पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में पुष्पेश पंत के साथ हुआ यह प्रश्नोत्तर अत्यंत रोचक है। यह केवल नेहरू की उपलब्धियों का गुणगान नहीं करता, उनके व्यक्तित्व, विचार और राजनीतिक प्राथमिकताओं के कई ऐसे पक्ष खोलता है, जिन पर सामान्यतः चर्चा नहीं होती।
यह भी नहीं है कि पुष्पेश पंत नेहरू के समर्थक होने के कारण महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल या दूसरे नेताओं को खारिज कर रहे हैं। उनके पास इतिहास को देखने की अपनी स्वतंत्र दृष्टि है, जिससे आप सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन उनकी बातों को सुनना इसलिए जरूरी है, क्योंकि वे हमारी बनी-बनाई धारणाओं को थोड़ा विचलित करती हैं और इतिहास को किसी एक नायक या एक विचारधारा की कैद से बाहर देखने के लिए प्रेरित करती हैं।
यह बहुत छोटी-सी क्लिप है, लेकिन इसे ध्यान से सुनिए। संभव है कि इसके बाद आपके भीतर कुछ नई जिज्ञासाएँ जन्म लें, कुछ पुराने विश्वास प्रश्नों के घेरे में आएँ और नेहरू के साथ-साथ गांधी, बोस तथा पटेल को देखने के लिए भी एक नया वैचारिक द्वार खुले। अच्छी बातचीत वही होती है जो अंतिम उत्तर नहीं देती, हमारे भीतर बेहतर प्रश्न पैदा करती है और बेहतर प्रश्न ही अंततः बेहतर समझ तथा अधिक परिपक्व सोच को जन्म देते हैं।
मीनाक्षी नटराजन केस के पेंच राहुल गांधी को विफल बनाने की राजनीति के पीछे का एक अदृश्य गठबंधन है
मीनाक्षी नटराजन का मामला उतना सरल नहीं है, जितना उसे एक निर्वाचन-प्रपत्र की भूल बताकर प्रस्तुत किया जा रहा है। मध्य प्रदेश से उनके राज्यसभा नामांकन को इस आधार पर निरस्त किया गया कि उन्होंने तेलंगाना से संबंधित एक न्यायिक प्रकरण की सूचना घोषित नहीं की; जबकि नटराजन का कहना है कि उनके विरुद्ध कोई प्राथमिकी अथवा लंबित आपराधिक मुकदमा नहीं था। केवल एक कानूनी नोटिस था। इसलिए संबंधित कॉलम उन पर लागू ही नहीं होता था। भाजपा की आपत्ति स्वीकार हुई और नामांकन निरस्त हुआ और सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव-प्रक्रिया आरंभ हो जाने के कारण तत्काल हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
इस मामले में कांग्रेस के कुछ प्रमुख राजनेता, अच्छे पत्रकार, कानूनविद, लोकतंत्र के प्रहरी और भारतीय राजनीति में शुचितावाद के आग्रही जो तर्क दे रहे हैं, वे बहुत सही हैं। लेकिन इस पूरे मामले में उसके अलावा एक पेंच है, जिसे लोग भाजपा विरोध में पढ़ ही नहीं पा रहे, जो भाजपा के लिए तो फायदे की बात है ही, वह उन लोगों के लिए भी सुरक्षा का कवच है, जो यह सब भाजपा के साथ मिलकर कर रहे हैं।
