपादक संतोष अर्श ने बहुत ही लगन से यह किताब सहेजी है। @UnboundScript प्रकाशन ने बहुत मन से ये किताब सजाई है।
आयोजन में आइए, बातचीत करेंगे। आने से पहले अगर आप किताब के साथ आएँगे, तो हमारी बातचीत और सार्थक होगी। इस लिंक पर जाकर अपनी प्रति बुक करें।
किताब मँगवाने का लिंक-
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विद्रोही होना क्या है, उसे हिम्मत, हौसले के साथ वैचारिकी की बेलौस ख़ालिस टटकी इबारतों में पढ़ना होगा। एक उदाहरण देखिए-
"मैं किसान हूँ
आसमान में धान बो रहा हूँ।
कुछ लोग कह रहे हैं,
कि पगले आसमान में धान नहीं जमता,
मैं कहता हूँ कि
गेगले-घोघले
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है,
तो आसमान में धान भी जम सकता है।
और अब तो
दोनों में एक होकर रहेगा—
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा।"
विद्रोही को पढ़ने के पहले महसूस करने की ज़रूरत है, क्योंकि विद्रोही कवि के साथ और शायद कवि से पहले हमारे दौर की बेचैनी का रचनात्मक दस्तावेज़ रचते हैं। विद्रोही की नज़र कितनी गहरी, समझ कितनी व्यापक और कहने की कितनी साफ़गोई है, जो कभी कबीर की याद दिलाने लगती है। एक बानगी देखिए-
मैं कवि हूँ,
कर्ता हूँ,
क्या जल्दी है,
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित,
दोनों को एक ही साथ
औरतों की अदालत में तलब कर दूँगा,
और बीच की सारी अदालतों को
मंसूख कर दूँगा।
मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूँगा,
जिन्हें श्रीमानों ने
औरतों और बच्चों के ख़िलाफ़ पेश किया है।
मैं उन डिक्रियों को निरस्त कर दूँगा,
जिन्हें लेकर फ़ौजें और तुलबा चलते हैं।
मैं उन वसीयतों को ख़ारिज कर दूँगा,
जिन्हें दुर्बल ने भुजबल के नाम की होंगी।
मैं उन औरतों को
जो कुएँ में कूदकर या चिता में जलकर मरी हैं,
फिर से ज़िंदा करूँगा,
और उनके बयानात को
दुबारा क़लमबंद करूँगा,
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया!
कि कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया!
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई!
विद्रोही पर संतोष अर्श की किताब पर बात करने के लिए एक और कविता पढ़िए, फिर आइएगा, इस शानदार कविता के साथ ये न्यौता -
"हम कौन हैं क्या ये भी नहीं ज्ञात है
हम कमेरों की भी क्या कोई जात है
हम कमाने के खाने का परचार ले
अपना परचम लिए अपना मेला लिए
आख़िरी फ़ैसले के लिए जाएँगे
अपनी महफ़िल लिए अपना डेरा लिए
उधर उस तरफ़
ज़ालिमों की तरफ़
उनसे कहने की गर्दन झुकाओ चलो
अब गुनाहों को अपने क़बूलों चलो
दोस्तों उस घड़ी के लिए अब चलो
और अभी से चलो उस ख़ुशी के लिए
जिसके ख़ातिर लड़ाई ये छेड़ी गई
जो शुरू से अभी तक चली आ रही
और चली जाएगी अंत से अंत तक
हम ग़ुलामी की अंतिम हदों तक लड़ेंगे..."
Sontag Mag’s third volume is now live, featuring an interview with Chinese-American poet Haolun Xu and poetry and translations by Tajudeen Muadh, Fran Fernández Arce, Areeb Ahmad, and Zary Fekete, amongst others.
Read it here https://t.co/oYpzntbu0Z
Community libraries in Bhopal are sparking a reading revolution, led by Saba Khan, who opened the first free library in Bagh Farahat Afza, offering children from diverse communities a place to gather, read, and grow through stories.
Read for more details👇
#PanchayatiRaj#MoPR
Comrade Sitaram Yechury’s final journey from the AKG Bhavan- CPIM party office to AIIMS, where his body will be donated for research purposes.
Farewell, Comrade! Your life will continue to inspire generations of young communists in the years to come. Lal Salaam! ✊🏽♥️