एक किताब जो सुनाती है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की असली दास्तान: Must Read
इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार श्याम लाल यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की कार्यप्रणाली और उनके राजनीतिक जीवन पर अद्भुत किताब लिखी है। यह किताब उत्तर प्रदेश की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए।
'At the Heart of Power: The Chief Ministers of Uttar Pradesh' नाम की यह किताब आजादी के बाद से यूपी के टॉप राजनीतिक नेतृत्व के बारे में जानकारियों का भंडार है जिसमें मुख्यमंत्रियों की जिंदगी के भावनात्मक पहलुओं को भी छुआ गया है। वर्तमान में हम जिन नेताओं को स्टालवार्ट्स में गिनते हैं उनकी शुरुआती राजनीति कैसी रही है, इसके उदाहरण भी मिलते हैं।
विश्वनाथ प्रताप सिंह और हेमवती नंदन बहुगुणा से जुड़ी कहानियां। वीरभद्र सिंह। मुलायम सिंह। मायावती जैसे नेताओं की जिंदगी से जुड़े अनगिनत किस्से।
यह किताब पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए Must Read है। @RTIExpress
बात तो सही है...भुगतना पड़ेगा।।
भगवान राम के अनादर से लेकर महापुरुषों के अपमान तक का...सपा का ये लंबा इतिहास रहा है... एक वर्ग को साधने में आप क्या-क्या खो देंगे ये आपको समझ नहीं आएगा.
सपा को ‘गहरा घाव’ देंगे राणा सांगा, अभी मुद्दा थमा नहीं है, चुनाव में दिखेगा असर
राणा सांगा विवाद पर समाजवादी पार्टी पहले दिन से पूरी तरह से पक्ष लेती नजर आई है। पहले सपा सांसद रामजी लाल सुमन के बयान के बाद पार्टी की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया। यह नहीं कहा गया कि यह बयान सुमन का निजी बयान है। लेकिन जैसे ही सुमन के घर पर हमला हुआ तो इसे पिछड़े समाज पर हमला बता दिया गया।
अखिलेश यादव खुद आगे आए और उन्होंने इसे दलित समुदाय पर हमले से जोड़ दिया। कुल मिलाकर राणा सांगा के बयान पर समाजवादी पार्टी ने एक बार भी डिफेंसिव मोड नहीं दिखाया। खुद रामजीलाल सुमन इतिहास का हवाला देकर कहते रहे कि वो अपने बयान पर कायम हैं। क्या इस मुद्दे पर सपा के वैचारिक लोगों ने इतिहास खंगालने की कोशिश की? शायद नहीं। सिर्फ यह कोशिश की गई कि यह मुद्दा सवर्ण बनाम दलित का हो जाए। अभी तक ऐसा ही दिख रहा है।
अब राणा सांगा विवाद की गर्मी थोड़ी कम होती दिख रही है लेकिन यह पूरी तरीके से खत्म नहीं हुई है। राणा सांगा को केवल राजपूत समाज नहीं बल्कि सभी जातीय समूहों में नायक की तरह देखा जाता रहा है।
पूरे विवाद के दौरान ऐसा लगा जैसे समाजवादी पार्टी इस मुद्दे पर पिछड़ा-दलित पॉलिटिक्स कर रही है। दूसरी तरफ राजपूत संगठन समेत तमाम हिंदूवादी संगठन लगातार इस बयान का विरोध करते रहे हैं।
दरअसल राणा सांगा पर दिए गए बयान को समाजवादी पार्टी की बदली हुई रणनीति का लॉन्च पैड माना जा सकता है। इस विवाद पर बयान देने के दौरान सपा नेताओं ने बार-बार ऐतिहासिक तथ्यों की तरफ इशारा किया। लेकिन कभी यह नहीं माना कि बाबर को भारत बुलाए जाने को लेकर कई मत हैं।
सपा नेता इतनी जोर देकर राणा सांगा की बात को ऐतिहासिक तथ्य बताते रहे कि दूसरे किसी मत के लिए जगह ही नहीं छोड़ी। जबकि सच यह है कि राणा सांगा द्वारा बाबर को बुलाए जाने के कोई भी प्रमाण भारतीय नहीं हैं।
सपा ने इस मामले में राणा सांगा की आड़ लेकर दलित-पिछड़ा राजनीति का कार्ड खेला। जबकि सपा सांसद के घर पर हमला करने वालों ने भी किसी जाति के खिलाफ कोई अभियान नहीं छेड़ा था। करणी सेना की तरफ से भी साफ किया गया कि उनका विरोध केवल रामजी लाल सुमन के बयान पर है। हालांकि यह भी सच है कि राणा सांगा विवाद में करणी सेना द्वारा उठाए गए कदम ने ही सपा को यह मौका भी दिया कि वह दलित-पिछड़ा कार्ड खेल सके।
लेकिन राणा सांगा का सम्मान सिर्फ करणी सेना से जुड़ा हुआ नहीं है। समाजवादी पार्टी यह भूलकर रही है कि सांगा का सम्मान निचली जातियों में नहीं है। यह भूल उसे भारी पड़ सकती है। आगामी चुनावों में इसकी बानगी दिखेगी।
बल्लीमारान की जनता ने इलाके की सबसे बड़ी समस्या पर अपनी राय व्यक्त की और विधायक के प्रदर्शन व संभावित बदलावों को लेकर अपनी अपेक्षाएं साझा कीं। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के प्रति उनकी सोच जानने के लिए पूरी रिपोर्ट देखें।
#DelhiElections2025#Delhi | @akashsingh_du
इन लोगों ने ही तो बेड़ागर्क किया है....नेता बनने का शौक चढ़ा है...अच्छे पढ़े-लिखे इंसान हो आपके ज्ञान का सम्मान है...लेकिन क्यों बेवजह एजेंडा चलाते हो ये समझ से परे है...
It would be a constricted/dogmatic thinking that the BJP in West Bengal is only adept of subterfuge & manipulations! For significant growth/expansion any political party cannot just rely on a single strategy of ‘Political Permutation/Combination’ where 1+1 at times also become11.