प्रश्न ये है कि कांग्रेस के अंदर की कहानी और उसके दस्तावेज इतना जल्दी भाजपा के पास कैसे पहुंच गए। उन्होंने जो किया, वह तो किया ही, लेकिन इसके पीछे के पाॅलिटिकल कान्स्पिरेटर्स के फुटप्रिंट्स को देखना बहुत ज़रूरी है। उन खुरों को नहीं ढका गया तो आगे बहुत कुछ होगा।
कानून की दृष्टि से अब यह विवाद घोषणा की प्रकृति, रिटर्निंग ऑफिसर के विवेक और चुनाव-याचिका के उपलब्ध उपचारों का विषय है; लेकिन राजनीति की दृष्टि से प्रश्न कहीं अधिक असुविधाजनक हैं।
मीनाक्षी नटराजन राहुल गांधी की उस राजनीतिक धारा से हैं, जो कांग्रेस को केवल चुनाव लड़ने वाली मशीन नहीं, वैचारिक, संगठनात्मक और सामाजिक पुनर्निर्माण की परियोजना मानती है। ऐसे नेता भाजपा को तो असुविधाजनक लगते ही हैं, कांग्रेस के भीतर स्थापित सुविधा-तंत्र को भी सहज नहीं लगते। वे उन दरबारों, मध्यस्थों और प्रदेशीय सत्ता-केंद्रों के लिए चुनौती होते हैं, जिनकी राजनीति नेतृत्व के प्रति सार्वजनिक निष्ठा और निजी प्रतिरोध—दोनों को साथ लेकर चलती है।
इसीलिए यह प्रकरण एक विचित्र “प्लेटोनिक राजनीतिक गठबंधन” का आभास देता है; एक ऐसा गठबंधन, जिसका कोई साझा कार्यालय नहीं, कोई लिखित समझौता नहीं, कोई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं; फिर भी जिसके घटक एक-दूसरे के प्रयोजन पूरे करते दिखाई देते हैं। बाहर भाजपा राहुल गांधी के निकट समझी जाने वाली नेता को संसदीय प्रवेश से रोकने का लाभ प्राप्त करती है; भीतर वे कांग्रेसी समूह राहत अनुभव कर सकते हैं, जिन्हें राहुल गांधी की नई संगठनात्मक संस्कृति अपने प्रभाव और भविष्य दोनों के लिए संकट लगती है।
भाजपा नेताओं का यह दावा कि आपत्ति से संबंधित सूचनाएँ कांग्रेस-शासित तेलंगाना से पहुँचीं, तेलंगाना कांग्रेस ने इसका स्पष्ट खंडन किया है। इसलिए कुछ लोग मानते हैं कि किसी आंतरिक षड्यंत्र को अंतिम सत्य कहना अनुचित होगा। किंतु राजनीति केवल प्रमाणित षड्यंत्रों से नहीं चलती; वह सूचनाओं के चयन, मौन की अवधि, सहायता की तीव्रता और संकट के समय दिखाई गई तत्परता से भी पढ़ी जाती है।
संभव है कोई औपचारिक गठबंधन न हो। परंतु भारतीय राजनीति में कई गठबंधन काग़ज़ पर नहीं, हितों की समानांतर दिशा में बनते हैं। वे प्लेटोनिक प्रेम की तरह होते हैं। उनमें स्पर्श का प्रमाण नहीं मिलता, पर आकर्षण, संरक्षण और परस्पर लाभ की उपस्थिति लगातार अनुभव होती रहती है।
मीनाक्षी का नामांकन भले रद्द हुआ हो, इस विवाद ने उन्हें पराजित नहीं किया। उसने उन्हें कांग्रेस की एक उम्मीदवार से उठाकर उस प्रश्न का प्रतीक बना दिया है—क्या राहुल गांधी अपने विरोधियों से केवल भाजपा में लड़ रहे हैं, या अपनी ही पार्टी की दीवारों में छिपी हुई प्रतिरोधी शक्तियों से भी?
और यह मामला जिस दिशा में जा रहा है, वह यह है कि कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी के विरोध में एक बड़ा षड्यंत्र और निरंतर बड़ा होता जा रहा है। वे जैसे-जैसे कांग्रेस में नए लोगों को बिठाते जा रहे हैं, कुछ पुराने चेेहरों के बीच जो हो रहा है, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 14 नवंबर, 2025 की उस टिप्पणी से पढ़ा जा सकता है, जिसमें उन्होंने बहुत साफ़ कहा था :
“आज कांग्रेस ‘मुस्लिम-लीगी माओवादी कांग्रेस’ यानी MMC बन गई है... कांग्रेस के नामदार जिस रास्ते पर पार्टी को लेकर चल रहे हैं, उसके प्रति घोर निराशा और घोर नाराज़गी अंदर ही अंदर पनप रही है। मुझे आशंका है—हो सकता है, आगे कांग्रेस का एक और बड़ा विभाजन हो।”
इसके बाद कभी आप टूटी है और कभी टीएमसी। इन्कार नहीं किया जा सकता अगर राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव आते-आते कई राज्यों में राहुल गांधी संगठन को नए चेहरे दें और भीतर ही भीतर साइडलाइन हुए पुरानेे नेता वही सब करें, जिसकी आशंका मोदी जता रहे हैं। तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अगर ऐसा कुछ होता है तो उसके नतीजे उस कांग्रेस को बहुत पीछे धकेल देंगे, जिसके बारे में माना जा रहा है कि अगले चुनाव में वही सबसे ताकतवर प्रतिरोध बनकर उभरेगी। इसलिए मीनाक्षी नटराजन का मामला एक शुरुआती संकेत है। इसे सही संदर्भ में नहीं पढ़ा गया तो कांग्रेस को बड़ा नुकसान होना तय है।
@RahulGandhi@INCIndia
मंत्रियों को मीडिया और आम लोगों से उलझने की जरूरत कहां है?
आप जोर से बोलकर अपनी बात नहीं मनवा सकते। आपका खून भी चलेगा और दिमाग भी खराब होगा। भले ही आप पावरफुल पद पर हैं, शारीरिक बनावट सब की एक ही जैसी होती है।
आप जो कर रहे हैं, वह प्रेस वार्ता नहीं है। इसे झिकाळ कहते हैं। प्रेस वार्ता की एक गरिमा होती है। आप आइए, अपनी बात रखिए। कोई सवाल लेने हो तो सवाल लीजिए। आपके पास जवाब हों तो जवाब दीजिए। आपको जवाब नहीं सूझ रहा हो टालने की कला सीखिए। किसी विषय पर कुछ भी नहीं बोलना चाहते हैं तो नो कमेंट्स बोलना सीखिए। और मामला बिल्कुल ही हाथ से निकलता हुआ दिख रहा हो तो नमस्कार करके उठ कर चले जाइए। आप छोटे नहीं होंगे।
और अगर आपको निगेटिव पब्लिसिटी ही चाहिए तो वैसा ही कीजिए जैसा आप अभी कर रहे हैं। हालांकि इसका खतरा यह है कि फिर लोग गंभीरता से लेना बंद कर देंगे।
शुभकामनाएं
यूसुफ पठान को जबरजस्ती बुलाया गया.. वो शरीफ आदमी है.. BJP उसके पीछे पड़ी हुई है।
यूसुफ पठान 2011 का वर्ल्ड कप जीता हुआ है हम 1983 का वर्ल्ड कप जीते हुए हैं यूसुफ पठान की इज्जत है.. मैं हिंदू हूं वो मुसलमान है लेकिन हम दोनों देश के लिए खेले है🇮🇳
मेरी परसों यूसुफ पठान से बात हुई उसके बाद उनका फोन स्विच ऑफ है पता नहीं वो कहां है।
सियानी घोष को मैं समझाता था तुम बहुत अच्छा बोलती हो तुम्हारा फ्यूचर बहुत अच्छा है लोग तुम्हें एप्रिशिएट करते हैं..!
-कीर्ति आज़ाद
ऊर्जी मंत्री के सामने ही कटी बिजली
मोदी की उपलब्धि टॉर्च से गिनाई
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव जयपुर में मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने पर उसकी उपलब्धियां गिना रहे थे. कार्यक्रम में ऊर्जा मंत्री भी मौजूद थे. इसी दौरान मंत्री के सामने महज 15 मिनट में तीन बार बिजली चली गई.
बिजली गुल होने के बावजूद कार्यक्रम जारी रहा. मोबाइल की टॉर्च और कैमरे की लाइट की मदद से मोदी सरकार की 12 साल की उपलब्धियां गिनाई गईं. देखिए वीडियो...
प्रख्यात कलाकार शेखर सुमन ने क्या कमाल किया है। अगर इस पर कुछ अधिक लिखकर बताया तो आपको मज़ा किरकिरा हो जाएगा। इसलिए इसे ही आप तो देख लें। कमाल हैं आप शेखर सुमन!
This purely conflict of interest. Nitin Gadkari should not be holding minister position. This is against oath. I don't know why no PIL in Supreme Court?
पुराणों में यह उल्लेख आता है कि जब एक हजार से कुछ अधिक खांटी नेताओं की बलि हुई थी, तब एक अशोक गहलोत उत्पन्न हुए थे। धैर्य के देवता ने स्वयं धरती पर आकर उन्हें घुटृटी पिलाई थी। जोधपुर के महामंदिर क्षेत्र के बचे-खुचे बड़े बुजुर्गो से आप इस तथ्य की तस्दीक भी कर सकते हैं।
अशोक गहलोत, सितंबर 2022 और एक चूकी हुई संभावना
सितंबर 2022। कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव निकट था। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी की थकान स्पष्ट थी और राहुल गांधी की अनिच्छा भी। पार्टी को एक नॉन-गाँधी-नेहरू और इस परिवार के बेहद भरोसे के एक चेहरे की दरकार थी। अशोक गहलोत; तीन बार के मुख्यमंत्री, राजस्थान के निर्विवाद राजनीतिक इंजीनियर; उस कसौटी पर खरे थे। हाईकमान ने संकेत दिया। रास्ता खुला था।
फिर एक रात में सब बदल गया।
जयपुर में 92 विधायकों का वो समानांतर जमावड़ा; जो मूलतः सचिन पायलट के मुख्यमंत्री बनने के कथित तौर पर विरोध में था; वो केवल एक आंतरिक विद्रोह नहीं था। वो या तो अशोक गहलोत की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की स्वयं-निर्मित समाधि थी और अगर वह स्वनिर्मित नहीं थी तो वह उन 92 विधायकों की निर्मित की हुई थी।
प्रसिद्ध जंगलज्ञाता और वन्यजीव शास्त्री सर डेविड ऐटनबरो ने अभी अपना सौंवा जन्मदिन मनाते हुए एक इंटरव्यू में कहा था कि कई बार संकरे और कंटीले रास्ते ही किसी पथिक को सबसे ऊँची चोटियों तक ले जाते हैं; पर यदि मनुष्य स्वयं भीतर से संकीर्ण हो जाए या उस कठिन घड़ी में अंतर की लौ बुझ जाए और वह उस रास्ते को छोड़ बैठे तो वह उसी दहलीज़ पर थम जाता है, जहाँ से शिखर केवल एक कदम दूर था। और तब सारी यात्रा ही नहीं, हर संघर्ष और हर कदम धूल में मिल जाने के कगार पर आ खड़ा होता है।
+++
गहलोत का इलेक्टोरल डीएनए राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए सबसे उपयुक्त रहा है। अभी मैं सर डेविड बटलर की प्रसिद्ध पुस्तक "पॉलिटिकल चेंज इन ब्रिटेन: फोर्सेस शेपिंग इलेक्टोरल चॉइस" पढ़ रहा था। वे अपने जीवनभर के शोध में एक सिद्धांत बार-बार दोहराते हैँ, "जो नेता बूथ स्तर की राजनीति समझता है, वही चुनावी गणित का स्वामी होता है।" गहलोत इस कसौटी पर असाधारण रूप से खरे थे।
2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 199 में से 100 सीटें जीतीं। ऐंटी-इन्कंबेंसी के बावजूद 2023 में पार्टी का वोट शेयर 39.5% रहा, जो 2018 के 39.3% से अधिक था। सीटें गईं, किंतु वोट नहीं। यह किसी साधारण नेता का काम नहीं। यह ऑर्गेनाइजेशनल डेप्थ का प्रमाण है; वही गहनता, जो एक राष्ट्रीय अध्यक्ष को चाहिए।
अगर हम यूके की प्रसिद्ध मार्केट रिसर्च कंपनी 'इप्सोस' के सीईओ और ब्रिटिश एवं यूरोपीय मतदाताओं के मूड को मापने और भांपने में विशेषज्ञ माने जाने वाले बेन पेज के ऑब्जर्वेशंस को पढ़ें तो बहुत काम की बात सामने आती है। वे बहुत सारे अध्ययनों के आधार पर कहते हैं, जनमत केवल नेता को नहीं, नेता की संरचना को वोट करता है। गहलोत के पास वो संरचना थी। और यह संरचना तब हासिल होती है, जब कोई नेता एक बेहतरीन चुनाव जीत लेता है और पूरे तंत्र को समझने लगता है।
+++
लेकिन आगे की स्थिति समझने के लिए यहाँ हमें काउंटरफैक्चुअल्स का अध्ययन करना होगा।
काउंटरफैक्चुअल-1 :
अगर पायलट को सीएम पद मिल जाता
मैं बीबीसी पर ब्रिटिश चुनावों का विश्लेषण लंबे समय से देखता रहा हूँ। बीबीसी के एग्जिट पोल और चुनाव परिणामों की सटीकता चौंकाने वाली होती है। हमारे टीवी चैनलों के विश्लेषण उनके सामने कूड़ा हैं। लेकिन इन विश्लेषणों में जब मैंने सर जॉन कर्टिस को सुना तो हैरान हुआ। स्ट्रैथक्लाइड विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर सर जॉन वर्तमान में यूके के सबसे प्रमुख और सम्मानित सेफोलॉजिस्ट हैं। उन्हें 'चुनावों का महापंडित' माना जाता है। तो सर जॉन कर्टिस की स्विंग मैथडोलॉजी के आधार पर विचार करें तो 2023 के राजस्थान चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बीच औसत स्विंग 4.2% रहा, जो सत्ता परिवर्तन के लिए पर्याप्त था। किंतु यह स्विंग यूनिफॉर्म नहीं था। पूर्वी राजस्थान में कांग्रेस अपेक्षाकृत कमज़ोर रही और यही वह इलाका था, जो पायलट का बड़ा गढ़ था। कई सर्वे में सामने आ चुका है कि पायलट पूरे राजस्थान में युवाओं को आकर्षित करते हैं।
यदि पायलट 2022 में ही मुख्यमंत्री बन जाते तो दो परिणाम संभावित थे। पहला, पूर्वी राजस्थान में 6-8 सीटों का अतिरिक्त लाभ होता और अगर हम कर्टिस के यूनिफॉर्म स्विंग मॉडल को टार्गेटिड स्विंग से रीप्लेस करें तो यह आँकड़ा निकलता है। दूसरा, एंटी-इन्कंबेंसी का मुख्य तीर गहलोत पर नहीं, नये चेहरे की नयी सरकार पर चलता, जो स्वाभाविक रूप से कम घातक होता। तो इससे 8-10 सीटें और बच जातीं।
मतलब ये कि एक तो राजस्थान में कांग्रेस की सरकार शायद बच जाती। और एक जीता हुआ राजस्थान गहलोत के राष्ट्रीय दावे को वैधता देता।
+++
काउंटरफैक्चुअल-2 :
राष्ट्रीय अध्यक्ष गहलोत : यूपीए का बदला हुआ गणित
2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन को 234 सीटें मिलीं। बीजेपी को बहुमत से रोकने के लिए महज 38 सीटों की और दरकार थी।
खरगे; एक सम्मानित नेता हैं। व्यापक दलित आधार वाले हैं। किंतु वे लिमिटिड इलेक्टोरल फुटप्रिंट वाले नेता हैं। उनकी जगह गहलोत अध्यक्ष होते तो गठबंधन का रसायन-शास्त्र भिन्न होता।
गहलोत के पास तीन ऐसी क्षमताएँ हैं, जो "इलेक्टोरल असेट" कहलाती हैं। पहली, ओबीसी नेतृत्व की विश्वसनीयता, जो यूपी-बिहार में सीटों में ट्रांस्लेट होती। दूसरी, क्षेत्रीय दलों से व्यक्तिगत संबंध, जो सपा-आरजेडी और डीएमके के साथ सीट-बँटवारे को सहज बनाते। तीसरी, चुनावी रणनीति की ऐंपायरिकल समझ, जो केवल अनुभव से आती है और कांग्रेस में यह सिर्फ़ और सिर्फ़ गहलोत के पास है।
सेफोलॉजिस्ट बेन पेज का एक सर्वेक्षण सिद्धांत कहता है, "Voters follow coalitions that look like they mean business." यानी मतदाता उन गठबंधनों का साथ देते हैं, जो चुनाव में सत्ता में आने के लिए बेहद गंभीर और कमाल के सक्षम दिखते हैं।" गहलोत के नेतृत्व वाला इंडिया गठबंधन ज़्यादा क्रेडिबल दिखता और वे सभी लोगों को एक साथ ले आते। दरअसल, विश्वसनीयता और दृढ़ता ही वोटों को खींचती है, न कि वादे या सब्ज़बाग़।
+++
पीएम की संभावना : संख्याओं की भाषा में
यदि INDIA गठबंधन 272+ तक पहुँचता और उपरोक्त विश्लेषण में यह 30-40 सीटों के अतिरिक्त लाभ पर निर्भर था तो प्रधानमंत्री का चेहरा कौन होता?
राहुल गांधी की स्वयं-घोषित अनिच्छा को देखते हुए और गैर-गांधी परिवार के भीतर गहलोत की सर्वोच्च स्वीकार्यता को देखते हुए वो नाम स्वाभाविक रूप से उभरता। 76 वर्षीय गहलोत की आयु आपत्ति हो सकती थी, किंतु मनमोहनसिंह भी तो 72 वर्ष में पीएम बने थे और दस साल तक रहे।
कभी ज्योति बसु को कम्युनिस्ट पार्टी के पॉलित ब्यूरो ने रोक दिया था और प्रतीत होता है कि राजस्थान में भी एक नभस्पर्शी छवि वाले मुख्यमंत्री के पॉलित ब्यूरो ने उन्हें उस कुर्सी के प्रति माेहासक्त बनाए रखा, जिससे उस पॉलित ब्यूरो के संकीर्ण सुख सधते थे।
+++
और अब एक सेफ़ोलॉजिकल निचोड़
"राजनीति में टाइमिंग ही सब कुछ है" ; यह कथन भावनात्मक नहीं, यह इलेक्टोरल साइंस का निष्कर्ष है। तो गहलोत ने उस रात जयपुर तो बचाया और सच कहें तो जयपुर भी कहाँ बचा; दिल्ली की संभावना भी विसर्जित कर ली। यह शायद मारवाड़ के नेताओं की अपनी ही पगली जिद है, जो बड़े से बड़े नेताओं को अपने बरअक्स किसी नए चेहरे को देखते ही विचलित कर देती है। इस विचलन का सबसे बेहतरीन उदाहरण राजस्थान के पहले सीएम जयनाराण व्यास हैं, जिनका एक प्रसिद्ध किस्सा है : "मैंने अपने ही हाथों से चिता जलाई। देख-देख लपटें ज्वाला की मैं हँसता, तू क्यों रोता भाई?" यह कथन राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास का है, जो उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियों और विश्वासघात के दौर में कहा था। वह भी विश्वासघात कहाँ था, उन्होंने खुद यह संकट मोल लिया था।
दरअसल, जो कुर्सी छोड़ना जानता है, वही सबसे बड़ी कुर्सी पाता है। यह केवल नीति-वचन नहीं, यह चुनावी इतिहास का सिद्ध सूत्र है। नेल्सन मंडेला ने एक कार्यकाल में सत्ता छोड़ी और अमर हो गए। अटल बिहारी वाजपेयी ने 1996 में 13 दिन में इस्तीफा दिया और 1999 में प्रचंड बहुमत पाया। अशोक गहलोत के पास वो क्षण था। वो रात उनकी थी; बशर्ते वो उसे जाने देते।
और यही वह सूत्र है, जो गठबंधनों पर भी उतनी ही निर्ममता से लागू होता है। मतदाता मूर्ख नहीं होता; वह भाँप लेता है कि कौन सा गठबंधन सत्ता की भूख से जुड़ा है और कौन सा किसी साझा संकल्प से। जो गठबंधन केवल सीटों की गिनती में उलझा रहता है, जो नेता कुर्सी के बँटवारे पर लड़ते हैं; जनता उन्हें देखती है, परखती है और फिर चुपचाप पीठ फेर लेती है।
+++
इतिहास गवाह है कि Voters follow coalitions that look like they mean business; यानी जनता उसी के पीछे चलती है जो सत्ता माँगने नहीं, सत्ता सँभालने के लिए आया हो। जिस गठबंधन की आँखों में दृष्टि हो, जिसकी चाल में ठहराव हो और जिसके इरादे में कोई दरार न दिखे; वही भीड़ को भरोसे में बदलता है और भरोसा ही असली बहुमत है।
और जब कोई नभस्पर्शी छवि वाला नेता बड़ी कुर्सी की गरिमा को पीछे छोड़कर किसी छोटे पद की जिद में उलझ जाता है तो यह केवल एक राजनीतिक भूल नहीं, यह एक वैचारिक विचलन है। सत्ता का मोह और सत्ता की साधना दोनों देखने में एक जैसे लगते हैं, पर इनके बीच की खाई उतनी ही गहरी है, जितनी भक्ति और वासनासक्ति के बीच होती है। जनता इस फ़र्क को शब्दों में नहीं समझती, पर अनुभव में पहचान लेती है।
यह भी सत्य है कि अन्याय हुआ हो, अपमान हुआ हो, विश्वासघात की कोई गहरी लकीर भीतर खिंची हो तो पीड़ा स्वाभाविक है, मानवीय है। पर जिस व्यक्ति ने गांधी को केवल विरासत नहीं, अपना मार्ग माना हो, उससे अपेक्षा यह नहीं होती कि वह पीड़ा से मुक्त हो, यह होती है कि वह पीड़ा के बावजूद बड़ा रहे। गांधीवाद कोई विचारधारा नहीं जो सुविधा के समय ओढ़ी जाए; वह एक जीवन-पद्धति है, जो सबसे कठिन क्षण में ही परखी जाती है। और वह कठिन क्षण यही होता है; जब अहं और आदर्श आमने-सामने खड़े हों, और दोनों में से एक को चुनना पड़े।
+++
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के रणनीतिकार और कम्युनिकेशंस चीफ रहे और वर्तमान में ब्रिटेन के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक कमेंटेटर्स में से एक अलिस्टेयर कैंपबेल लिखते हैं, "इतिहास में जो नेता अमर हुए, वे इसलिए नहीं कि उनके साथ अन्याय नहीं हुआ; इसलिए कि उन्होंने अन्याय को अपना परिचय नहीं बनने दिया। जो नेता अपनी पीड़ा को ही अपनी राजनीति बना लेता है, वह धीरे-धीरे उस पीड़ा का बंदी हो जाता है। और पीड़ा का बंदी नेता; चाहे कितना ही वरिष्ठ क्यों न हो; जनता को नेतृत्व नहीं, केवल करुणा का पात्र लगता है। करुणा वोट दिला सकती है, पर इतिहास में स्थान नहीं।"
Had a very detailed discussion with @khanumarfa on lots of issues connected with #IndianMuslims! I am not at all the leader of the community by any yardstick! Listen 👂 in the full https://t.co/LocPhxiuZM Thanks Arfa for giving me this opportunity to speak
“गजेंद्र सिंह शेखावत तो घबराया हुआ आदमी है। पता नहीं वो कब तक मंत्री रहेगा, उसको नहीं मालूम है। उसको चाहिए अपना मंत्रि पद बचाए वो। ऐसा नहीं हो जाए, छुट्टी हो जाए वहां पर।”
“मुझे मेरे नामांकन की तैयारी करनी थी, पार्टी के लोगों ने भी पूछा, बाकी लोगों ने भी पूछा कि आप क्या करोगे? तो मैंने कहा फॉर्म एक दिन बाद में भर लूंगा, लेकिन मैं इस नेक काम में नागौर जरूर जाऊंगा”